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अमेरिका में एप्पल की नौकरी छोड़, अपने गाँव में बन गए किसान; बच्चों को दी ज़मीन से जुड़ी शिक्षा!

ज हमारे देश में कौशल पर आधारित शिक्षा पर जोर-शोर से बहस चलती है। लोग ‘गुरुकुल शिक्षा’ के कॉन्सेप्ट के बारे में बात करते हैं। पूरी दुनिया को गुरुकुल का कॉन्सेप्ट यानी कि बच्चों को जीवन यापन करने की सभी मूलभूत स्किल सिखाते हुए शिक्षित करना, ताकि वे आगे जाकर आत्मनिर्भर बनें और खुद अपने लिए रोज़गार के साधन इजाद करें, भारत ने ही दिया है।

लेकिन आज हम खुद इस कॉन्सेप्ट को भूलते जा रहे हैं। हमारे देश की शिक्षा-प्रणाली में ‘लाइफ सपोर्टिंग स्किल्स’ पर कोई जोर नहीं दिया जाता है। हालांकि, आज बहुत से लोग हैं, जो स्किल बेस्ड शिक्षा की ज़रूरत को समझ कर, इस दिशा में काम कर रहे हैं।

इस दिशा में काम कर रहे लोगों में लद्दाख़ के सोनम वांगचुक का नाम कोई नया नहीं है। सोनम वांगचुक की ही तर्ज़ पर काम करते हुए, महाराष्ट्र के अजिंक्य कोट्टावर भी अपनी ‘ज्ञान फाउंडेशन’ के माध्यम से बच्चों को प्रैक्टिकल तौर पर शिक्षित कर रहे हैं।

अजिंक्य कोट्टावर की कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करें!

अपने देश के भावी भविष्य के प्रति आज के युवाओं की चिंता और फ़िक्र यक़ीनन एक सतत बदलाव की पहल है। बदलाव के इन सारथियों में एक और नाम शामिल होता है और वह है उत्तर-प्रदेश के अभिनव गोस्वामी का। भारत को एक बेहतर कल देने की उनकी सोच और जुनून उन्हें परदेस से भी वापिस खींच लाया।

उत्तर-प्रदेश के अलीगढ़ में जरारा गाँव के रहने वाले अभिनव गोस्वामी, साल 2007 से अमेरिका में रह रहे थे। एक शिक्षक परिवार में जन्मे अभिनव ने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई गाँव से ही की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गये।

यहाँ से स्टेटिस्टिक्स में ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के बाद, उन्होंने कुछ समय तक एक कंपनी में नौकरी की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली। फिर बंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम जैसी जगहों पर काम करने के बाद, साल 2007 में उन्हें अमेरिका जाने का मौका मिला।

अभिनव गोस्वामी (फोटो साभार)

वहां की आईक्योर कंपनी ने उन्हें न सिर्फ़ परिवार सहित अमेरिका बुलाया, बल्कि ग्रीन कार्ड भी दिलवाया। यहीं पर रहते हुए, अभिनव को साल 2011 में एप्पल कंपनी के साथ काम करने का मौका मिला। यहाँ वे ‘डाटा साइंटिस्ट’ के पद पर कार्यरत थे।

“गाँव में इतने अभावों में पढ़ने-लिखने के बाद भी मेरे माता-पिता और शिक्षकों के मार्गदर्शन से मैं आराम से अपनी ज़िंदगी जी रहा था। बहुत बार मन में ख्याल भी आता था कि जिस मिट्टी ने यहाँ तक मुझे पहुँचाया, उस मिट्टी के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूँ,” अभिनव ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया।

आगे उन्होंने कहा कि उन्हें अमेरिका की शिक्षा-प्रणाली ने बहुत प्रभावित किया। कभी-कभी उन्हें आश्चर्य भी होता था कि वहां की प्रारंभिक शिक्षा कहीं न कहीं भारत के ‘गुरुकुल कॉन्सेप्ट’ पर आधारित है। बच्चों को शुरू से ही स्किल बेस्ड शिक्षा दी जाती है। दैनिक जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी स्किल उन्हें सिखाई जाती है, ताकि वे कहीं भी रहें लेकिन अपना निर्वाह कर पाए।

“मैं जब भी वहां के बच्चों का कौशल और क्षमता देखता, तो लगता था कि यह सब हमारे देश में भी होना चाहिए। बच्चों की परवरिश इस तरह से हो कि उन्हें विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ कला और मानव-जीवन से सम्बंधित विषयों को भी जानने-समझने का मौका मिले। लेकिन ये करेगा कौन; अब अगर कुछ अलग करने का ख्याल खुद को आया है, तो खुद ही कुछ करना पड़ेगा,” अभिनव ने हंसते हुए कहा।

