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निर्भया केस ने झकझोड़ा! तब से लेकर अब तक दे चुकीं है 2 लाख को मुफ्त सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग

साल 2012 तक हर्षा साहू की ज़िंदगी सामान्य चल रही थी, लेकिन निर्भया घटना के बाद उन्होंने ठाना कि उन्होंने जो सीखा, वह उसे आगे बढ़ाएंगी!

साल 2012 में हुए दिल्ली के निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया। बच्चे, युवा और बुजुर्ग- हर उम्र के, हर तबके के लोग सड़कों पर उतर आए थे। जब तक निर्भया के आरोपियों को सजा नहीं मिली, तब तक लोगों का संघर्ष जारी रहा। इस घटना ने हमारे देश में बहुत कुछ बदला, व्यापक स्तर पर ही नहीं बल्कि निजी स्तर पर भी।

दिल्ली की सड़कों पर स्कूल-कॉलेज की छात्राएं जब अपनी सुरक्षा के अधिकार के लिए प्रदर्शन कर रही थीं, तब छत्तीसगढ़ की एक साधारण-सी गृहिणी ने भी कुछ करने की ठानी।

रायपुर के बड़ईपारा में रहने वाली हर्षा साहू पर इस घटना का बहुत प्रभाव पड़ा। 30 वर्षीय साहू अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में कराटे चैंपियन रहीं थीं। उन्होंने कई बार राष्ट्रीय स्तर पर मेडल भी जीते और फिर शादी के बाद घर की ज़िम्मेदारियों में रम गईं।

वह बहुत ही कम कराटे प्रैक्टिस करती थीं, लेकिन इस घटना ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। उन्हें लगा कि सिर्फ प्रदर्शन करने या फिर नारे लगाने से कुछ नहीं होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह की घटना फिर कभी न हो। उन्होंने तय किया कि वह अपने हुनर का इस्तेमाल लड़कियों और महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए करेंगी।

साहू बताती हैं कि तब से ही वह हर तबके और उम्र की लड़कियों को मुफ्त में सेल्फ-डिफेंस की ट्रेनिंग देती हैं!

Harsha Sahu

अपने सफ़र के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि वह एक निम्न मध्यम-वर्गीय परिवार में जन्मीं। उनके पिता कुश्ती करते थे और चाय की दुकान चलाते थे ताकि घर का खर्च चल सके। अपने पिता से ही उनमें खेल की भावना आई और बहुत ही कम उम्र से उन्होंने तरह-तरह के खेलों में अपना हाथ आज़माना शुरू कर दिया था।

“मुझे कराटे सीखने में मज़ा आने लगा और मैंने इस पर पूरा फोकस किया। स्कूल और कॉलेज के दौरान भी पढ़ाई के साथ-साथ मेरा पूरा ध्यान मेरे खेल पर रहता। मैंने राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 10 प्रतियोगिताओं में प्रतिनिधित्व किया और 7 मेडल जीते,” हर्षा साहू ने बताया।

शादी के बाद भी उन्होंने कुछ समय कराटे प्रैक्टिस की, लेकिन फिर बच्चा होने के बाद उनका रेग्युलर प्रैक्टिस करना थोड़ा मुश्किल हो गया। वह कहती हैं कि उन्हें स्पोर्ट्स कोटा से क्लर्क की जॉब मिल गई और उन्होंने जॉब कर ली। लेकिन दिल्ली की घटना के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने जो कुछ भी सीखा है उसे आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

साहू ने अपने आस पड़ोस में रहने वाली लड़कियों से शुरुआत की और धीरे-धीरे उनकी यह पहल पूरे राज्य में फ़ैल गई। उन्होंने अपनी इस मुहिम को ‘महिला सुरक्षा- मेरी ज़िम्मेदारी’ नाम दिया है। इस मुहिम के तहत अब तक उन्होंने लगभग 2 लाख लड़कियों और महिलाओं को ट्रेनिंग दी है!

Harsha during a training session

साल 2016 में उन्हें इस काम के लिए नैशनल अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था। हर्षा साहू समय-समय पर स्कूल, कॉलेज, रेलवे, कॉर्पोरेट और समाज सेवी संगठनों के साथ मिलकर सेल्फ-डिफेंस ट्रेनिंग देती हैं। अपनी ट्रेनिंग के दौरान, वह लड़कियों को गुड टच, बैड टच और सार्वजनिक जगहों पर कैसे अलर्ट रहें आदि के बारे में बताती हैं।

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इसके अलावा, चलती ट्रेन या बस आदि में महिलाएं कैसे खुद का बचाव कर सकती हैं, इस पर भी उन्होंने रेलवे के साथ मिलकर एक खास प्रोजेक्ट किया। उन्होंने चलती ट्रेन में महिलाओं को आत्म-रक्षा के गुर सिखाए और इस खास अभियान के लिए उनका नाम गोल्डन बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है।

हर्षा साहू की एक उपलब्धि यह भी है कि उन्होंने 30 नेत्रहीन बच्चियों को सेल्फ-डिफेंस की ट्रेनिंग दी है। “भले ही ये लड़कियां देख नहीं सकतीं लेकिन एक स्पर्श से ये बता सकती हैं कि यह स्पर्श किसी मर्द का है या औरत का। उनके नेतृत्व में इन लड़कियों ने न सिर्फ ट्रेनिंग की है बल्कि 5 लड़कियों को ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका भी मिला है,” उन्होंने आगे बताया।

पिछले कई सालों से अपने इस नेक काम के साथ-साथ हर्षा अपने घर और बच्चों को भी अच्छे से संभाल रही हैं। वह कहती हैं कि अपनी जॉब और सेल्फ-डिफेंस ट्रेनिंग के बाद जो भी वक़्त बचता है उसे वह अपने बच्चों को देती हैं। उनके बच्चे भी समझते हैं कि उनकी माँ जो कर रही है, वह इस समाज के लिए ज़रूरी है।

हर्षा आगे बताती हैं कि उनकी पहल का व्यापक असर हुआ है। कुछ समय पहले एक लड़की ने उन्हें कॉल कर कहा – “मैडम, मैं आपके पैर छूना चाहती हूँ क्योंकि आज आपकी ट्रेनिंग की वजह से मैं अपनी रक्षा कर पाई।”

“उस लड़की ने मेरे किसी ट्रेनिंग सेशन में सेल्फ-डिफेंस की ट्रेनिंग ली थी और एक दिन जब वह स्कूल जा रही थी तो एक लड़का उसका पीछा करने लगा। ऐसे में, उस लड़की ने सबसे पहले तो उसे कोहनी मारकर नीचे गिरा दिया और फिर जब तक वह संभल पाता, वह वहां से निकल गई,” उन्होंने कहा।

हर्षा कहती हैं कि उस दिन उन्हें लगा कि उनकी कोशिशें रंग ला रही है। आगे भी वह अपने प्रयासों को जारी रखते हुए, हर लड़की को आत्म-सुरक्षा के लिए तैयार करना चाहती हैं।

द बेटर इंडिया, हर्षा साहू के हौसले और जज़्बे को सलाम करता है। हमें उम्मीद है कि बहुत-सी बेटियां उनसे प्रेरणा लेंगी!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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