हम सबने अपने जीवन में बहुत से जुनूनी लोग देखे हैं। अजीबोगरीब जोश और जुनून के सहारे कुछ लोग दुनिया में अपनी एक अलग ही पहचान बनाने में कामयाब होते हैं, उन्हीं में एक नाम है नवल डागा का।
गुलाबी नगरी जयपुर में जन्मे नवल डागा आज पर्यावरण संरक्षण का पर्याय बन गए हैं। पेड़, पानी, वन्य जीव सरंक्षण के लिए वे 13 जुलाई, 1977 से काम कर रहे हैं। रोजमर्रा की ज़िंदगी में काम आने वाली वस्तुओं पर पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के मुहावरे, दोहे और लोकोक्तियों को अनूठे अंदाज़ में प्रिंट करके उनको आमजन तक पहुंचाने, आमजन को पर्यावरण बचाने, उनकी रूचि और सहभागिता बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे ट्री, वॉटर, वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन जैसे विषयों से जुड़े 6822 प्रकार के आइटम बनाते हैं। उनके यहां निर्मित होने वाले इन आइटम्स पर 14 भारतीय भाषाओं में पर्यावरण संरक्षण पर कुछ न कुछ ज़रुर लिखा होता है।
इन उत्पादों को बनाने के लिए किसी भी पेड़ को नहीं काटा जा रहा। सभी आइटम रीसायकल किए गए पदार्थों से तैयार किए जा रहे हैं।
‛द बेटर इंडिया हिंदी’ से बात करते हुए वे कहते हैं, “इन उत्पादों को बनाने में 19 तरीके के मैटेरियल काम आते हैं। लकड़ी, कांच, प्लास्टिक, कागज, गत्ता, फ्लेक्स, विनाइल आदि। हम जलावन वाली लकड़ी काम लेते हैं, जिसे गुटखा लकड़ी कहते हैं। बड़े-बड़े आइटम नहीं बनाते, बेहद छोटे आइटम बनाते हैं। ठेकेदार द्वारा बॉयलर वालों को लकड़ी के जो टुकड़े जलाने के लिए दिए जाते हैं, हम उनमें से हमारे काम के टुकड़े छांटकर लाते हैं, चूंकि उनको तो लकड़ी जलानी होती है इसलिए साइज से कोई मतलब नहीं होता, कि हम किस तरह के टुकडे ले जा रहे हैं।”
वे साल भर तक इन टुकड़ों को धूप में रखते हैं। इस दौरान बरसात आती है, सर्दी पड़ती है, गर्मी होती है। लकड़ी जितनी फटनी होती है, फट जाती है। इस लकड़ी द्वारा तीनों मौसम सहन करने के बाद एक हिसाब से उसकी सीज़निंग हो जाती है।
यह लकड़ी उन्हें 4 रुपए किलो में मिलती है, उनके काम में आने के बाद भी लकड़ी 4 रुपए प्रति किलो में ही वापस बिक जाती है।
इस लकड़ी से बनाए जाने वाले उत्पादों की गिनती नहीं है। पेन स्टैंड, मोबाइल स्टैंड, टेबल स्टैंड, चाबी स्टैंड जैसे बहुत से आइटम्स हैं, पचासों तरह की साइज है। जो लकड़ी उपलब्ध होती है, उसी आधार पर आइटम्स बनते हैं। वे खुद की मनमर्जी से कोई आइटम नहीं बनाते। उनका मुख्य उद्देश्य यही है कि लोगों को बताएं कि इन उत्पादों के निर्माण के लिए पेड़ नहीं काटे गए। जो लकड़ी काम में ली गई, वह भी जलावन लकड़ी थी।
उनके द्वारा बनाए गए लकड़ी के उत्पाद 25 से 100 रुपए के बीच बेचे जाते हैं। बड़े आइटम नहीं बनाए जाते, क्योंकि उसके लिए बड़ी लकड़ी की जरुरत होती है। लकड़ी के इन उत्पादों में किसी भी तरह की कील का कोई उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि लकड़ी छोटी और पतली होती है, इसलिए कील लगाने की प्रक्रिया के दौरान यह फट जाती है, इसलिए वैक्यूम क्रिएट कर उसे चिपकाया जाता है।
उनके द्वारा बनाए जा रहे उत्पादों में एक उत्पाद किताब भी है। रीसायकल पेपर द्वारा तैयार अधिकतर किताबें 3 से 6 रुपए के बीच की है तो कुछ किताबों की कीमत 8-9 रुपए है। सब किताबें 32 पेज की हैं।
