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घर में ही करें किसानी, इस माँ की बनाई ‘ग्रो ईट योरसेल्फ’ किट के साथ!

इस किट में नारियल का एक बायोडिग्रेडेबल गमला, बीज, जैविक उर्वरक, प्लांटिंग टैग,और दिशा-निर्देश के लिए एक मैन्युअल होता है!

वनी जैन खुद को एक ‘एक्सीडेंटल फर्मेप्रेन्योर’ मानती हैं यानी कि किस्मत से बनी कृषि उद्यमी। वह कहती हैं कि सालों पहले जब वे अपने दादा जी के खेतों में जाती थीं तब उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वे खुद किसानी करेंगी।

साल 2009 में उन्होंने अपना ‘उपज’ फार्म शुरू किया। जहां पर वे शहर में रहते हुए भी बिना किसी केमिकल पेस्टिसाइड और फ़र्टिलाइज़र के खुद अपनी सब्ज़ियाँ उगाती हैं। इसके साथ ही, यह कृषि उद्यमी किसानी को अर्बन लाइफस्टाइल का एक हिस्सा बनाने के लिए ‘ग्रो ईट योरसेल्फ’ किट भी बेच रही है।

इस किट में आपको नारियल का एक बायोडिग्रेडेबल गमला, बीज, जैविक उर्वरक, प्लांटिंग टैग,और दिशा-निर्देश के लिए एक मैन्युअल मिलता है। आपको सिर्फ़ इतना करना है कि आप इस किट में पानी डालें और अपनी सब्जियों को उगते हुए देखें।

गुजरात के वड़ोदरा में पली-बढीं अवनी ने साल 2000 में बी. आर्किटेक्चर किया और इसके बाद कई सालों तक इंडस्ट्री में काम किया। लेकिन फिर शादी के बाद जैसे-जैसे बच्चों की ज़िम्मेदारी बढ़ी तो उन्होंने काम छोड़कर अपने परिवार को वक़्त दिया।

 

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धीरे-धीरे जब उनके बच्चे थोड़े बड़े हुए और खुद को संभालने लगे तो अवनी ने अपने बागवानी के शौक को आगे बढ़ाने की सोची। उन्होंने 50 हज़ार स्क्वायर फीट की अपनी परिवारिक ज़मीन पर सब्ज़ियाँ उगाना शुरू किया।

“मैंने दादाजी से मिली किसानी की जानकारी और कुछ ऑनलाइन रिसर्च को मिला-जुलाकर सब्ज़ियाँ उगानी शुरू कीं। पहली बार में मुझे केमिकल पेस्टिसाइड आदि का इस्तेमाल करना पड़ा और इसके बाद पेड़ों में आई पोषक तत्वों की कमी साफ़ ज़ाहिर थी। तब मुझे अहसास हुआ कि ये रसायनों के साथ उगी सब्ज़ियाँ मैं अपनी डिनर टेबल पर नहीं चाहती,” 41 वर्षीया अवनी ने द बेटर इंडिया को बताया।

 

Avanee Jain, founder of Upaj

 

शुरू हुआ जैविक सफर

जैसे ही उनकी सब्जियों की पहली साइकिल खत्म होने को आई, तब से ही उन्होंने अन्य सुरक्षित विकल्पों पर अपनी खोज शुरू कर दी। उन्होंने जैविक खेती पर ऑनलाइन रिसर्च की और बहुत से यूट्यूब विडियो देखे। साथ ही, उन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में परमाकल्चर पर एक लॉन्ग-डिस्टेंस कोर्स में दाखिला भी लिया।

 

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“मैंने केमिकल की जगह बायोमास जैसे कि सूखे पत्ते, बची-कुची सब्ज़ियाँ और गीला कचरा आदि का इस्तेमाल किया। यह कीड़ों को तो दूर रखता ही है, साथ ही ज़्यादा समय तक पानी को भी रिटेन करता है। मैंने मल्चिंग के लिए भी बायोमास का इस्तेमाल किया। इस मोटी परत से खरपतवार नहीं लगती और साथ ही, गर्मियों में जड़ें भी खराब नहीं होती,” उन्होंने बताया।

 

 

अवनी मल्टी-क्रॉपिंग करती हैं- एक तकनीक जिसमें आप कोई भी दो फसल/सब्ज़ियाँ एक साथ लगा सकते हैं। इससे पानी की बचत होती है और उपज भी ज़्यादा मिलती है। उदाहरण के लिए वे टमाटर के बीजों के साथ तुलसी के बीज लगाती हैं। ऐसे ही, गेंदे के बीजों के साथ वे मुली जैसे सब्ज़ी उगाती हैं। उन्होंने अपने खेत को भी समतल नहीं रखा है, कहीं-कहीं से उन्होंने मिट्टी को ऊपर-नीचे रखा है ताकि सारा पानी बह न जाये।

उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने अपने खेत में नालियां/ट्रेंच बनाई हैं और बीच में ज़्यादा मिट्टी भरकर बेड को थोडा ऊँचा कर दिया। इससे बारिश का एक्स्ट्रा पानी इन नालियों में चला जाता है और फसल सूखी रहती है। इन नालियों में यह पानी स्टोर रहता है और इससे ज़मीन में नमी बनी रहती है।

