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युवक की पहल से सिक्किम होगा ‘ज़ीरो वेस्ट’; आर्मी स्टेशन में लगाया वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट!

प्रीतम का उद्देश्य शहर के 90% कचरे को लैंडफिल में जाने से रोकना है!

साल 2016 में सिक्किम को भारत का ‘जैविक राज्य’ घोषित किया गया, लेकिन क्यों? क्या वाकई पूरी तरह से जैविक हो पाना मुमकिन है? यही सवाल प्रीतम पानी के मन में भी आया, जब उन्होंने सिक्किम के ‘आर्गेनिक स्टेट’ बनने के बारे में सुना। इस बात में कितनी सच्चाई है ये जानने के लिए वह सिक्किम आए और फिर यहीं के होकर रह गए।

IIT रूड़की से आर्किटेक्चर में ग्रैजुएट, प्रीतम पानी साल 2018 से सिक्किम के गंगटोक में रहकर वेस्ट-मैनेजमेंट पर काम कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपना एक अच्छा-खासा कॉर्पोरेट करियर भी छोड़ दिया। इस बारे में उनसे पूछने पर वह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि किसी एक घटना से प्रभावित होकर उन्होंने यह किया। बस उनकी ज़िन्दगी में इस तरह के अनुभव होते गए कि उन्होंने इस राह पर चलने का निर्णय लिया।

“अपनी पढ़ाई के दौरान मुझे एक बार इंटर्नशिप के लिए ऑस्ट्रिया जाने का मौका मिला। वहां मैंने हर घर में वेस्ट के लिए चार डस्टबिन देखे, जिनमें अलग-अलग किस्म का कचरा डंप किया जाता था। फिर कम्युनिटी सेंटर पर भी चार बड़े डस्टबिन रखे गए थे, अलग-अलग कचरे के लिए। सबसे बड़ी बात ये थी कि कचरे को अलग करके कम्युनिटी सेंटर पर रखे डस्टबिन में डालने का काम खुद नागरिक कर रहे थे,” उन्होंने द बेटर इंडिया से बात करते हुए कहा।

Pritam Pany

प्रीतम बताते हैं कि तब उन्हें समझ में आया कि ऑस्ट्रिया इतना साफ़-सुथरा क्यों है? क्योंकि वहां के नागरिक सिर्फ प्रशासन और सरकार पर निर्भर नहीं हैं। वे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं और उसे पूरा भी करते हैं। जबकि भारत में तो कचरा कहीं भी फेंक देना, कहीं भी थूकना या शौच कर लेने जैसी आदतें लोगों के व्यवहार में ही है। इस अनुभव ने प्रीतम के मन पर काफी गहरा प्रभाव छोड़ा।

हालांकि, भारत लौटने के बाद और फिर अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी ज्वाइन कर ली, लेकिन वहांं काम करते हुए उन्हें कोई संतुष्टि नहीं मिल रही थी। उन्हें लगता था कि उनके जीवन में कुछ तो खालीपन है।

“मुझे लगता था कि मैं क्या काम कर रहा हूँ? सिर्फ एक अमीर आदमी को और अमीर बना रहा हूँ। इसलिए मैंने अपनी नौकरी छोड़कर कुछ और करने की सोची जो कि मुझे संतुष्टि दे।”- प्रीतम

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अपनी जॉब के साथ-साथ वह अक्सर टॉक्स, कॉन्फ्रेंस या फिर इवेंट्स में जाते रहते थे, जहां ग्रीनरी, वेस्ट मैनेजमेंट जैसे विषयों पर चर्चा होती थी। वहां उन्होंने महसूस किया कि वेस्ट मैनेजमेंट पर हम बातें तो बहुत कर रहे हैं पर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों का प्रतिशत बहुत कम है। ऐसे में, हम कैसे किसी शहर और राज्य को जीरो वेस्ट कह सकते हैं या फिर बना सकते हैं?

उन्होंने आगे बताया, “इसी दौरान मुझे सिक्किम के जैविक राज्य होने के बारे में पता चला और मैं पहुँच गया सिक्किम। सबसे पहले मैं सिर्फ सिक्किम घूमा, वहां लोगों से मिला और बातें की। मैंने देखा कि वहां के लोगों को जैविक खाने का मतलब बहुत अच्छे से पता है। वहां आप किसी भी पब्लिक टॉयलेट में चले जाओ, भले ही आपको कुछ पैसे देने पड़ेंगे पर उसके बदले में आपको टॉयलेट्स इतने साफ़ मिलेंगे कि आप सोच में पड़ जाएंगे।”

सिक्किम के लोगों की जागरूकता और अपने काम के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना देखकर प्रीतम को लगा कि इस राज्य में जीरो-वेस्ट अभियान सफल हो सकता है। उन्होंने अपनी रिसर्च शुरू की जिसके बाद कुछ ऐसे फैक्ट्स सामने आए जिसके बाद उन्होंने सिक्किम में ही काम करने का इरादा कर लिया। वह बताते हैं कि रिसर्च के दौरान पता चला कि गंगटोक नगर निगम हर दिन लगभग 50 टन कचरे को लैंडफिल के लिए भेजता है।

गंगटोक से ज़्यादातर यह कचरा दूर पहाड़ियों, जंगलों में बने लैंडफिल्स में जाता है। प्रीतम का उद्देश्य है कि इसमें से 90% कचरे को लैंडफिल में जाने से रोका जाए। तभी हम अपने पहाड़ों और प्रकृति को बचा पाएंगे।

