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कप्तान हवा सिंह: भारत का वह चैंपियन बॉक्सर, जिसने हरियाणा को बॉक्सिंग सिखाई!

भारतीय सेना में कप्तान और बॉक्सर हवा सिंह का जन्म 16 दिसंबर 1937 को हरियाणा में भिवानी जिले के उमरवास गाँव में हुआ था। हवा सिंह ने साल 1961 से लेकर 1972 तक लगातार 11 बार नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीती। वे इकलौते भारतीय बॉक्सर हैं जिन्होंने एशियाई खेलों में बॉक्सिंग में दो स्वर्ण पदक जीते।

साल 2008 में बॉक्सर विजेंद्र सिंह ने ओलिंपिक खेलों में कांस्य पदक जीता। यह बॉक्सिंग के खेल में भारत का पहला ओलिंपिक मेडल जीतकर, न सिर्फ़ मीडिया और सरकार का, बल्कि पूरे देश का ध्यान बॉक्सिंग की तरफ खींच लिया। हालांकि, ये पहली बार नहीं था कि इस खेल में भारत ने खुद को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साबित किया हो। इससे पहले भी भारत में ऐसे बॉक्सर हुए हैं, जिनके बनाए रिकॉर्ड आज तक कोई नहीं तोड़ पाया है।

50 के दशक में बाकी खेलों की तरह बॉक्सिंग भी धीरे-धीरे भारत में अपने पाँव जमा रही थी। उस समय ज़्यादातर इस खेल को सेना के खेमों में खेला जाता था, जहाँ आर्मी के अफ़सर एक-दूसरे के साथ बॉक्सिंग करते थे। पर आर्मी के एक अफ़सर ने इस खेल में न सिर्फ़ अपनी पहचान बनाई, बल्कि रिटायरमेंट के बाद इसे आर्मी कैंपस से निकालकर भारत के गली-मोहल्लों तक ले गये।

यह अफ़सर थे कप्तान हवा सिंह, जिन्होंने उस जमाने में भारत का परचम पूरे विश्व में लहराया, जब बॉक्सिंग का खेल भारत में पनप ही रहा था!

कप्तान हवा सिंह
photo source -sportskeeda.com

कप्तान हवा सिंह का जन्म 16 दिसंबर 1937 को हरियाणा में भिवानी जिले के उमरवास गाँव में हुआ था। लंबे कद और हष्ट-पुष्ट शरीर वाला यह नौजवान 19 साल की उम्र में भारतीय सेना में शामिल हुआ। सेना में शामिल होने के कुछ समय के भीतर ही, हवा सिंह ने बॉक्सिंग करना शुरू कर दिया। पहले शुरुआत सिर्फ़ मस्ती-मज़ाक में हुई, पर फिर इस खेल में उनकी दिलचस्पी बढ़ती चली गयी।

साल 1960 में उन्होंने उस वक़्त के चैंपियन मोहब्बत सिंह को हराकर वेस्टर्न कमांड का खिताब जीता। यह तो बस शुरुआत थी, इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हवा सिंह ने साल 1961 से लेकर 1972 तक लगातार 11 बार नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीती। उनके इस रिकॉर्ड की आज तक कोई भी भारतीय बॉक्सर बराबरी नहीं कर पाया है।

हवा सिंह (फोटो साभार: द ट्रिब्यून)

न सिर्फ़ राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हवा सिंह ने अपना परचम लहराया। साल 1962 में जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में बॉक्सिंग टूर्नामेंट के लिए जाने वाले भारतीय बॉक्सिंग खिलाड़ियों में हवा सिंह का नाम सबसे पहले था। पर उस समय भारत में खेलों के लिए बहुत ज़्यादा फंड नहीं थे और चीन के साथ भी भारत विवादस्पद स्थिति में था। इसलिए फ़ैसला लिया गया कि बॉक्सिंग टूर्नामेंट के लिए कोई भारतीय खिलाड़ी नहीं जायेगा।

चुनौतियाँ तो बहुत आई, पर हवा सिंह का जज़्बा कम ना हुआ। साल 1966 में हुए एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर, उन्होंने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत किसी से कम नहीं। इतना ही नहीं, उन्होंने साल 1970 के एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता।

एशियाई खेलों में बॉक्सिंग के लिए दो स्वर्ण पदक जीतने वाले वे इकलौते भारतीय बॉक्सर हैं।

फोटो साभार

उनकी इस सफलता के चलते साल 1966 में भारत सरकार ने उन्हें ‘अर्जुन अवॉर्ड’ से नवाज़ा और साल 1968 में भारतीय सेना के अध्यक्ष ने उन्हें ‘बेस्ट स्पोर्ट्समेन ट्रॉफी’ से सम्मानित किया।

कहा जाता है कि साल 1974 में हुए एशियाई खेलों में भी उन्होंने अपने ईरानी प्रतिद्विंदी को धूल चटा दी थी, पर उस टूर्नामेंट में रेफरी के गलत फ़ैसले के चलते उन्हें स्वर्ण पदक नहीं मिल पाया।

