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दुर्घटना के बाद कभी हाथ और पैर काटने की थी नौबत, आज हैं नेशनल पैरा-एथलेटिक्स के गोल्ड विजेता!

किसी ने सही ही कहा है, ‘दिव्यांगता सिर्फ़ एक मानसिक स्थिति है!’ क्योंकि अगर आप ठान लें, तो कोई भी मुश्किल आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। एक तरफ जहाँ हमारे समाज में अक्सर दिव्यांग लोगों को देखकर बहुत-से लोग उनपर तरस खाते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ बहुत से दिव्यांग इस तरस और दया से निकलकर, आज अपनी खुद की एक पहचान बना रहे हैं।

बिहार के 24 वर्षीय पैरा- एथलीट शेखर चौरसिया भी उन लोगों में से एक हैं, जिन्होंने हर एक चुनौती से लड़कर अपना रास्ता बनाया है। राज्य के रोहतास जिले में दिनारा इलाके के एक छोटे से गाँव गुनसेज से ताल्लुक रखने वाले शेखर बहुत ही गरीब परिवार से हैं।

शेखर चौरसिया

छह बहन- भाइयों में सबसे बड़े शेखर ने बचपन से ही मुश्किल हालातों का सामना किया। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कभी भी ठीक नहीं रही। संपत्ति के नाम पर उनके पास गाँव में सड़क के किनारे बस एक टुटा-फूटा घर था और उनके पिता एक छोटी-सी पान की दूकान के सहारे घर चलाते आये हैं।

“सबको हमसे बड़ी उम्मीदें थीं क्योंकि हम पढ़ाई और खेल में बहुत अच्छे रहे। स्कूल में हमेशा अच्छे नंबर लाते थे। साल 2010 में हमने दसवीं बढ़िया अंकों से पास की और इसी ख़ुशी में मम्मी ने पूजा रखवाई थी। पर वही दिन सबसे ज़्यादा बुरा दिन बन गया हमारे लिए,” शेखर ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए कहा।

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दरअसल, शेखर का घर सड़क के किनारे है और बहुत बार वहां से माल से लदे हुए ट्रक गुजरते हैं। उस दिन भी, भूसे से ओवरलोड एक ट्रक सड़क के किनारे खड़ा था। शेखर उस ट्रक से कुछ दूरी पर खड़े होकर कुछ काम कर रहे थे कि अचानक वह ट्रक लुड़क गया और शेखर उसकी चपेट में आ गये।

शेखर आगे बताते हुए कहते हैं,

“मुझे कुछ पता ही नहीं चला कि कब वह ट्रक मेरे ऊपर गिरा और मैं उसके नीचे दब गया। मेरी छाती की, हाथ- पैर की, लगभग सभी हड्डी टूट गयी थी। बहुत दिनों तक मैं आईसीयु में रहा; जैसे- तैसे डॉक्टरों ने मेरी जान बचाई। मेरे हाथ और पैर की हालत इतनी ख़राब थी कि उन्होंने कह दिया कि दोनों काटने पड़ेंगें। महीनों बाद हमें पता चला कि शायद हम कभी नहीं चल पायेंगें। हमें ‘सेरिब्रल पाल्सी’ है और आज भी बहुत बार हमारे साथ पक्षघात जैसी स्थिति हो जाती है।”

अपने साथ हुई इस दुर्घटना के बाद, लगभग 4 साल तक शेखर बिस्तर पर ही रहे। इस बीच उनके परिवार ने जैसे- तैसे करके उनके इलाज के लिए पैसे जुटाए। गाँव में घर- घर जाकर चंदा माँगा और कई बार इधर-उधर से कर्ज़ भी लिया। बहुत वक़्त तक शेखर पटना के सरकारी अस्पताल में ही रहे।

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शेखर के इलाज के लिए, उनके छोटे भाई सोनू ने भी बहुत ही कम उम्र में पढ़ाई छोड़कर काम करना शुरू कर दिया। घर के हालात जैसे भी रहे हों, उनका पूरा परिवार उनके साथ खड़ा रहा। उनके परिवार ने न तो खुद हिम्मत हारी और न ही शेखर को हारने दी।

शेखर की माँ, भाई और बहन

“जैसे- जैसे हम थोड़ा – बहुत ठीक हुए, तो हमने पटना में ही एक कमरा लेकर रहना शुरू किया। कोई न कोई काम ढूंढकर करने लगे, ताकि घरवालों की मदद कर सकें। पहले तो बैसाखी के सहारे चलते थे, पर फिर धीरे- धीरे खुद खड़ा होना शुरू किया। अभी भी हमारे घुटने अच्छे से नहीं मुड़ते हैं और एक हाथ भी कम काम करता है। हमारे एक पैर की एड़ी भी नहीं है, बस जैसे-तैसे जूतों में कुछ न कुछ लगाकर दौड़ते हैं,” शेखर ने भावुक होते हुए कहा।

पर शेखर के घर के हालत इतने खराब थे कि उनके पास काम करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। वे किसी भी तरह से अपने घरवालों पर बोझ नहीं बन सकते थे। लेकिन काम करने से उनकी हालत बिगड़ने लगी और उन्हें अपने गाँव लौटना पड़ा। घर लौटकर वे अपने आस- पड़ोस में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे।

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साथ ही, 2015 में उन्होंने अपनी बारहवीं कक्षा की परीक्षा भी दी। एक- दो साल घर रहने के बाद, वे एक बार फिर काम की तलाश में पटना पहुँचे। “हम और भी कई लोगों के साथ यहाँ कमरा शेयर कर रहे थे। उन्हीं में से एक ने हमें पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में दिव्यांगों के लिए हो रही राज्य-स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं के बारे में बताया। हम अपने स्कूल में खेलने-कूदने में बहुत अच्छे थे, तो हम भी अपने दोस्त के साथ वहाँ पहुँच गये।”

