Placeholder canvas

कला में ब्राह्मणवाद*

किसान के लिए लिखी कविता एक बच्चे की जंगल की कहानी से कैसे बेहतर है? Apples and oranges. तुलना क्यों?

साहित्य में ब्राह्मणवाद है. नकारना चाहें तो नकार दें. लेकिन लेखकों की ज़ातियों में विभाजन इतना है कि हिंदी लेखन ही हाशिए पर दिखता है. मठाधीश, वरिष्ठ, नया, संपादक का प्यारा, महान नेटवर्कर.. शायद ही कोई हिंदी का लेखक हो जो अन्य लेखकों पर जली-कटी टिप्पणी करने की प्रेरणा से बचा हो. सिर्फ़ हिंदी साहित्य में ही ऐसी insecurity नज़र आती है कि लेखक एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चलने के लिए मजबूर हैं.. नदी में पता नहीं किस बाढ़ का अंदेशा है. मिल जुल कर हज़ार दो हज़ार लेखकों का समूह एक दूसरे से ‘मार ही डालोगी जिज्जी’ और ‘सटीक और महत्वपूर्ण कविता भैया’ के बिना लेखन ही नहीं कर पा रहा है.

किसान के लिए लिखी कविता एक बच्चे की जंगल की कहानी से कैसे बेहतर है? Apples and oranges. तुलना क्यों? आजकल बहुत हद तक लेखनी तारीफ़ के लिए लिखी जाती है. इसलिए छिछली होती है. एक फ़ॉर्मूले पर आधारित क्राफ़्ट. इसी वजह से लेखक का आत्मविश्वास पिघला हुआ रहता है जिसे लाइक्स की तीलियों से किसी तरह खड़ा रखा जाता है. और सबको पता है जितने ज़्यादा लाइक्स देंगे उतने मिलेंगे. इसीलिए 400 लाइक्स वाले 25 लाइक्स वालों से भी जलते हैं कई बार.

बहरहाल, शायद आप सभी को साहित्य के ब्राह्मणवाद का इल्म है. लेकिन वही संगीत में और कला के अन्य क्षेत्रों में भी दृष्टिगोचर है. मसलन शास्त्रीय, लोक से ऊँचा है. सुगम छोटा है. फ़िल्मी व्यावसायिक है, क़व्वाली हो तो बस सूफ़ी हो, भजन भी संगीत है क्या? ग़ज़ल को ऐसे ही गाना है.. आदि आदि.

हिन्दी कविता प्रॉजेक्ट की वजह से एक बर्ड आई व्यू मिला है कला के आयामों को देखने का और निजी साक्षात्कार भी हुए हैं कई स्थापित और ग़ैर-स्थापित प्रतिभाओं से. पारिवारिक विरासत यहाँ भी काम आती है, नेटवर्किंग के बिना काम नहीं चलता है, शिष्य अधकचरा रियाज़ होते हुए, गुरु से आगे निकलने की होड़ में हैं. गुरु को गँवारा नहीं कि पट्ठा बीस साल सीख के भी आगे निकले. एक गुरु दूसरे की साड़ी पर तंज़ करने का मौक़ा नहीं चूकता और क्या मैंने नेटवर्किंग की बात की? अधकचरे आईएएस अधिकारियों की जो अपने आपको विशेषज्ञ समझते हैं और अपने घमण्ड में फंसे रहते हैं, उनकी बीवी पेंटिंग प्रदर्शनी लगाती है – जनता ताली बजाती है, चाटुकारों की बन आती है..

आज की चाय थोड़ी तल्ख़ है मुंबई में इतना अच्छा मौसम होने के बावजूद भी क्योंकि एक लम्बी लड़ाई चल रही है. मंजे हुए कलाकार जिन्हें मंच नसीब नहीं हुआ है, जिन्हें आलोचना मिली, सलाह नहीं (और आलोचना भी न जाने कौन से मानकों से की गई है) – जो बेचारे अकेले लड़ रहे हैं. हिंदी कविता इस तरह के कलाकारों – लेखकों का मंच भी है. हमारे पास पैसे नहीं हैं लेकिन कभी किसी कमज़र्फ़ से हाथ भी नहीं मिलाया है. देखते हैं कि कितना अंधेर है इस दुनिया में..

बहरहाल आपके लिए आज एक निराली पेशकश है जो आपके दिलों में सकारात्मक उमंगें भर देगी :


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

We at The Better India want to showcase everything that is working in this country. By using the power of constructive journalism, we want to change India – one story at a time. If you read us, like us and want this positive movement to grow, then do consider supporting us via the following buttons:

X