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‘मातोश्री’ रमाबाई : वह महिला, जिसके त्याग ने ‘भीमा’ को बनाया ‘डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर’!

‘भारतीय संविधान के निर्माता’ और भारत के पहले कानून मंत्री, डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने अपने जीवन में हर कदम पर चुनौतियों का सामना किया। लेकिन वे कभी रुके नहीं। उनके इस सफ़र में बहुत-से लोगों ने उनका साथ दिया। कभी उनके स्कूल में एक शिक्षक ने उनसे प्रभावित होकर उनको अपना उपनाम दे दिया, तो बड़ौदा के शाहू महाराज ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया था।

इन सब लोगों के बीच एक और नाम था, जिसके ज़िक्र के बगैर बाबासाहेब की सफ़लता की कहानी अधूरी है। वह नाम है रमाबाई आम्बेडकर!

‘मातोश्री’ रमाबाई

रमाबाई भीमराव आम्बेडकर बाबा साहेब की पत्नी थीं। आज भी लोग उन्हें ‘मातोश्री’ रमाबाई के नाम से जानते हैं। 7 फ़रवरी 1898 को जन्मी रमा के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। ऐसे में उनके मामा ने उन्हें और उनके भाई-बहनों को पाला।

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साल 1906 में 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी बॉम्बे (अब मुंबई) के बायकुला मार्किट में 14-वर्षीय भीमराव से हुई। रमाबाई को भीमराव प्यार से ‘रामू’ बुलाते थे और वो उन्हें ‘साहेब’ कहकर पुकारतीं थीं। शादी के तुरंत बाद से ही रमा को समझ में आ गया था कि पिछड़े तबकों का उत्थान ही बाबा साहेब के जीवन का लक्ष्य है। और यह तभी संभव था, जब वे खुद इतने शिक्षित हों कि पूरे देश में शिक्षा की मशाल जला सके।

बाबा साहेब के इस संघर्ष में रमाबाई ने अपनी आख़िरी सांस तक उनका साथ दिया। बाबा साहेब ने भी अपने जीवन में रमाबाई के योगदान को बहुत महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ को रमाबाई को समर्पित करते हुए लिखा, कि उन्हें मामूली-से भीमा से डॉ. आम्बेडकर बनाने का श्रेय रमाबाई को जाता है।

हर एक परिस्थिति में रमाबाई बाबा साहेब का साथ देती रहीं। बाबा साहेब वर्षों अपनी शिक्षा के लिए बाहर रहे और इस समय में लोगों की बातें सुनते हुए भी रमाबाई ने घर को सम्भाले रखा। कभी वे घर-घर जाकर उपले बेचतीं, तो बहुत बार दूसरों के घरों में काम करती थीं। वे हर छोटा-बड़ा काम कर, आजीविका कमाती थीं और साथ ही, बाबासाहेब की शिक्षा का खर्च जुटाने में भी मदद करती रहीं।

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जीवन की जद्दोज़हद में उनके और बाबासाहेब के पांच बच्चों में से सिर्फ़ यशवंत ही जीवित रहे। पर फिर भी रमाबाई ने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि वे खुद बाबासाहेब का मनोबल बढ़ाती रहीं। बाबासाहेब के और इस देश के लोगों के प्रति जो समर्पण रमाबाई का था, उसे देखते हुए कई लेखकों ने उन्हें ‘त्यागवंती रमाई’ का नाम दिया।

बाएं से: यशवंत, बाबा साहेब, रमाबाई, लक्ष्मीबाई (बाबासाहेब के भाई की पत्नी)

आज बाबासाहेब आम्बेडकर की ही तरह उनके जीवन पर भी नाटक, फ़िल्म आदि बने हैं। उनके नाम पर देश के कई संस्थानों के नाम भी रखे गये। उनके ऊपर ‘रमाई,’ ‘त्यागवंती रमामाऊली,’ और ‘प्रिय रामू’ जैसे शीर्षकों से किताबें लिखी गयीं हैं। पूरे 29 वर्ष तक बाबासाहेब का साथ निभाने के बाद साल 1935 में 27 मई के दिन एक लंबी बीमारी के चलते रमाबाई का निधन हो गया।

अक्सर कहते हैं कि एक सफल और कामयाब पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है और ‘मातोश्री’ रमाबाई ने इस कहावत को सच कर दिखलाया था।

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(संपादन – मानबी कटोच)


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