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‘हेल्पिंग हैंड’ के ज़रिये ज़रूरतमंदों को मिल रहे है व्हीलचेयर जैसे कई उपकरण सिर्फ १ रूपये में !

विकलांगो की मदत के लिए साधन ज़्यादातर बहुत महंगे होते है। एक व्हीलचेयर की कीमत हज़ारो में होती है, वही बैसाखियाँ खरीदने के लिए भी कुछ सौ रूपये आपको खर्च करने ही पड़ते है। कई बार तो इस्तेमाल करने वाले को बहोत कम समय के लिए इनकी ज़रूरत होती है। वड़ोदरा की फाल्गुनी दोषी ने इन साधनो को कम दाम में ज़रूरतमंदों तक पहुचाने का बीड़ा उठाया।

विकलांगो की मदत के लिए साधन ज़्यादातर बहुत महंगे होते है। एक व्हीलचेयर की कीमत हज़ारो में होती है, वही बैसाखियाँ खरीदने के लिए भी कुछ सौ रूपये आपको खर्च करने ही पड़ते है। कई बार तो इस्तेमाल करने वाले को बहोत कम समय के लिए इनकी ज़रूरत होती है। वड़ोदरा की फाल्गुनी दोषी ने इन साधनो को कम दाम में ज़रूरतमंदों तक पहुचाने का बीड़ा उठाया।

यह किस्सा तब से शुरू हुआ जब एक दिन अपनी सहेली सोनल से मिलने वड़ोदरा गयी। सोनल की दादी एक लंबी बीमारी के बाद अभी अभी ठीक हुई थी। ठीक हो जाने पर उन्हें अब अपने व्हीलचेयर और वॉकर की ज़रूरत नहीं थी। और ये दोनों ही चीज़े बेकार ही पड़ी थी।

तभी फाल्गुनी को इस बात का विचार आया कि ये चीज़े अब किसी और ज़रूरतमंद के काम आ सकती है। और जल्द ही इन दोनों सहेलियों ने बेकार पड़े व्हीलचेयर और वॉकर को सिर्फ १ रूपये में किराए पे देने का फैसला कर लिया।

इसी तरह सन् १९९९ में सिर्फ चार चीज़ों के साथ ‘हेल्पिंग हैंड’ की शुरुवात हुई।

Falguni (left) started with just a few equipments.
फाल्गुनी (बाँए) ने सिर्फ एक व्हीलचेयर से इस काम की शुरुवात की !

कुछ सालो में ही इस छोटे से प्रोजेक्ट को बाहरी मदत मिलने लगी। कई लोगो ने अपने व्हीलचेयर, ट्रांसपोर्ट चेयर, वॉकर, केन जैसी चीज़े दान में दे दी।
अब फाल्गुनी इन उपकरणों को और ज़्यादा तादात में किराए पर देने लगी।

“ये बहोत ही छोटा सा विचार था। हमें बिलकुल अंदाजा नहीं था कि ये प्रयोग इतना सफल होगा। १६ साल गुज़र चुके है और अब भी मेरे पास दिन में कम से कम दो या तीन ज़रूरतमंद लोग ज़रूर आते है।”
– फाल्गुनी कहती है।

सोनल को कुछ निजी कामो की वजहों से ये प्रोजेक्ट छोड़ना पड़ा पर फाल्गुनी के लिए ‘हेल्पिंग हैंड’ पार्ट टाइम से बढ़कर हो गया।

फाल्गुनी के काम की चर्चा जल्द ही हर तरफ होने लगी और कई ज़रूरतमंद लोग इन उपकरणों को किराये पर लेने उनके पास पहुचने लगे।

उपकरणों की पूरी कीमत डिपॉज़िट के तौर पर पहले ही रख ली जाती है। और जब उपकरण वापस किया जाता है तो डिपॉज़िट भी खरिददार को वापस कर दिया जाता है।

