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‘उतना ही लो थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में’, एक स्लोगन ने मिटाई 9,500 लोगों की भूख!

सक्षम लोगों से लेते हैं और ज़रूरतमंदो तक पहुँचाते हैं!

ध्य-प्रदेश के जबलपुर शहर में “ह्यूमैनिटी ऑर्गेनाइजेशन” की नींव साल 2012 में कुछ कॉलेज के छात्रों ने रखी थी। उनका उद्देश्य युवाओं के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना था जिससे जुड़कर वे समाज के हित के लिए कुछ कर सकें। चंद कॉलेज के छात्रों से शुरू हुई यह पहल आज शहर के सैकड़ों लोगों तक पहुँच चुकी है। स्टूडेंट्स और कामकाजी लोगों के अलावा गृहिणियां भी इसमें वॉलंटियरिंग कर रहीं हैं।

द बेटर इंडिया ने समूह के संस्थापकों में से एक, अभिनव सिंह चौहान से इस पहल के बारे में जाना। 27 वर्षीय अभिनव ने सिविल इंजीनियरिंग करके दो साल नौकरी की और अब पिछले डेढ़-दो साल से वे यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। पर उन्होंने जो मुहिम अपने कॉलेज के दौरान शुरू की, वह आज भी बरकरार है।

“हमारा मुख्य उद्देश्य था कि युवाओं की भागीदारी समाज-हित के कार्यों में बढ़े। अक्सर हम जो काम अकेले करने में हिचकिचाते हैं वह समूह में आसानी से हो जाता है। एक-दो लोगों को शायद रास्ते से कूड़ा बीनने में शर्म महसूस हो पर ग्रुप में यही काम करने पर हमें गर्व महसूस होता है। बस इसी सोच के साथ हमने ह्यूमैनिटी ऑर्गेनाइजेशन की शुरुआत की,” अभिनव ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया।

अभिनव चौहान

ह्यूमैनिटी ऑर्गेनाइजेशन के अंतर्गत वे शिक्षा, खाना, पर्यावरण, महिला सुरक्षा, ब्लड डोनेशन जैसे मुद्दों पर काम कर रहे हैं। सभी अलग-अलग थीम्स के लिए उनके अलग अभियान हैं-

शिक्षा संबंधी जैसे किताब-कॉपी इकट्ठी करके बांटना, ज़रूरतमंद बच्चों की स्कूल फीस में मदद करना या फिर उन्हें यूनिफॉर्म आदि उपलब्ध कराना ‘ज्ञानदृष्टि‘ अभियान के तहत किया जाता है। पर्यावरण के संरक्षण के लिए ‘प्रकृति’ अभियान है जिसके तहत वे न सिर्फ लोगों को जागरूक करते हैं बल्कि समय आने पर पौधारोपण अभियान भी चलाते हैं।

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लोगों को ट्रैफिक के प्रति जागरूक करने और नियमों के लिए ईमानदार रहने को प्रेरित करने के लिए वे ट्रैफिक पुलिस के साथ मिलकर ‘यात्रा’ अभियान चला रहे हैं। वहीं महिला सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण को शहर में बल देने के लिए उनका ‘अपराजिता‘ अभियान है।

इसके अलावा, हर साल 2 अक्टूबर से उनका ‘एक गुहार’ अभियान शुरू होता है। इसके ज़रिए वे शेल्टर होम या फिर फुटपाथ पर अपनी रात बिताने वाले बेघर और बेसहारा लोगों को गरम कपड़े बांटते हैं।

अभिनव कहते हैं, “पहले  शहर के लोगों से कपड़े, कम्बल और चादर आदि इकट्ठा करते हैं और फिर इन लोगों को जाकर देते हैं।”

Distributing clothes to poor people

उनके मुताबिक, पिछले दो सालों से उनके शहर में ठंड से मरने वाले लोगों की तादाद बहुत कम हुई है और यही बात उनके लिए मोटिवेशन है।

ब्लड डोनेशन के लिए उनका ‘सक्षम‘ अभियान चलता है। उनके ग्रुप में जैसे ही कहीं से भी ब्लड डोनेशन की अपील आती है तो वे तुरंत उस इलाके में अपने वॉलंटियर्स को सूचित करते हैं, ताकि किसी की जान बचाई जा सके।

“हमारी ब्लड डोनेशन की यह पहल दूसरे शहरों में भी है। अगर हमें किसी दूसरे शहर से भी ऐसी किसी घटना का पता चलता है तो हम कोशिश करते हैं कि वहां पर अगर किसी का कोई जानने वाला है या फिर हमारा ही कोई साथी है तो उसे मदद के लिए भेजा जाए,” उन्होंने आगे कहा।