साल 1986 में वे भारतीय सेना से रिटायर हुए और साथ ही, बॉक्सिंग रिंग से भी संन्यास लिया। हालांकि, इसके बाद वे खुद भले ही रिंग में नहीं उतरे, पर उन्होंने बॉक्सिंग में ऐसे खिलाड़ी तराशे, जिनकी बदौलत आज भारतीय बॉक्सिंग का परचम ओलिंपिक तक लहरा रहा है।

80 के दशक में ही स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने देशभर में बॉक्सिंग के सेंटर शुरू करने का फ़ैसला किया। इनमें से एक हरियाणा के भिवानी में खुला। इस सेंटर की कमान हवा सिंह को सौंपी गयी, क्योंकि एक तो वे हरियाणा से थे और दूसरा, भावी पीढ़ी को इस खेल के गुर सिखाने के लिए उनसे बेहतर कोई और नाम नहीं था।

इस सेंटर के पहले बैच में दस छात्र थे, जिन्होंने हवा सिंह के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग ली। इस बैच में ही भारत के एक और मशहूर बॉक्सर राजकुमार सांगवान का नाम आता है, जिन्होंने बॉक्सिंग में भारत के नाम 4 अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक किये थे।

सांगवान कहते हैं कि, “हवा सर हमें बताते थे कि बॉक्सिंग बहुत सरल है, इसमें आपको बस पंच मारने हैं और सामने वाले के पंच से बचना है।”

हवा सिंह का ट्रेनिंग देने का तरीका आर्मी स्टाइल में था, जिसे झेल पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। वे अपने छात्रों को सुबह-सुबह पक्की सड़क पर दौड़ लगवाते थे और वह भी बहुत साधारण जूतों में, जिनकी सोल बहुत पतली होती थी।

सांगवान बताते हैं कि बहुत बार उनके पैरों में छाले पड़ जाते थे। पर जैसे ही दौड़ खत्म होती, हवा सर उन सबको प्रैक्टिस शुरू करने के लिए कह देते।

राजकुमार सांगवान

उनका वेट-लिफ्टिंग करवाने का तरीका भी बिल्कुल अलग था। वे अपने छात्रों से एक-दूसरे को कंधे या कमर पर उठाकर दौड़ लगवाते थे। सांगवान कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि उस समय उन लोगों ने ट्रेनिंग के दौरान कभी किसी चोट या फिर मोच के बारे में शिकायत की हो, बल्कि हवा सिंह की इस रणनीति से खिलाड़ियों के कंधे और पैर काफ़ी मजबूत हो जाते थे।

हालांकि, हवा सिंह की ट्रेनिंग से दुखी होकर सांगवान एक बार बॉक्सिंग छोड़कर अपने गाँव वापिस चले गये थे। उन्होंने बताया,

“सर को मेरे घर का पता चला और वे मेरे घर आ गए। उनकी मेरे पिता से थोड़ी-बहुत जान-पहचान थी, तो उन्होंने उनसे मुझे वापिस भेजने के लिए कहा। फिर वे मुझसे मिले और कहा, ‘मैं तेरी परेशानियाँ समझता हूँ, तू छोड़कर मत जा, एक दिन तू बहुत बड़ा बॉक्सर बनेगा।'”

हवा सिंह की कही बात सच साबित हुई। उनकी ट्रेनिंग और सांगवान की मेहनत रंग लायी। आज राजकुमार सांगवान का नाम भारत के सबसे बेहतरीन बॉक्सिंग खिलाड़ियों में शुमार होता है।

बॉक्सिंग के क्षेत्र में हवा सिंह के योगदान को देखते हुए साल 1999 में उन्हें द्रोणाचार्य सम्मान देने की घोषणा दी गयी। हालांकि, साल 2000 में इस पुरस्कार के मिलने से पन्द्रह दिन पहले ही 14 अगस्त को उनका निधन हो गया। उनकी जगह यह सम्मान उनकी पत्नी ने ग्रहण किया।

आज यह कहना शायद बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि हरियाणा और भिवानी को बॉक्सिंग करना हवा सिंह ने सिखाया। इस क्षेत्र से ही विजेंद्र सिंह, अखिल कुमार, जीतेन्द्र कुमार जैसे बॉक्सर निकले हैं, जिन्होंने बॉक्सिंग में भारत का नाम ऊँचा किया। कहीं न कहीं ये हवा सिंह की ही विरासत है जो आज भिवानी को ‘मिनी क्यूबा’ कहा जाता हैं।

उनके नाम पर भिवानी में आज कप्तान हवा सिंह बॉक्सिंग अकैडमी है और यहाँ पर ट्रेनिंग लेने वाले सभी खिलाड़ी बॉक्सिंग में अपनी पहचान बना रहे हैं।

(संपादन – मानबी कटोच)


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