जो लोग डिपॉज़िट की रकम नहीं दे पाते फाल्गुनी उनसे पैसे नहीं लेती।

ज़्यादातर लोग कुछ हफ़्तों के लिए या कुछ महीनो के लिए उपकरण किराए पर लेते है।

“शुरुवात में मैं इन चीज़ों को मुफ़्त में दे देती थी। पर फिर मुझे लगा कि मुफ़्त में मिली हुई चीज़ों की लोग कद्र नहीं करते। किराया देना होगा और डिपॉज़िट भी रहेगा तो लोग चीज़ों का ध्यान रखेंगे।”

– फाल्गुनी

हेल्पिंग हैण्ड के पास जो उपकरण है उनमे से ज़्यादातर उपकरण दान में मिली हुई है। पर कुछ फाल्गुनी ने बिलकुल नए खरीदे है। जिनके पास डिपॉज़िट के पैसे नहीं होते, उन्हें सिर्फ इसका किराया देना होता है।
फाल्गुनी के मुताबिक़ ” इस काम के पीछे हमारा मुख्य उद्देश्य बेकार पड़े उपकरणों को काम में लाना था। इसीलिए अगर कोई डिपॉज़िट नहीं दे पाता तो हम इस बात की परवाह नहीं करते। हमारे लिए ऐसे ज़रूरतमंद लोगो की मदत करना ज़्यादा ज़रूरी है।”
आज ‘हेल्पिंग हैंड’ के पास पुरे गुजरात से निवेदन आते है। पर फाल्गुनी ने अपना काम अभी वड़ोदरा तक ही सीमित रखा है।

“अभी मेरे पास इस काम को और बढ़ाने के साधन नहीं  है, क्योंकि अभी मैं अकेले ही इस काम को कर रही हूँ। पर मेरा परिवार मेरे इस काम में मेरा पूरा सहयोग करता है।

– फाल्गुनी कहती है।

हालांकि अभी तक फाल्गुनी को इस काम में ज़्यादा मुश्किलो का सामना नहीं करना पड़ा; पर फिर भी कई बार जब लोग बिना बताये टूटी हुई चीज़े वापस करते है, तो दिक्कत होती है।

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पर ये मुश्किलें फाल्गुनी के मनोबल को बिलकुल कमज़ोर नहीं करती। कुछ ग्राहक तो फाल्गुनी से इतने घुल मिल गए है कि वे अपना सुख दुःख बांटने अक्सर फाल्गुनी के पास आते है।

फाल्गुनी भावुक होकर बताती है –
जो लोग मुझसे ये सामान लेने आते है वे ज़्यादातर अपनी बिमारी से तंग आ चुके होते है। अपने घरवालो और दोस्तों से तो वे इस विषय पर काफी बार बात कर चुके होते है। पर क्योंकि इस विषय में ही काम करने की वजह से मुझे उनकी बीमारियो के बारे में पता होता है , तो उन्हें भी मुझे अपनी तक्लीफे बताना अच्छा लगता है। और मैं उनके इस प्यार और विश्वास का बहोत मान करती हूँ।”

फाल्गुनी एक बेहद ही भावुक वाक्या याद करते हुए बताती है कि एक बार उन्हें गुप्ता जी नामक एक व्यक्ति का फ़ोन आया। गुप्ता जी की माताजी का हाल ही में लंबी बिमारी के बाद देहांत हो चूका था। और उन्हें अपनी माँ के इस्तेमाल किये हुए कुछ उपकरण दान करने थे।

“गुप्ता जी के दिए सारे उपकरण विदेशी थे और बहोत महंगे भी थे। जब उन्होंने हमारा काम देखा तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कुछ पैसे भी दान में दिए ताकी हम और सामान खरीद सके। उनके इस उदार व्यवहार से कई लोगो का जीवन ही नहीं सुधरा बल्कि मुझे भी इस बात का हौसला हुआ कि मैं कुछ अच्छा कर रही हूँ।”

यदि आप वड़ोदरा में किसी भी ऐसे व्यक्ति को जानते है जिन्हें इस तरह के ओर्थपेडीक उपकरनो की ज़रूरत है तो आप उनहे फाल्गुनी के बारे में बता सकते है। और यदि आपके पास इस तरह के उपकरण बेकार पड़े है तो आप जानते ही है कि आपको अब क्या करना है।

अधिक जानकारी के लिए फाल्गुनी को falgunikd19@gmail.com पर मेल करे।

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