जिस उम्र में बच्चे खेलते कूदते और पढ़ते है उस उम्र में शुगनी (बदला हुआ नाम) को नक्सली उसके घर से उठाकर ले गए। 9 साल की उम्र से करीब 7 साल तक शुगनी ने अपनी जिंदगी नक्सलियों के साथ काटी। लेकिन परिवारवालों की सहायता और अपनी हिम्मत के बलबूते पर आज शुगनी एक सामान्य जीवन जी रही है। 

साल 2002 में शुगनी को झारखंड के चाईबासा जिले के सारंडा में स्थित उसके गांव से नक्सली बंदूक की नोक पर अपने साथ ले गए। शुगनी अपनी दो सहेलियों के साथ महुआ चुनने जंगल गई थी , लेकिन उसके बाद वो अपने घर करीब 7 साल बाद लौटी। वो भी तब जब नक्सलियों के कमांडर ने शुगनी को कुछ दिन घर में रहने की इजाजत दी लेकिन उसके बाद से शुगनी कभी वापस नहीं गई वो अब अपनी जिंदगी जी रही है एक ऐसी जिंदगी जिसे वो जीना चाहती थी।

“मैं बहुत गरीब घर में पैदा हुई थी , हमलोग दिन –रात में एक बार खाना खाकर जीवन काटते थे, ऐसे हालात में एक दिन हमारे गांव में नक्सलियों का एक दल पहुंचा, तब मेरी उम्र 9 साल थी  और वो मुझे अपने साथ ले गये। कई सालों तक मैं नक्सलियों के साथ रही। उन दिनों एक दिन हमारी(नक्सलियों)की टोली  मेरे गांव पहुंची, मैने अपने दल के कमांडर से कुछ दिन घर पर रहने की इच्छा जताई। कमांडर ने इजाजत तो दे दी लेकिन चालूपंथी न करने की हिदायत भी दी। मैं अपने परिवार के साथ रूक गई , मेरे परिवार ने जल्दी से मेरी शादी कर दी और फिर मैं शादी के बाद दिघा गांव आ गई।”

-शुगनी

अपनी आप बीती सुनाते हुए सारंडा के शुगनी के चेहरे पर डर, चिंता और मन में अजब सी बौखलाहट थी, कभी चुप हो जाती तो कभी इधर- उधर देखती।

शुगनी नक्सलियों के साथ बिताए उन दिनों को याद नहीं करना चाहती थी। वो बताती है कि 400 मर्दौं के बीच में सिर्फ 50 महिलाएं थी जिनके साथ जमकर वो अत्याचार भी करते थे और काम भी कराते थे।

शुगनी

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नक्सलियों के कैंप में कई साल बीताने वाली शुगनी बताती है

” मेरी शादी तो मेरे परिवार के लोगों ने कर दी लेकिन उसके बाद जब मैं वापस नहीं गई तो नक्सलियों से मेरे परिवार को धमकी मिलनी शुरू हो गई। नक्सली ने मेरे घर में आकर मेरे मां- बाप को बहुत बेईज्जत किया लेकिन उनको मेरा कोई सुराग नहीं मिला। मैं अब अपने पति और बच्चे के साथ अपनी जिंदगी जी रही हूं…एक ऐसी जिंदगी जिसका मैं बचपन से सपना देखती थी।“

शुगनी की शादी भी एक गरीब परिवार में हुई थी। जैसे –तैसे मजदूरी करके जीवन कट रहा था। लेकिन शुगनी ने इतनी विषम परिस्थितियों में भी कभी खुद को कमजोर नहीं होने दिया। वो अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए जिंदगी की जद्दोजहद में जूझती रही। शुगनी इन दिनों एक वक्त का खाना खाकर अपने पति के साथ जी रही थी।

तभी गांव में आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह बनना शुरू हुआ और शुगनी उस समूह से जुड़ गई।

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शुगनी की शादी भी एक गरीब परिवार में हुई

धीरे-धीरे समूह से कर्ज लेकर, शुगनी अपनी रोजाना की जरुरतों को पूरा करने लगी, फिर जंगल से पत्ते तोड़कर बेचती और वापस करती।

शुगनी बताती है कि स्वंय सहायता समूह से जुड़ने के बाद उसकी जिंदगी में खुशहाली आई।

“पहले कोई भी जरुरत पड़ने पर एक रुपया भी कोई कर्ज नहीं देता था। अब हम महिलाओं का समूह है जो हमारी माँ की तरह हमेशा हमारे लिए खड़ा रहता है। स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद मैने कर्ज लेकर बकरी खरीदी और अब तो अपना घर भी बना रही हूं, बकरी से भी पैसे कमा रही हूं और पत्तल बनाकर भी।”

शुगनी आगे बताती है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत स्वयं सहायता समूह है जिसकी अन्य सदस्य महिलाएं हर सुख-दुख में उसके साथ रहती है।

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शुगनी बीते दिनों को याद कर बताती है कि उसने सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि वह नक्सलियों के चंगुल  से बाहर निकल पाएगी लेकिन भगवान और उसके मां- बाप ने उसे नक्सलियों की कैद से बाहर निकलने में मदद की। आज शुगनी अपने परिवार के साथ सुखद जिंदगी जी रही है वह बताती है कि उसके  पास दो वक्त का खाना है और परिवार का साथ है, उसे कुछ और नहीं चाहिए। वह अपने नक्सल के दिनों को याद करते हुए सिहर उठती है , आंखे नम हो जाती है, गला रुंध जाता है लेकिन जुंबा पर सिर्फ और सिर्फ खामोशी रहती है।

हम शुगनी जैसे तमाम महिलाओं की हिम्मत की सराहना करते है, जिन्होंने नक्सलियों के दबाव और आर्थिक मुश्किलों के बावजूद अपनी हिम्मत के बलबूते पर एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत की।

(शुगनी बदला हुआ नाम है जो महिला की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया है। )

 

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