Mostly waste goes to landfill in Gangtok

“यह तब ही मुमकिन है अगर हम कम्युनिटी लेवल पर काम करें। इसलिए सबसे पहले लोगों को घरों पर ही अपना कचरा अलग-अलग करके इकट्ठा करने के लिए जागरूक करना बहुत ज़रूरी होता है। फिर गीले कचरे को अलग कंपोस्टिंग यूनिट में और सूखे कचरे में से रीसायकल हो जाने वाले कचरे को रीसाइक्लिंग यूनिट के लिए भेजा जाता है। बाकी कचरा, जैसे कि सेनेटरी वेस्ट और अन्य तरह के अन-रीसायकलेबल वेस्ट को ही सिर्फ ट्रीट करके लैंडफिल में भेजा जाता है,” उन्होंने बताया।

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वेस्ट-मैनेजमेंट पर काम करने के लिए उन्होंने ‘वॉयेज’ सोशल एंटरप्राइज की शुरुआत की। इस एंटरप्राइज के दो भाग हैं- पहला, लोगों को कचरा-प्रबंधन के बारे में जागरूक करता है और दूसरा, कूड़ा-कचरा बीनने वालों को बेसिक सुविधाएँ प्रदान करता है जैसे कि रेग्युलर मेडिकल चेक-अप आदि।

इसके अलावा, उनका मुख्य उद्देश्य कम्युनिटी लेवल पर वेस्ट-मैनेजमेंट यूनिट्स सेट-अप करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा वेस्ट प्रोसेस हो, न कि लैंडफिल में जाए। इस पूरी प्रक्रिया में उनका काम लोगों को वेस्ट सेग्रीगेशन के बारे में जागरूक करना, और फिर वेस्ट को अलग-अलग करके प्रोसेसिंग करना है। वेस्ट-मैनेजमेंट यूनिट सेट-अप करने का सबसे पहला प्रोजेक्ट उन्होंने गंगटोक मिलिट्री स्टेशन के साथ किया। प्रीतम कहते हैं,

“सबसे पहले आर्मी स्टेशन की ऑडिट की गयी, जिसमें पता चला कि लगभग 2 टन कचरा हर रोज़ स्टेशन से लैंडफिल में जाता है। इसके बाद हमने यहाँ पर एक ड्राई वेस्ट रीसाइक्लिंग यूनिट और गीले कचरे के लिए कम्पोस्टिंग यूनिट सेट-अप की। फ़िलहाल, इस यूनिट की मदद से लगभग 0.5 टन कचरा हम लैंडफिल में जाने से रोक पा रहे हैं।”

Army Dry Waste Unit

 

Army Composting Unit

उनकी एंटरप्राइज का दूसरा हिस्सा कमर्शियल है ताकि उनके एनजीओ को किसी और फंडिंग का मोहताज न होना पड़े। हालांकि, ये अभी शुरुआती स्टेज पर ही है। प्रीतम का उद्देश्य है कि वह अपनी एंटरप्राइज को सेल्फ-सस्टेनेबल बनाएं। इसलिए वह रीसायकलेबल वेस्ट जैसे कि टेट्रा पैक्स, पेपर आदि से कुछ प्रोडक्ट्स बनाने पर भी काम कर रहे हैं। अपने काम की चुनौतियों के बारे में बात करते हुए वह कहते हैं,

“सबसे बड़ी समस्या है लोगों को कचरा अलग-अलग इकट्ठा करने के लिए समझाना। यह बात उनके व्यवहार में लाना बहुत मुश्किल है। उन्हें लगता है कि ये प्रशासन का काम है। इसके अलावा, फंडिंग जुटाना बहुत बड़ी परेशानी है। लोगों के लिए अभी भी कचरा एक प्रॉब्लम नहीं है। आर्मी वाले प्रोजेक्ट में भी हमने बहुत ही कम फंड्स के साथ काम किया। इसलिए मैंने अपने स्टार्टअप को सोशल एंटरप्राइज की तरह लॉन्च किया ताकि हम इसे एक वक़्त के बाद सेल्फ-सस्टेन बना पाएं।”

फिलहाल, प्रीतम गंगटोक में एक वेस्ट प्रोसेसिंग सेंटर बनाने के लिए काम कर रहे हैं, जहां हर दिन लगभग 200-300 किग्रा कचरे को प्रोसेस किया जा सके। इस सेंटर के लिए उन्हें फंड्स की काफी ज़रूरत है। साथ ही, इस सेंटर की सफलता यहाँ के लोगों के हाथों में है। जब तक वह अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाते, वह कितने भी मॉडल खड़े कर लें, पर ये पूरी तरह से सफल नहीं हो पाएगा।

“मैं भारत में जीरो-वेस्ट कॉंसेप्ट को ज़िन्दगी जीने का तरीका बनाना चाहता हूँ। यह कॉंसेप्ट जितना पर्सनल है उतना ही कम्युनिटी पर भी निर्भर करता है। क्योंकि आप प्लास्टिक की स्ट्रॉ के लिए मना कर सकते हैं, या फिर आपके घर में प्लास्टिक इस्तेमाल न हो, इस पर ध्यान दे सकते हैं। लेकिन जब बात वेस्ट मैनेजमेंट की आती है तो आपको समुदाय के साथ ही काम करना पड़ता है,” उन्होंने कहा।

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इसके अलावा, उनका एक उद्देश्य वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़े हर तबके के लोगों को एक सम्मानजनक ज़िन्दगी देना है। वह चाहते हैं कि कचरा इकट्ठा करने वालों को लोग सम्मान से ट्रीट करें।

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप किसी भी तरह से उनकी मदद करना चाहते हैं, तो आप प्रीतम पानी से 7407227222 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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