शेखर ने यहाँ अपने जैसे बहुत से खिलाड़ियों को देखा और फिर दिव्यांगो की T35- 38 केटेगरी के तहत दौड़ में भाग लिया। इस राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता में उन्होंने 400 मीटर, 800 मीटर और 1, 200 मीटर की दौड़ में गोल्ड मेडल जीते।

“हमें  नहीं पता कि उस दिन हम कैसे इतना दौड़ लिए। या तो बाकी लोगों को देखकर हमें जोश आ गया या फिर जो इतने सालों से हम मानसिक पीड़ा झेल रहे थे, उसे कहीं जाहिर करने का मौका हमको मिल गया था,” शेखर ने आगे कहा।

शेखर चौरसिया

इस राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता के बाद, साल 2018 में नेशनल पैरा-एथलीट चैंपियनशिप के लिए उनका चयन हो गया। इसकी तैयारी करने के लिए उन्होंने ‘अकैडमी ऑफ़ जिमनास्टिक, पटना’ ज्वाइन की। वैसे तो, दिव्यांगों के लिए अकादमी की फीस 1, 000 रूपये प्रति माह है, लेकिन अकादमी के कोच संदीप कुमार जी ने शेखर के हालातों को समझते हुए, उसे बिना किसी फीस के ट्रेनिंग देने का निर्णय लिया। शेखर बताते हैं कि यदि आज भी उन्हें कोई परेशानी होती है, तो उनके कोच हर सम्भव तरीके से उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं।

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इसी तरह, शेखर के जीवन में बिहार राज्य के निःशक्त आयुक्त, डॉ. शिव जी कुमार का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। डॉ. कुमार, राज्य में दिव्यांगों के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं। दिव्यांगों के लिए क्या-क्या सरकारी योजनायें हैं और उनके लिए क्या- क्या अवसर हैं, इस बारे में वे हमेशा ही लोगों को जागरूक करते रहते हैं।

अपने कोच संदीप कुमार के साथ शेखर चौरसिया

अपने परिवार और कुछ शुभचिंतकों के साथ के चलते ही, शेखर ने साल 2018 की चैंपियनशिप में भी तीन गोल्ड मेडल हासिल किये थे। इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जगह- जगह पर होने वाले टूर्नामेंट्स में लगातर भाग लेते रहे और एक के बाद एक मेडल जीत रहे हैं।

एथलेटिक्स के साथ-साथ, शेखर क्रिकेट में भी काफ़ी अच्छे हैं। उन्होंने नागपुर के एक क्रिकेट टूर्नामेंट में बिहार दिव्यांग क्रिकेट टीम की तरफ से खेला और अच्छा प्रदर्शन किया। इसके अलावा, उन्होंने राज्य-स्तरीय खेलों में रोहतास जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए, जैबलीन और शॉटपुट में भी गोल्ड मेडल जीते हैं।

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अब तक उन्हें कई अवॉर्ड्स जैसे कि राष्ट्रीय दिव्यांग श्रेष्ठ खेल सम्मान, अजातशत्रु अवॉर्ड, उत्तर- प्रदेश रत्न आदि से सम्मानित किया जा चूका है। शेखर की माँ कमलावती चौरसिया को भी ‘राष्ट्रमाता जीजा माँ’ पुरस्कार से नवाज़ा गया है, क्योंकि हर हाल में, वे अपने बेटे का सहारा बनीं और उसे आगे बढ़ने का हौसला दिया।

सम्मान पाते हुए शेखर (दायें) और उनकी माँ (बाएं)

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के बाद भी शेखर की ज़िंदगी का संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। आज भी अपने घर-परिवार की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए वे अकादमी में अपनी ट्रेनिंग के बाद काम करते हैं। साथ ही, अपनी ग्रेजुएशन भी कर रहे हैं।

“हमको जो काम मिल जाता है, हम कर लेते हैं क्योंकि हमको अपना खर्च चलाना है। कोई भी खिलाड़ी तभी अच्छा कर पाता है, जब उसका खान-पान सही हो, उसे हर तरीके की सुविधा मिले। पर हम तो जैसे-तैसे कमाकर अपना गुज़ारा कर रहे हैं। बाकी अगर हमको पटना में ही कोई स्थायी रोज़गार मिल जाये, तो शायद ज़िंदगी में परेशानी कुछ कम हो,” शेखर ने कहा।

जीवन के इतने मुश्किल हालातों में भी, शेखर के मन में कोई निराशा की भावना नहीं है। उनका लक्ष्य किसी दिन पैरा-ओलिम्पिक में दौड़ने का है। इसके अलावा, वे अपने परिवार को बेहतर ज़िंदगी देना चाहते हैं। अपनी तीनों बहनों की अच्छे से शादी करना और भाईयों को अपने पैरों पर खड़े होते हुए देखना ही उनका सपना है।

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बेशक, यह होनहार खिलाड़ी देश में बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा है। हमें उम्मीद है कि एक दिन शेखर चौरसिया अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी देश के लिए मेडल जीतेंगें।

यदि आप इस खिलाड़ी से सम्पर्क करना चाहते हैं या फिर किसी भी तरह से उनकी मदद कर सकते हैं, तो आप उनके भाई के नंबर 7763001282 पर डायल कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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