in ,

साइक्लोन फोनी: तूफ़ान से गिरी अस्पताल की छत, अपनी जान की परवाह किये बिना मेडिकल स्टाफ ने बचायी 22 बच्चों की जान!

प्रतीकात्मक तस्वीर

ड़ीसा सरकार ने साइक्लोन ‘फोनी’ के बारे में तटीय इलाकों के ज़्यादातर जिलों में पहले से ही सुचना जारी करवा दी थी। राज्य में अलर्ट जारी करते हुए स्कूल-कॉलेज भी बंद किये गये और प्रशासन ने किसी भी तरह के नुकसान के लिए खुद को तैयार रखा।

इस सबके बावजूद फोनी ने उड़ीसा के कई इलाकों पर कहर बरपाया है। और फ़िलहाल यहाँ लोगों की ज़िंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। जहाँ तूफ़ान से हुई तबाही के चलते लोग दुःख में हैं तो वहीं राज्य से ऐसी भी कुछ ख़बरें मिल रही हैं जो कि इस वक़्त पर आपके दिल को उम्मीदों से भर सकती हैं।

भुवनेश्वर में स्थित कैपीटल अस्पताल से भी ऐसी ही एक प्रेरणादायक खबर मिली, जिसे सुनकर इंसानियत पर विश्वास और गहरा हो जाता है।

3 मई 2019 को जब साइक्लोन फोनी पूरे राज्य में तबाही मचा रहा था, तो उसका असर इस अस्पताल पर भी पड़ा। ख़ासकर कि अस्पताल के उस भाग पर जहाँ 22 नवजात बच्चों को रखा गया था। तूफ़ान की वजह से यहाँ की छत गिर गयी। ये सभी बच्चे भी इस दुर्घटना की चपेट में आ जाते अगर अस्पताल के 11 स्टाफ मेम्बर अपनी जान की परवाह किये बिना इन बच्चों को नहीं बचाते।

7 स्टाफ नर्स, दो डॉक्टर और दो मेडिकल पोस्ट-ग्रेजुएशन के छात्र, 3 मई को अस्पताल में मौजूद थे। उसी दिन अस्पताल के सिक एंड न्यू बोर्न केयरयूनिट (SNCU) में 22 बीमार बच्चों को भर्ती करवाया गया। दोपहर 12 बजे के बाद, स्टाफ ने इस वार्ड की छत से धूल गिरती देखी और उन्होंने तुरंत खतरा भांप लिया।

उस समय मौजूद मेडिकल स्टाफ में से कुछ स्टाफ मेम्बर

“मेरी शिफ्ट उस दिन खत्म हो गयी थी। पर बाहर तेज आँधी की वजह से मैं अस्पताल में ही रुक गयी। अन्य कुछ नर्स भी मेरे साथ थीं। और जैसे-जैसे आँधी बढ़ने लगी, अस्पताल का एक हिस्सा ‘थर्राने/हिलने’ लगा,” रामरानी बिस्वाल (38 वर्षीय), स्टाफ नर्स ने बताया

डॉ. ज्योति प्रकाश मिश्रा ने बताया कि उन्होंने SNCU वार्ड की छत से धूल-मिट्टी गिरते हुए देखी। “हमारे पास सोच-विचार का वक़्त नहीं था और हमने तुरंत वहां से बच्चों को बाहर निकालने का फ़ैसला किया।”

छत को गिरते हुए वक़्त नहीं लगा, लेकिन बच्चों को सुरक्षित रूप से पास के बरामदे में ले जाया गया। इस सबमें एक-दो लोगों को चोट भी आई, पर उनका पूरा ध्यान बच्चों को बचाने पर था। डॉ. मिश्रा ने आगे कहा कि बच्चों को बरामदे में रखना भी खतरे से खाली नहीं था। क्योंकि यहाँ पर कांच की खिड़कियाँ थीं, जो कभी भी टूट सकती थीं और आँधी की वजह से ये कांच बच्चों को भी लग सकते थे।

इसलिए उन्होंने सभी बच्चों को ग्राउंड फ्लोर पर पीड़ीयाट्रिक्स इंटेंसिव केयर यूनिट (PICU) में ले जाने का फ़ैसला किया। तुरंत बच्चों के माता-पिता को बताया गया और उन्हें बच्चों के साथ PICU भेजा गया।

अस्पताल के स्टाफ की सुझबुझ के चलते ही इन बच्चों को सही-सलामत रख पाना सम्भव हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी ट्वीट करके इस टीम की सराहना की। जिन्होंने मुश्किल वक़्त में अपनी जान की परवाह किये बिना, 22 नन्हीं जानें बचाईं।

फ़िलहाल, राज्य में रख-रखाव और मरम्मत का कार्य लगातार जारी है और साथ ही, उड़ीसा ने केंद्र सरकार से भी वित्तीय सहायता मांगी है। उम्मीद है कि उड़ीसा में जल्द ही हालात सामान्य हो जायेंगें।


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

शेयर करे

Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

कार को मोबाइल क्लिनिक बना, अब तक 36,000+ ग्रामीणों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने वाला डॉक्टर!

ट्यूशन पढ़ाकर 50 से ज़्यादा बेसहारा कुत्तों की देखभाल कर रही है इंजीनियरिंग की यह छात्रा!