पिछले चार सालों से ह्यूमैनिटी ऑर्गेनाइजेशन शादी और आयोजनों में होने वाली खाने की बर्बादी को देखते हुए ‘अक्षयपात्र‘ अभियान भी चला रहा है। यह उनका फ़ूड सेफ्टी कैंपेन है। अभिनव कहते हैं कि हमारी रेग्युलर मीटिंग्स में कई वॉलंटियर्स ने यह मुद्दा उठाया और फिर हमने इस पर काम करने का निश्चय किया।

Promotion

सबसे पहले उन्होंने अलग-अलग ग्रुप बनाकर शादी-ब्याह या फिर अन्य आयोजनों में जाकर लोगों को ‘फ़ूड सेफ्टी’ के बारे में जागरूक करना शुरू किया।

“दिसंबर के महीने से शादियों का सीज़न शुरू होता है और इसी समय में सबसे ज्यादा खाने की बर्बादी होती है। सबसे पहले तो हमने शादियों में लोगों को समझाना शुरू किया और साथ ही, हम फ़ूड सेफ्टी की जगह-जगह पोस्टर लगा कर आते थे।” उन्होंने बताया।

उनकी पहल सिर्फ जागरूकता तक ही सीमित नहीं है। ह्यूमैनिटी ऑर्गेनाइजेशन ने अपना एक हेल्पलाइन नंबर लॉन्च किया है, जिस पर कोई भी व्यक्ति फ़ोन करके उन्हें अपने यहाँ से बचा हुआ खाना ले जाने के लिए सूचित कर सकता है।

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सूचना मिलने के बाद, जिस इलाके से खाना इकट्ठा करना है, वहां के वॉलंटियर्स को बताया जाता है। वे जगह पर पहुंचकर खाना इकट्ठा करते हैं और फिर इसे ज़रूरतमंदों में बाँट आते हैं। अभिनव कहते हैं कि उन्हें ज़्यादातर फ़ोन रात को 12 बजे के बाद आते हैं, फिर भी लोगों के लिए कुछ करने का जज़्बा इतना है कि वे और उनके साथी तुरंत वहां पहुँचते हैं।

Distributing food

ह्यूमैनिटी ऑर्गेनाइजेशन अब तक 9500 लोगों को खाना इकट्ठा करके, डिस्ट्रीब्यूट कर चुका हैं। इस अभियान के लिए उनके 35 वॉलंटियर्स समर्पित हैं। इनमें से ज़्यादातर जॉब करते हैं और व्यवसायी हैं, जो दिन में अपना समय वॉलंटियरिंग के लिए नहीं दे सकते तो रात को एक्टिव रहते हैं।

फंडिंग के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि महीने की शुरुआत में ग्रुप के सभी लोग 20-20 रुपये इकट्ठा करते हैं। इससे उनकी एक्टिविटी मैनेज हो जाती है। उनका मुख्य उद्देश्य है कि लोग ही लोगों के काम आएं। जैसे, किताब डोनेशन के लिए वे लोगों से अपनी पुरानी किताबें देने की अपील करते हैं और कपड़ों के लिए भी वे लोगों की मदद मांगते हैं।

लेकिन अगर कभी ऐसा होता है कि उन्हें ज्यादा फंड्स की ज़रूरत है तो सबसे पहले वे आपस में इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं और यदि फिर भी कुछ कम होता है तो वे सोशल मीडिया पर क्राउडफंडिंग करते हैं। हालांकि, अभी तक उन्होंने कोई प्राइवेट फंडिंग नहीं ली है।

Distributing Books among kids

अंत में वे कहते हैं, “हमारा उद्देश्य लोगों को सेल्फ-रिलाएबल बनाना है। उदाहरण के लिए, जिस जगह से हम खाना इकट्ठा करते हैं, वहां से हम दो-तीन लोगों को हमारे साथ चलने के लिए कहते हैं। उन्हें दिखाते हैं कि वे शहर में कहाँ-कहाँ खाना बाँट सकते हैं, ताकि अगली बार हमें फ़ोन करने की बजाय वे खुद इस नेक काम का ज़िम्मा उठाएं।”

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया और आप उनकी कोई मदद करना चाहते हैं तो उनके फेसबुक पेज या फिर 7869611793 और 8871435866 पर सम्पर्क कर सकते हैं!

संपादन- अर्चना गुप्ता

 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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