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‘रेडी टू इंस्टॉल’ बायोगैस प्लांट: कैफे, होटल, यूनिवर्सिटी, कहीं भी लगाकर बनाइए गैस!

धनंजय अभंग ने ऐसा बायोगैस प्लांट बनाया है जिसे जगह के हिसाब से बनाकर लगाया जा सकता है। अच्छी बात ये है कि इसमें प्रोसेसिंग के दौरान कोई बदबू नहीं आती है!

पुणे के रहने वाले धनंजय अभंग ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग और MBA करने के बाद 8 साल तक कॉर्पोरेट सेक्टर में काम किया। उनका काम नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में रहा और इस दौरान उन्होंने वेस्ट- मैनेजमेंट के विषय को भी समझा।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया, “हमारे घरों से निकलने वाले गीले कचरे का अगर सही से प्रबंधन किया जाए तो यह बहुत-सी समस्याओं का हल बन सकता है। लेकिन इसकी प्रोसेसिंग के लिए सेंट्रलाइज्ड मॉडल है मतलब कि शहर का नगर निगम हर जगह से गीला कचरा इकट्ठा करवाता है और फिर प्लांट में इसे अलग करके प्रोसेस किया जाता है।”

यह पूरी प्रक्रिया अलग-अलग स्तर पर लोगों के काम पर आधारित है। जैसे कि पहले कचरा इकट्ठा करना, फिर अलग करना, फिर प्लांट तक पहुँचाना और फिर वहां पर इसे प्रोसेस करना। बहुत से लोग इससे जुड़े हुए हैं और अगर एक स्तर पर भी लोग अपना काम सही से न करें तो पूरी प्रक्रिया बिगड़ जाती है।

कामगारों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के नज़रिए से देखें तो और भी परेशानियां सामने आएंगी। इस सेक्टर में काम करते हुए धनंजय को यह तो समझ में आ गया था कि इस बारे में वह कुछ कर सकते हैं।

Biogas Plant
Dhananjay Abhang (left) and his co-founder, Shantanu (Right)

तीन साल पहले, उन्होंने अपने आइडिया पर काम करने के लिए ‘क्लीनर्जी टेक सॉल्युशन’ शुरू किया। उन्होंने सोचा कि अगर इस गीले कचरे का प्रबंधन उसी क्षेत्र में हो जाए, जहां से यह इकट्ठा हो रहा है तो काम आसान हो जाएगा। इसके प्रबंधन का सबसे अच्छा तरीका है बायोगैस प्लांट, जिससे गीले कचरे के बदले में आपको ईंधन मिलता है।

“बायोगैस प्लांट का आइडिया कोई नया नहीं है, लेकिन हमारा मॉडल एकदम नया और अनोखा है। पारंपरिक बायोगैस प्लांट लगाने के लिए आपको काफी जगह चाहिए और फिर इसका पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर सीमेंट आदि से बनता है। जिसके लिए आपको श्रमिकों/मजदूरों की ज़रूरत पड़ती है। हमने कोशिश की कि हम ऐसा मॉडल तैयार करें जो छोटे स्तर के लिए हो,” उन्होंने आगे कहा।

धनंजय की योजना ऐसी जगहों पर इन-हाउस बायोगैस प्लांट लगाने की थी, जहां से हर रोज़ काफी मात्रा में गीला कचरा और बचा हुआ खाना निकलता है। जैसे कि होटल, कैफ़े, यूनिवर्सिटी, हॉस्टल में अगर यह तकनीक लगाई जा सके तो वे अपने लेवल पर ही गीले कचरे का प्रबंधन कर लेंगे। उन्हें अपने इस्तेमाल के लिए अच्छा ईंधन मिल जाएगा और नगर निगम को भी राहत मिलेगी।

लगभग एक-डेढ़ साल तक रिसर्च करने के बाद, उन्होंने एक मॉड्युलर बायोगैस प्लांट, ‘स्वच्छगैस’ का डिज़ाइन तैयार किया। उनका यह प्लांट, प्री-फैब्रिकेटेड और रेडी टू इनस्टॉल मॉडल है। मतलब कि इसे वह अपने क्लाइंट के यहाँ उपलब्ध जगह के हिसाब से बनवाते हैं और फिर उन्हें क्लाइंट के यहाँ जाकर बस इंस्टॉल करना होता है। साथ ही, उनके बायोगैस प्लांट से किसी भी तरह की बदबू नहीं आती है।

Ready to Install Biogas Plant
SwachhGas Biogas Plant

उन्होंने इसके दो मॉडल तैयार किए हैं- एक शहरी लोगों के लिए और दूसरा गाँव के किसानों के लिए।

