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INA में सेनानी रह चुकी रमा बेन है देश की सबसे बुज़ुर्ग पर्यटक गाइड !

89 वर्ष की उम्र में रमा सत्येन्द्र खंडवाला (रमा बेन) न सिर्फ सबसे वृद्ध पर्यटक गाइड हैं बल्कि INA की श्रेष्ठ सैनिक भी रह चुकी हैं।

रमा आजाद हिन्द फौज के रानी झाँसी रेजिमेंट में दो साल तक सेकेण्ड लेफ्टिनेंट रहीं।

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रमा का जन्म 1926 में बर्मा के रंगून में हुआ था। वो कई साल से पर्यटक गाइड का काम कर रही हैं और अभी भी उनका अपने काम को छोड़ने का कोई इरादा नहीं है।
रमा आगरा के बाहर काम करती हैं। उन्हें इस बात का दुख है कि आजकल के गाइड अपने फायदे के लिए पर्यटकों को भटकाते है। वे गाइड कम और दुकानदारों के दलाल ज्यादा होते है और इन पर्यटकों को लूटते है।

 

एक वैध गाइड होने के नाते रमा खुद को बाहरी पर्यटकों के सामने देश की प्रतिनिधि मानती हैं। इस मामले में वे खुद को किसी राजदूत से कम नहीं मानतीं। उनका कहना है कि इस तरह पर्यटकों के भरोसे का फायदा उठाने वाले गाइड, देश की छबि खराब कर रहे हैं।

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रमा ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “इस हानी को रोकने के लिए पुलिस और पर्यटन विभाग में तालमेल जरूरी है। इन दलालों का ऐतिहासिक स्थलों पर प्रवेश ही वर्जित कर देना चाहिए। अगर इन्हें अभी नहीं रोका गया तो ये पूरे पर्यटन उद्योग पर ही कब्जा कर लेंगे। टूर ऑपरेटरों को भी अपने छोटे-छोटे फायदों के सामने देश की छबि के बारे में सोचना चाहिए। ये खतरे में है।“

 

रमाबेन का परिवार स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता था। इसलिए रमाबेन के अंदर भी बचपन से ही कर्तव्य और देशभक्ति की ज्योति जल रही थी। युवावस्था में वो सुभाष चंद्रबोस से काफी प्रभावित थीं। INA में सेवा देने के बाद, द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने पर उन्हें नजरबंद भी कर दिया गया था।
1946 में उनका परिवार मुम्बई आ गया। तब उन्होंने कई तरह के काम किए। कभी सचिवालय में तो कभी नर्स का काम किया। रमा को जापानी भाषा पर अच्छी पकड़ थी, इसलिए कुछ दिन भाषा अनुवादक का भी काम किया। जब उन्हें पता चला कि सरकार पर्यटक गाइड के लिए प्रशिक्षण दे रही है तो उन्होंने तय कर लिया कि उनके लिए यही काम सही है।

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“डेस्क जॉब में मेरी कभी भी रूचि नहीं थी। मैंने प्रशिक्षण प्रोग्राम में दाखिला ले लिय़ा,“ रमा ने बताया।

 

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भारत के पर्यटक गाइड में सिर्फ 17-18% ही महिलाएं हैं। इस निम्न प्रतिशत को देखते हुए रमा औऱ महिलाओं को भी इस काम में देखना चाहती हैं।

 

रमा का कहना है, “सब मानसिकता पर निर्भर करता है। कुछ लोग, खासकर उत्तर भारत के लोग इसे अच्छा पेशा नहीं मानते हैं। जबकि, ये सबसे अनोखा और रोमांचक पेशा है। हमें नई-नई जगह देखने के लिए मिलती हैं और दुनिया भर के लोगों से मिलने का मौका मिलता है।“

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मूल लेख- निशि मल्होत्रा

Feature image credit
 

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