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हर रोज़ 70 जानवरों को खाना खिलाती है 15 साल की यह बच्ची!

चांदनी ने बेसहारा जानवरों के लिए एक शेल्टर होम भी शुरू किया है, जहां फ़िलहाल 55 बेजुबानों को वक़्त पर खाना और मेडिकल ट्रीटमेंट मिल रहा है!

साल 2019 में अशोका चेंजमेकर्स प्रोग्राम के लिए चुने गए 12 युवाओं में से चांदनी ग्रोवर, सबसे युवा चेंजमेकर हैं। महज़ 14 साल की उम्र में उन्हें इस प्रोग्राम के लिए चुना गया। भोपाल की रहने वाली चांदनी ग्रोवर को उनके सोशल वेंचर, ‘काइंडनेस: द यूनिवर्सल लैंग्वेज ऑफ़ लव’ के लिए इस प्रोग्राम का हिस्सा बनाया गया। अपने इस संगठन के ज़रिए वह लोगों में बेसहारा जानवरों के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता जगाने का प्रयास कर रही हैं। साथ ही, खुद बेसहारा जानवरों को खाना खिलाने के साथ-साथ उनके लिए वैक्सीनेशन, डीवॉर्मिंग, स्टरलाइजेशन ड्राइव भी करती हैं।

शहर के संस्कार वैली स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली चांदनी बचपन से ही जानवरों के प्रति काफी संवेदनशील रही हैं। अस्थमा जैसी बीमारी होने के बावजूद उन्होंने खुद को कभी भी किसी जानवर से दूर नहीं रखा। बल्कि जानवरों के प्रति उनका प्यार देखकर, उनके माता-पिता ने उन्हें सात साल की उम्र में पहला पेट डॉग लाकर दिया।

Chandani Grover

हालांकि, उन्होंने हमेशा ही इस बात का ध्यान रखा कि चांदनी के स्वास्थ्य पर कोई गलत असर नहीं पड़े। पिछले कुछ सालों में चांदनी खुद आगे बढ़कर इन बेजुबानों की आवाज़ बन रही हैं। यह बात साबित करती है कि यदि आपकी लगन सच्ची हो तो राहें खुद-ब-खुद बन जाती हैं।

कैसे हुई शुरुआत

चांदनी अपने पेट डॉग के साथ-साथ सड़कों पर बेसहारा घूमने वाले जानवरों को भी खाना खिलाती थीं। दो साल पहले, एक दिन वह कुछ जानवरों को खाना खिला रही थीं, तब उन्होंने देखा कि कैसे कुत्ते का एक बच्चा तेज रफ़्तार से गुजरती वैन के नीचे आकर मर गया।

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इस घटना ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। चांदनी कहती हैं-

“इस घटना ने उन बेसहारा जानवरों के बारे में मेरी आँखें खोल दीं। मैंने तय किया कि मेरे रहते हुए कभी कोई भी पालतू जानवर बेसहारा नहीं होगा। उन्हें कोई भी नुकसान नहीं पहुँचा पाएगा।”

She herself started an initiative to make shelter home for strays

सबसे पहले उन्होंने इस बारे में अपने माता-पिता से बात की। चांदनी की माँ, शालिनी ग्रोवर बताती हैं कि उन्होंने हमेशा चांदनी का उसके इस अभियान में साथ दिया। वह जानती हैं कि उनकी बेटी इंसानियत के नाते कुछ कर रही हैं। इसलिए उन्होंने इन बेसहारा जानवरों के लिए एक शेल्टर होम बनवाने के लिए चांदनी का पूरा साथ दिया।

वैसे तो, भोपाल नगर निगम ने भी शहर में आवारा घूमने वाले जानवरों के लिए चार शेल्टर होम बनाने का प्रस्ताव पास किया था लेकिन वो प्रोजेक्ट अभी तक सिर्फ कागजों पर ही है। इसलिए चांदनी ने खुद इन जानवरों के लिए शेल्टर होम बनवाने की ज़िम्मेदारी उठायी। इस काम में उनकी मदद उनके माता-पिता, डॉ. अनिल शर्मा, चित्रांशु सेन और नसरत अहमद ने की। उन्होंने साथ में मिलकर बरखेड़ा में रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर बनाया। फ़िलहाल, उनका ये सेंटर 55 से ज्यादा बेसहारा जानवरों को आश्रय दे रहा है। उनके यहाँ अब तक 28 जानवरों को गोद ले लिया गया है। इसके अलावा, हर रोज़ इस सेंटर में 70 से ज्यादा बेसहारा जानवरों को खाना खिलाया जाता है।