वे अब तक 557 किताबें लिख चुके हैं, जिनकी प्रिंटिंग भी उन्होंने ही की है।
इतनी छोटी और सस्ती पुस्तकों को लिखने की प्रेरणा उन्हें 1969 में कर्पूरचंद कुलिश (हिन्दी समाचार राजस्थान पत्रिका समूह के संस्थापक, प्रख्यात कवि एवं लेखक) के एक आर्टिकल को पढ़कर मिली, जिसमें लिखा था कि बड़ी किताब नहीं छपनी चाहिए। उनकी किताब बहुत छोटी है, ताकि कोई भी आसानी से पढ़ सके। उनके अनुसार बड़ी किताब को कोई भी आदमी शर्म की वजह से खरीद भले ले, घर जाकर पढ़ने का भी बोले, पर पढ़ नहीं पाता। किताबें घर की अलमारी में ही पड़ी रहती हैं, जिसके भी घर में पड़ी हैं, उनको संतोष रहता है कि घर में रामायण है, महाभारत है। नवल की किताबें पेड़, पानी, जीव, रक्तदान, गाय और पर्यावरण पर केंद्रित हैं।
वह कहते हैं, “अब लोगों का पढ़ने का हाजमा खत्म हो चुका है, व्हाट्सएप-फ़ेसबुक ने सब बिगाड़ दिया, टीवी ने लोगों की पढ़ने की प्रवृत्ति को भुला दिया। अब व्हाट्सएप पर आए मेंसेज पढ़ने में भी तकलीफ़ होती है। यूट्यूब वीडियो का ज़माना है, इंसान केवल कानों से काम निकालना चाहता है।”

वे कचरे में से बीने गए कागज से किताबें छापते हैं, आइटम बनाते हैं, उनके इस काम से निम्न तबके के गरीब लोगों को रोजगार मिलता है। उनकी सोच है कि शहर का कचरा बीनने वालों को इनाम और पद्मश्री जैसा सम्मान मिलना चाहिए। जो लोग प्लास्टिक, कचरा, लोहा, लकड़ी बीनते हैं, इसकी वजह से कुछ चीजों के भाव कम होते हैं, गंदगी नहीं रहती, एक्सीडेंट नहीं होते। जो लोग कचरा उठा रहे हैं, उन लोगों को सब्सिडी देनी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे पढाई की फीस में छूट दी जाती है। ऐसा करने से यह लोग मोटिवेट होकर ज्यादा कचरा इकट्ठा करेंगे, जिससे ज्यादा कचरा रीसायकल होगा। देश का पर्यावरण हित होगा।
क्या-क्या है ख़ज़ाने में…?
उनके द्वारा कपड़े पर बुनाई करके संदेश लिखे जाते हैं, संभवत इस तरह का कार्य शायद ही कोई दूसरा कर रहा हो। इस प्रकार के संदेश वाले उनके पास 302 से ज्यादा प्रकार के कुशन है। देशवासियों की गौत्रों से जुड़े 546 प्रकार के आइटम्स हैं। 1000 से ज्यादा प्रकार की श्रद्धांजलियां हैं। 100 तरह के झोले हैं, जो कन्धों पर लटकाए जाते हैं। 60 विषयों का संदेश देते चैकबुक कवर सहित विभिन्न उत्पाद हैं।
इन उत्पादों का सबसे बड़ा ग्राहक पूरे देश में फैला फॉरेस्ट डिपार्टमेंट है। कुछ आइटम्स तो सिर्फ गिफ्ट्स देने के लिए ही बनते हैं। कुछ साल पहले जब गिने गए तो पता चला कि, 1269 आइटम सिर्फ गिफ्ट देने के काम आते हैं। गिफ्ट दिए जाने वाले आइटम्स पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश होता है।
नवल इस बात पर जोर देते हैं कि भले ही 2 साल तक पौधरोपण मत करो, लेकिन जो पेड़-पौधे लगे हैं उन्हीं को बचा लो, तो भी पर्यावरण संरक्षण हो जाएगा। लोग 100-100 पेड़ लगाने में लगे हैं। मान लो एक पेड़ को लगाने में 10 रुपए का खर्चा आता है तो इसमें 1000 रुपए खर्च हुए। यदि 10 पेड़ ही लगाए, 100 रुपए का ही खर्चा करें तो भी बहुत कुछ किया जा सकता है। सिर्फ 10 पेड़ों को ही बड़ा कर लीजिए, यह भी कोई छोटा काम नहीं।