जब भी अभिनव इस संदर्भ में बात करते, तो वे सोचते कि रिटायरमेंट के बाद वे अपना जीवन इस काम के लिए समर्पित कर देंगे। पर फिर डेढ़ साल तक खुद से ही इस विचार पर संघर्ष करने के बाद, अभिनव ने अपने देश लौटने का फ़ैसला किया।

उनके इस फ़ैसले का न सिर्फ़ उनके जानने वाले, बल्कि उनके परिवार ने भी विरोध किया। क्योंकि कोई भी इतनी मेहनत और संघर्ष से बनाई एशो-आराम की ज़िंदगी को छोड़कर, एक और संघर्ष करने के लिए क्यूँ लौटता। पर अभिनव अपने फ़ैसले पर अडिग थे। उन्होंने अपनी पत्नी, प्रतिभा को समझाया और कहा, “आप मुझे दो साल दो और अगर मैं दो साल में कामयाब नहीं हुआ, तो हम लोग वापिस आ जाएंगे।”

साल 2017 में अभिनव अपने परिवार के साथ अपने पैतृक गाँव लौट आये। उनके उद्देश्य को समझते हुए उनके छोटे भाई और चचेरे भाइयों ने भी उनका साथ दिया। यहाँ आकर उन्होंने धीरे-धीरे अपने सपने के लिए काम करना शुरू किया। फ़िलहाल, गुरुकुल का निर्माण-कार्य जारी है और अभिनव का कहना है कि अगले साल तक यह पूरी तरह से शुरू हो जायेगा।

गुरुकुल के लिए क्या है अभिनव की योजना?

“मेरा उद्देश्य बच्चों को सिर्फ़ किताबी शिक्षा नहीं, बल्कि कौशल से परिपूर्ण शिक्षा देना है। मैं चाहता हूँ कि बचपन से ही बच्चों को आत्म-निर्भर बनाया जाये। अगर कक्षा में वे कृषि के बारे में पढ़ें, तो साथ ही खेतों में जाकर किसानी भी सीखें। ऐसे ही, अगर उन्हें तारामंडल, गृह विज्ञान आदि के बारे में पढ़ाया जा रहा है, तो उन्हें इसका प्रैक्टिकल भी करने को मिले,” अभिनव ने बताया।

उन्होंने आगे कहा कि फ़िलहाल वे 200 बच्चों के हिसाब से अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे हैं। इन 200 बच्चों को अलग-अलग बैच में पढ़ाया जायेगा। दिन में 3-4 घंटे उनकी सामान्य शिक्षा होगी और फिर 4-5 घंटे उन्हें अलग-अलग स्किल्स में प्रशिक्षण दिया जायेगा।

गुरुकुल के लिए उनकी योजना का एक मॉडल

“खाना पकाना, डेयरी फार्म के अलग-अलग काम, जैविक खेती, कंप्यूटर स्किल्स, म्यूजिक, थिएटर, पेंटिंग आदि जैसे 36 अलग-अलग तरह के क्षेत्रों से उन्हें रूबरू करवाया जायेगा। हर एक बैच को हर एक स्किल करने के लिए 3-3 महीने का समय मिलेगा,” उन्होंने बताया।

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इसके बाद, ये बच्चे जिस भी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहें, वह उनका निर्णय होगा। अभिनव का उद्देश्य इन बच्चों को सिर्फ़ कहीं नौकरी आदि करने के लिए तैयार करना नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि इन बच्चों में से ऐसे उद्यमी निकलें, जो कि आगे चलकर देश में रोज़गार के अवसर उत्पन्न करें और देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान दें।

अभिनव बच्चों को वैश्विक स्तर की तकनीकी शिक्षा देने के साथ-साथ, यह भी चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। वे देश के विकास और उत्थान के लिए तत्पर हों और यह सोच बच्चों के व्यवहार में झलके। साथ ही, बच्चों को सिर्फ़ चारदीवारी तक ही सिमित न रखा जाये, इसके लिए उन्होंने खेतों पर ही अपने प्रोजेक्ट को शुरू किया है।

गुरुकुल के लिए उनका प्लान, एक स्कूल बिल्डिंग, बच्चों के लिए हॉस्टल, पार्क (जहाँ पेड़ों के नीचे छात्रों के बैठकर विचार-विमर्श आदि करने की जगह बनाई जाएगी), गेस्ट रूम, कंप्यूटर के अलावा विज्ञान संबंधित लैब, म्यूजिक थिएटर, लाइब्रेरी व एस्ट्रोनॉमी की प्रैक्टिकल कक्षाओं के लिए भी ख़ास जगह तैयार करवाना है।