 

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कुछ सब्ज़ियाँ अपने परिवार के लिए रखकर, वे बाकी बची हुई सब्जियों को अपने दोस्तों व रिश्तेदारों में बाँट देती हैं। अब लोगों के बीच उनकी सब्जियों को मांग बढ़ने लगी है। इसलिए उन्होंने अब अपने कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों की ज़मीन भी सब्ज़ियाँ उगाने के लिए ले ली है।

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अवनी ने कुछ ज़रूरतमंद महिलाओं को अपने फार्म में काम करने के लिए हायर किया हुआ है। आज उनकी टीम में 10 लोग हैं जो कि फार्म की अलग-अलग गतिविधियों को सँभालते हैं। अपने फार्म के लिए बीज लेने के लिए उन्होंने पास के गांवों के तीन किसान समूहों से टाई-अप किया हुआ है।

 

Upaj team

 

दूसरों को भी सिखा रही हैं

एक बार फार्मिंग में एक्सपर्ट होने के बाद, अवनी ने लोगों को, किसानों को, स्कूल-कॉलेज के छात्रों को अपने फार्म पर एक दौरे और वर्कशॉप के लिए बुलाना शुरू किया।

“बहुत से लोग हैं मेरी तरह जो फार्मिंग करना चाहते हैं और उनके पास खाली ज़मीन भी है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि कैसे करना है? इसलिए मुझे वर्कशॉप का आईडिया आया। ये वर्कशॉप अलग-अलग होती हैं एक महीने से लेकर एक साल तक।”

वर्कशॉप में वे अपने क्लाइंट को अपने फार्म में ज़मीन के एक टुकड़े पर फल और सब्ज़ियाँ उगाने देती हैं। वर्कशॉप में वे जैविक खेती पर सभी जानकारी जैसे कि जैविक खाद, पानी देने के तरीके से लेकर ज़्यादा उपज के लिए मल्टी-क्रॉपिंग तक के बारे में विस्तार से बताती हैं। क्लाइंट को बीज के साथ-साथ जैविक खाद भी दिया जाता है।

उपज फार्म ने अब तक अर्बन फार्मिंग और होम गार्डनिंग से संबंधित अलग-अलग विषयों पर 400 से भी ज़्यादा वर्कशॉप किये हैं।

 

 

नंदेसरी की रहने वाले शिवानी ने साल 2017 में अवनी की वर्कशॉप के लिए रजिस्टर किया था। शिवानी पेशे से एचआरडी मैनेजर हैं और साथ ही, दो बच्चों की माँ भी है। वर्कशॉप के बाद उन्होंने अवनी से बीज लिए और अपनी सब्ज़ियाँ उगाना शुरू किया। अपनी जैविक सब्जियों को वे अपने दोस्त-रिश्तेदारों और अपनी कंपनी में सहकर्मियों को बांटती हैं।

 

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शिवानी ने द बेटर इंडिया को बताया,

“मैं हमेशा से गार्डनिंग की शौक़ीन रही हूँ और वर्कशॉप बहुत ही फायदेमंद रही। मेरे फार्म की सब्जियों का स्वाद और गुणवत्ता, बाज़ार की सब्जियों को बहुत ही अच्छा है। फार्म सेट-अप होने के बाद, मेरे बच्चे भी फार्मिंग में मेरी मदद करते हैं।”

Shivani in her farm

 

जैसे-जैसे अवनी की वर्कशॉप में लोग बढ़ने लगे तो उन्होंने अपने घर में सब्ज़ियाँ उगाने के लिए उनसे बीज माँगना शुरू कर दिया। ऐसे में, उन्हें ‘ग्रो ईट योरसेल्फ’ किट तैयार करने का ख्याल आया। अवनी कहती हैं कि अब लोग प्राकृतिक खाने की तरफ बढने लगे हैं, लेकिन अगर खरीदने जाओ तो यह महंगा है और हर कोई इसे नहीं खरीद सकता।

साथ ही, शहरों में रहने वाले लोगों के लिए जगह भी एक बड़ी समस्या है। इसलिए एक फुल-टाइम फार्म को मैनेज करना बहुत मुश्किल है। ऐसे में, अवनी की यह किट एक अच्छा विकल्प है।

अब अवनी बच्चों के लिए ख़ास किट तैयार कर रही हैं। इस किट में गमले और बीजों के अलावा, एक छोटी-सी बुकलेट भी होगी, जिसमें किसानी के तरीके, सब्जियों की रेसिपी, उनके फायदे आदि के बारे में होगा।

यदि आप उपज फार्म के बारे में ज़्यादा जानना चाहते हैं और उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करें!

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मूल लेख: गोपी करेलिया

Summary: Avanee Jain, Founded in 2009, her company ‘Upaj’ runs a farm in the city where vegetables are grown without any chemicals and pesticides. In addition to that, the enterprise also sells ‘Grow-it-yourself (GIY)’ kits to make farming a part of an urban lifestyle.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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