“अब विश्वयुद्ध हुआ तो पानी की वजह से होगा। पीने को पानी नहीं है, नल से टपक टपककर भी यदि एक बाल्टी पानी भर जाता है तो देश में कितने घरों में ऐसा हो रहा होगा? नलों को सही करने की व्यवस्था करनी होगी। कपड़े वॉशिंग मशीन में सूखाते हैं, पानी जल जाता है, धूप में सूखाने पर वो बादल तक जाता और बादल आपके यहां नहीं तो कहीं और तो जाकर तो बरसेंगे। सभी ऐसा कर रहे हैं, यह हमारी नहीं, पूरे विश्व की समस्या है, ” नवल ने कहा।

सारा सृजन पिताजी की देन…
उनके पिताजी कृष्णभक्त थे। वे जब तक रहे, नवल डागा कभी भी सुबह 4 बजे से पहले नहीं सोए, उन्होंने इतनी बातें अपने पिताजी से की। वे जो भी कर रहे हैं, सारा सृजन उनके दिवंगत पिताजी की देन है। उनके पिताजी कहा करते थे, “भाग्य की रोटी तो कुत्ते भी खाते हैं, वो ऊपर बैठा ईश्वर सबको भूखा उठाता है, भूखा नहीं सुलाता है, पेट भराई उसका काम है। रोटी के लिए काम मत करो, काम मिनख जूण का करो। ऐसा लिख जिसको लोग पढ़ते रहे और ऐसा कर जिसपे लोग लिखते रहे। मेरे जाने के बाद भी तेरी वजह से लोग मुझे याद करे।”
उनके पिता कुर्ते की जेब में सदैव पोस्टकार्ड, पेन और कागज़ रखते थे, जब तक 10 पोस्टकार्ड नित्य न लिख लेते, भोजन ग्रहण नहीं करते। पिताजी के लिखे 36,600 पोस्टकार्ड आज भी इनके संग्रह में सुरक्षित हैं। पिताजी का ध्येय वाक्य था, “पेपर इस द बेस्ट सैक्रेटरी।”
घर को ही बना रखा है गार्डन, छत पर उगाते हैं सब्जियां
नवल न सिर्फ पुरानी चीज़ों से उत्पाद बनाकर और उस पर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश लिखकर प्रकृति को बचाने में अपना सहयोग दे रहे हैं बल्कि उन्होंने अपने घर को भी पर्यावरण अनुकूल बना रखा है। कम से कम जगह का अधिक से अधिक सदुपयोग कैसे हो? यह देखने के लिए एक बार सबको इनके घर आना चाहिए।
नवल डागा के यहां एसी नहीं है। जब कभी गर्मी की दोपहर में 42, 44, 46 डिग्री तापमान होता है, इनके घर जाकर बाहर और अंदर के तापमान में अंतर का जायजा ले सकते हैं। बाहर के तापमान और इनके घर के अंदर के तापमान में कम से कम 9 से 13 डिग्री का फर्क होता है। पूरे घर को गिलोय और जीवंती की बेलों से ढक रखा है।
वे अपने घर की छत पर सब्जियां उगाते हैं। उनके पास 395 गमले हैं, जहाँ ड्रिप से मात्र 9 मिनट में पानी पिलाया जाता है। हर गमले पर नम्बर है, गमले के नीचे उसी नम्बर का टब है। सभी गमलों और टबों पर दोहे हैं, कुल 176 दोहे हैं, एक भी दोहा दोहराया नहीं गया है।
उनके यहाँ छत पर 10 फ़ीट ऊंचा लोहे का स्ट्रक्चर बनाया गया है, जिसमें 100 मीटर लम्बी एलइडी लाइट्स लगाई गई है। 40 आदमी एक साथ बैठ सके, ऐसी व्यवस्था है। इस पर्यावरण घर में आईएएस, आईएफएस, रेंजर्स की क्लासेज लगती है।
दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण पर सिद्धार्थ कक्कड़ और रेणुका शहाणे द्वारा होस्ट किए गए ‛सुरभि’ कार्यक्रम में 1990 में नवल के घर और दफ्तर की पर्यावरण सरंक्षण आधारित गतिविधियों को दिखाया गया था। इसके लिए नवल को 1 लाख रुपए का इनाम भी मिला।
अगर नवल डागा की यह कहानी आपको अच्छी लगी और आप उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो 09460142430, 01412512221, 01412521703 पर बात कर सकते हैं। आप उन्हें ई-मेल भी कर सकते हैं और उनसे फेसबुक पर भी जुड़ सकते हैं।
संपादन – भगवती लाल तेली
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