शहरों के लिए उनका मॉडल होटल, सोसाइटी, यूनिवर्सिटी लेवल का है, वहीं गांवों के लिए उनका मॉडल किसान परिवारों के लिए है।

उनके मॉडल की एक खासियत इसका ऑटोमाइज़्ड होना है मतलब कि यह हर दिन का रिकॉर्ड रखता है, जैसे कि कितना कचरा डाला गया, कितनी गैस बनी वगैरह। यह एक क्लाउड बेस्ड मॉनिटरिंग सिस्टम है और इससे प्लांट की देख-रेख करना काफी आसान है।

धनंजय बताते हैं कि अपने मॉडल की टेस्टिंग के दौरान उन्होंने काफी परेशानियां झेलीं। लोगों के मन में धारणा है कि बायोगैस प्लांट लगेगा तो बहुत बदबू आएगी। इस वजह से कोई भी उनका मॉडल लगवाने को तैयार नहीं था। ऐसे में, एक संगठन, विज्ञान आश्रम ने उन्हें अपने परिसर में प्लांट लगाने की अनुमति दी।

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विज्ञान आश्रम में अपने प्लांट को टेस्ट करने के लिए, धनंजय खुद पास के होटलों से जाकर कचरा इकट्ठा करके लाते थे। जब यह मॉडल पूरी तरह से तैयार हो गया तो उन्होंने आर्ट ऑफ़ लिविंग आश्रम में इसका पायलट प्रोजेक्ट किया। पायलट प्रोजेक्ट के सफल होने के बाद, उन्होंने और भी लोगों से बात की।

Engineer's startup Biogas plant
Biogas Plant set-up in Symbiosis University

पुणे में उनका प्लांट फ़िलहाल 4 जगह पर लग चुका है, जिसमें सिम्बायोसिस यूनिवर्सिटी भी शामिल है। इन 4 प्लांट्स में फ़िलहाल 550 किलो से भी ज्यादा गीला कचरा प्रोसेस हो रहा है। अकेले सिम्बायोसिस कैंपस से हर रोज़ 300 किलो कचरा प्रोसेस होता है और लगभग 15 किलो गैस बनती है।

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शहरों के लिए जब उनका मॉडल सफल हो गया तो उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों के बारे में सोचा। किसानों के लिए उन्होंने एक कम-लागत का ऐसा मॉडल तैयार किया जिसे आसानी से पैक करके भेजा जा सके। इस बायोगैस प्लांट से बनने वाली गैस से एक सामान्य परिवार का ईंधन का खर्च आसानी से बचाया जा सकता है। पुणे के पास के ग्रामीण इलाकों में उनके फ़िलहाल 3 प्लांट लगे हैं।

इन प्लांट को बनाने और इनस्टॉल करने की लागत के बारे में उन्होंने बताया कि शहरों में 300 किलोग्राम की क्षमता वाले प्लांट की लागत लगभग 18 लाख रुपये है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उनके मॉडल की लागत 45 हज़ार रुपये है। इस लागत को मात्र 3 सालों में आप वसूल लेंगे और आगे के लिए आपका गैस का काफी खर्च भी बचेगा।

Biogas Plant
Their design for Rural farmers

अपने स्टार्टअप को धनंजय और उनके को-फाउंडर शांतनु ने अपनी बचत के पैसों से शुरू किया था। बाद में, उन्हें अपने परिवार वालों से भी मदद लेनी पड़ी। लेकिन इस साल उन्हें IIM कोलकाता इनोवेशन पार्क से मदद मिली है और विलग्रो कंपनी द्वारा सपोर्टेड प्रोग्राम, INVENT के ज़रिए फंडिंग मिली है।

उन्हें यह फंडिंग, ग्रामीण किसानों के लिए और किफायती प्रोडक्ट्स बनाने के लिए मिली है। धनंजय कहते हैं कि उनका अपना उद्देश्य भी यही है कि ग्रामीण भारत में नवीकरणीय ऊर्जा के विकल्पों को पूरी क्षमता से इस्तेमाल किया जाए। आगे उनकी योजना एग्रो-वेस्ट को प्रोसेस करने के लिए अच्छी तकनीक बनाने की है।

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वह चाहते हैं कि उनका स्टार्टअप गांवों को स्थानीय तौर पर उपलब्ध साधनों से ऊर्जा बनाने के विकल्प दे। साथ ही, वह लोगों को कचरा-प्रबंधन के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाना चाहते हैं!

अगर आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप भी अपने यहाँ बायोगैस प्लांट लगवाना चाहते हैं तो उन्हें 9970271260 पर कॉल या फिर info@swachhgas.com पर ईमेल कर सकते हैं!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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