गुरुकुल के साथ शुरू किया जैविक खेती और डेयरी फार्म का अभियान भी

इस प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने अभी तक किसी निजी संस्था, संगठन या फिर सरकार से कोई फंडिंग नहीं ली है। बल्कि, अभी तक वे खुद ही सब कुछ संभाल रहे हैं। अपने इस प्रोजेक्ट के साथ-साथ, आय के साधन के लिए उन्होंने डेयरी फार्म और प्राकृतिक खेती शुरू की है।

शिक्षा में बदलाव के साथ ही, अभिनव कृषि के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहे हैं। लगभग 25 एकड़ ज़मीन पर वे सफलतापूर्वक खेती कर रहे हैं।

“फल-सब्ज़ी, एलोवेरा उगाने के अलावा, मैं पारम्परिक फसलें जैसे कि गेंहूँ, चावल, बाजरा, मक्का, सरसों आदि भी उगाता हूँ। हमारी सब्ज़ियाँ अब ग्राहकों तक भी जाने लगी हैं। अलीगढ़ और आस-पास के बहुत से क्षेत्रों से लोग सब्ज़ियाँ खरीदने आते हैं,” अभिनव ने बताया।

उनके खेतों की सब्ज़ियाँ आज अलीगढ़ के घरों तक पहुँच रही हैं (फोटो साभार)

खेती के लिए वे पूर्ण रूप से प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लगभग 50 देसी गाय खरीदकर उन्होंने गौशाला स्थापित की और फिर उन्होंने अपने खेतों में ही बायो-गैस प्लांट, डेयरी फार्म, सोलर प्लांट आदि लगवाया। गोबर, गोमूत्र, किचन से निकलने वाले कचरे आदि से वे बायो-गैस और जैविक खाद बना रहे हैं।

इसी जैविक खाद का इस्तेमाल वे अपने खेतों में करते हैं और साथ ही, गाँव के अन्य किसानों की भी मदद कर रहे हैं। गाँव के आस-पास के सभी कस्बों और शहरों में उनकी डेयरी भी काफ़ी प्रसिद्द हो गयी है। इस सबके अलावा, अब उन्होंने मधु-मक्खी पालन भी शुरू किया है, ताकि प्राकृतिक शहद बाज़ारों में उपलब्ध करवा पाएं।

“धीरे-धीरे हम गाँव के लोगों के लिए रोज़गार जुटाने में भी कामयाब हो रहे हैं। अब गाँववालों को भी मेरी सोच समझ में आ रही है और वे मुझसे जुड़ रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि हम सब मिलकर गाँव को इतना स्वाबलंबी बना दें, कि लोगों को शहरों की तरफ पलायन न करना पड़े,” अभिनव ने कहा।

अपने खेतों में ही उन्होंने बायोगैस प्लांट और मधुमक्खी पालन शुरू किया है (फोटो साभार)

अपनी इस नेक पहल को अभिनव ने ‘वेदिक ट्री प्लांट’ का नाम दिया है। हर रोज़ अलग-अलग जगहों से लोग उनके काम और प्रोजेक्ट को देखने के लिए जाते हैं। अभिनव कहते हैं कि उन्हें उनके कार्यों में स्थानीय लोगों और प्रशासन का भी काफ़ी सहयोग मिला है।

जल्द ही, अभिनव का गुरुकुल का सपना भी सच होगा और वे सिर्फ़ अपने गाँव में ही गुरुकुल खोलकर रुकना नहीं चाहते हैं। उनका संकल्प पूरी दुनिया में इस तरह के 108 गुरुकुल खोलना है। इसके लिए उन्हें अपने देश और देशवासियों के साथ की ज़रूरत है। उनका कहना है कि ऐसे लोग, जो हर तरह से परिपूर्ण और समृद्ध हैं, वे इस काम में आगे आकर उनकी मदद कर सकते हैं।

फ़िलहाल, द बेटर इंडिया के माध्यम से वे किसानों के लिए एक अतिरिक्त आय का अवसर साझा करना चाहते हैं। अपने जैविक खाद के निर्माण के लिए उन्हें नीम के पेड़ पर लगने वाली निबौलियों की आवश्यकता है।

“अक्सर सभी गांवों और खेतों में आपको नीम के पेड़ मिलेंगें। नीम एक तरह से प्राकृतिक पेस्टिसाइड है और इसलिए मैं चाहता हूँ कि अपनी जैविक खाद के निर्माण में इसका इस्तेमाल किया जाये। मैं सभी किसानों से अनुरोध करना चाहूँगा कि गर्मी के मौसम में नीम पर जो निबौलियाँ लगती हैं, उन्हें व्यर्थ न जाने दें। बल्कि इकट्ठा करके हम तक पहुंचाए और हम इसके बदले में उन्हें पैसे दे देंगें,” अभिनव ने कहा।

यदि कोई किसान इस संदर्भ में अभिनव गोस्वामी से जुड़ना चाहे या फिर कोई अन्य व्यक्ति उनके काम के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहे, तो 8859623649 पर कॉल करें।

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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