Shelter Home

‘काइंडनेस: द यूनिवर्सल लैंग्वेज ऑफ़ लव’:

अपने अनुभव से चांदनी को समझ में आया कि जानवरों के साथ होने वाली बदसुलूकी की वजह असंवेदनशीलता है।

“लोग अपने पालतू कुत्ते की देखभाल करते हैं लेकिन उनमें भी वे सिर्फ कुछ प्रजातियों को ही महत्व देते हैं। कुत्ते कोई प्रोडक्ट नहीं होते हैं, वे हमारे और आपकी तरह जीव हैं। कुछ अपने पालतू जानवरों के बीमार होने पर या फिर बूढ़े हो जाने पर उन्हें छोड़ देते हैं। इस तरह की अनदेखी के हम बिल्कुल खिलाफ हैं और इसलिए हमारा सेंटर इन सभी बेघरों का स्वागत करता है चाहे वे किसी भी प्रजाति के हों। हम रेस्क्यू के बाद उन्हें यहाँ लेकर आते हैं और उन्हें यहाँ वक़्त पर खाना और मेडिकल केयर दी जाती है।” – चांदनी

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पर सवाल यही है कि उनका ये सेंटर कितने जानवरों की देखभाल कर सकता है? इसके लिए उन्हें और भी लोगों की मदद की ज़रूरत है। पढ़ाई के साथ-साथ यह सब करना बिल्कुल भी आसान नहीं है इसलिए पिछले साल उन्होंने अपने सोशल स्टार्टअप- काइंडनेस: द यूनिवर्सल लैंग्वेज ऑफ़ लव की शुरुआत की।

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उनकी टीम में आज 10 लोग हैं। अपने इस स्टार्टअप के ज़रिए वे इन जानवरों के लिए हेल्थ ड्राइव, फीडिंग ड्राइव, रेस्क्यू, डीवॉर्मिंग, स्टरलाइजेशन, एडॉप्शन ड्राइव आदि करते हैं। साथ ही, वे बेसहारा जानवरों को रेस्क्यू कर उनका इलाज करवाते हैं।

उन्होंने दो अभियान भी चलाए हैं- पहला एम्पथी, जिसमें वे खुद जाकर या सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों को जागरूक कराते हैं। दूसरा है वन हाउस वन स्ट्रे, जिसके ज़रिए वे रेजिडेंशियल सोसिएटी और अलग-अलग ऑफिस आदि में जाकर लोगों को कम से कम एक आवारा पशु की ज़िम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करते हैं।

फंडिंग:

फंडिंग के बारे में बात करते हुए चांदनी की माँ ने बताया कि फ़िलहाल, वह और उनके कुछ जानने वाले इस अभियान के लिए फण्ड कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने एक क्राउडफंडिंग कैंपेन भी चलाया था।

“बहुत से लोग हैं जो शायद बाहर जाकर इन जानवरों के साथ समय नहीं बिता सकते या फिर खुद कहीं वॉलंटियर नहीं कर सकते। पर 500 -1000 रुपये देना उनके लिए बड़ी बात नहीं है। ऐसे लोगों से हमें काफी आर्थिक मदद मिलती है और इसी तरह से हमारा काम चल रहा है,” शालिनी ने बताया।

इसके अलावा, चांदनी स्कूल में भी अपने दोस्तों को अपनी ड्राइव्स में भाग लेने के लिए प्रेरित करती हैं। उनकी सभी ड्राइव्स में उनके स्कूल और क्लास से काफी बच्चे आते हैं। उनके प्रेरक अभियानों के लिए साल 2019 में स्कूल में उन्हें ‘गुड सैमेरिटन अवॉर्ड’ से भी नवाज़ा गया।

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अंत में चांदनी अपने संदेश में सिर्फ इतना ही कहती हैं, “बदलाव आपसे शुरू होता है। हम सबमें समाज के लिए कुछ करने की ताकत होती है फिर चाहे हम किसी भी उम्र, लिंग, जगह या फिर संप्रदाय से संबंध रखते हैं। चलिए अपनी ताकत को इस दुनिया को सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि अपने आस-पास के जीवों के लिए भी अच्छा बनाने में लगाते हैं। हम सब चेंजमेकर हो सकते हैं… बस शुरुआत करने की देर है।”

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप चांदनी से सम्पर्क करना चाहते हैं तो 9981520613 कॉल कर सकते हैं।

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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