Search Icon
Nav Arrow

जानकी वल्लभ शास्त्री: एक कथाकार के जीवन की अनकही कहानी!

हिंदी साहित्य के छायावाद युग में छंदबद्ध कविता लिखने में अगर कोई निराला की बराबरी कर पाया, तो वह थे आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री!

‘भारत भारती पुरस्कार’ से सम्मानित जानकी वल्लभ ने शुरुआत संस्कृत में कवितायें लिखने से की थी। उनकी संस्कृत कविताओं का संकलन ‘काकली’ के नाम से साल 1930 के आसपास प्रकाशित हुआ। संस्कृत साहित्य के इतिहास में नागार्जुन और जानकी वल्लभ को देश के नवजागरण काल का प्रमुख संस्कृत कवि माना जाता है।

उनका ‘काकली’ संकलन पढ़कर हिंदी-कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ काफ़ी प्रभावित हुए। ये निराला ही थे जिन्होंने उन्हें हिंदी में भी लिखने के लिए प्रेरित किया।

Advertisement

5 फरवरी 1916 में बिहार के मैगरा गाँव में जन्में जानकी वल्लभ को जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ एवं कवयित्री महादेवी वर्मा के बाद छायावाद युग का पांचवा महत्वपूर्ण रचनाकार माना जाता है। उनका पहला गीत ‘किसने बाँसुरी बजाई’ बहुत लोकप्रिय हुआ था।

‘किसने बाँसुरी बजाई’

जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !
किसने बाँसुरी बजाई

अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले
सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई !
किसने बाँसुरी बजाई

Advertisement

जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग
कूक सुना सोए-सोए हिय मे हूक जगाई !
किसने बाँसुरी बजाई

मसक-मसक रहता मर्मस्‍थल मरमर करते प्राण
कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई !
किसने बाँसुरी बजाई

उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्‍याला
निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्‍काई !
किसने बाँसुरी बजाई

Advertisement

उन्होंने हमेशा निराला को अपना प्रेरणास्त्रोत माना। उनकी छंदबद्ध काव्य-कथाएं ‘गाथा’ नामक संग्रह में संकलित हैं। उनके इस संग्रह ने उन्हें हिंदी साहित्य के चोटी के कवियों की फ़ेहरिस्त में शामिल कर दिया। हालांकि, उन्होंने साहित्य की कई विधाओं जैसे कि कविता, गीत, नाटक, कहानी, संस्मरण, समीक्षा और आलोचना आदि पर अपनी लेखनी चलाई।

उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं- ‘राधा,’ ‘एक किरण: सौ झांइयां,’ ‘दो तिनकों का घोंसला,’ ‘अश्वबुद्ध,’ ‘कालिदास,’ ‘कानन,’ ‘अपर्णा,’ ‘लीला कमल,’ ‘सत्यकाम,’ ‘बांसों का झुरमुट,’ ‘अजन्ता की ओर,’ ‘निराला के पत्र,’ ‘स्मृति के वातायन,’ ‘नाट्य सम्राट पृथ्वीराज कपूर,’ ‘हंस-बलाका’ आदि!

लेखन में छंदों पर उनकी पकड़ जबरदस्त थी और अर्थ इतने सहज ढंग से उनकी कविता में आते थे कि इस दृष्टि से पूरी सदी में केवल वे ही निराला की ऊँचाई को छू पाए। एक साक्षात्कार के दौरान जानकी वल्लभ ने बताया कि उन्होंने महज़ 18 साल की उम्र में आचार्य की डिग्री हासिल कर ली थी और जब यह खबर अख़बार में छपी, तो निराला जी बहुत प्रभावित हुए।

Advertisement

इतना ही नहीं, जब निराला जी ने उनका संस्कृत कविताओं का संग्रह ‘काकली’ पढ़ा, तो वे खुद उन्हें ढूंढते-ढूंढते काशी पहुँचे और जानकी वल्लभ से मुलाकात की। उस समय के महान कवि निराला का ऐसा प्रेम देखकर जानकी वल्लभ इतने भाव-विभोर हुए कि उन्होंने मुज़फ्फ़रपुर में अपने घर का नाम ‘निराला निकेतन’ रखा।

उनके इस ‘निराला निकेतन’ में ‘पृथ्वीराज’ कमरा भी था। दरअसल, इस कमरे का नाम उस समय के प्रसिद्द थिएटर कलाकार पृथ्वीराज कपूर के नाम पर रखा गया। जब उनका गीत ‘किसने बाँसुरी बजाई’ मशहूर हुआ तो पृथ्वीराज खुद उनसे मिलने आये और इसी कमरे में बैठकर उन्होंने ढेर सारी बातें की। उन्हीं की याद में जानकी वल्लभ ने इस कमरे का नाम ‘पृथ्वीराज’ रख दिया।

जानकी वल्लभ को जितना प्यार अपनी लेखनी से था, उतना ही उनको पशु-पालन का शौक था। वे एक महान पशुपालक भी रहे। उनके यहाँ हमेशा कुत्ते, बिल्ली, गाय, बछड़े आदि रहते थे। वे जीवों के प्रति बहुत संवेदनशील थे।

Advertisement

उन्हें उनके लेखन के लिए बहुत से सम्मानों से नवाज़ा गया, जिनमें दयावती पुरस्कार, राजेन्द्र शिखर सम्मान, भारत-भारती सम्मान, साधना-सम्मान, शिवपूजन सहाय सम्मान शामिल हैं। जब उन्हें साहित्य में उनके योगदान के लिए बिहार का सबसे सर्वश्रेष्ठ और प्रतिष्ठित ‘राजेन्द्र शिखर सम्मान’ दिया गया, तो उस अवसर पर उन्होंने बेबाकी से कहा,

“मैं आया नहीं हूँ, लाया गया हूँ, खिलौना देकर बहलाया गया हूँ।”

साल 2011 में 7 अप्रैल को मुज़फ्फ़रपुर में उनके निवास-स्थान ‘निराला निकेतन’ में उन्होंने अपनी आख़िरी सांस ली। जानकी वल्लभ के साथ ही छंदोबद्ध हिंदी कविता के युग का अंत हो गया और अब बस बाकी रह गयी है तो उनकी विरासत, जिसका कोई सानी नहीं है।

Advertisement

आज द बेटर इंडिया के साथ पढ़िए इस महान साहित्यकार की कुछ अनमोल कविताएँ,

1. ‘ज़िंदगी की कहानी’ कविता

ज़िंदगी की कहानी रही अनकही !
दिन गुज़रते रहे, साँस चलती रही !

अर्थ क्या ? शब्द ही अनमने रह गए,
कोष से जो खिंचे तो तने रह गए,
वेदना अश्रु-पानी बनी, बह गई,
धूप ढलती रही, छाँह छलती रही !

बाँसुरी जब बजी कल्पना-कुंज में
चाँदनी थरथराई तिमिर पुंज में
पूछिए मत कि तब प्राण का क्या हुआ,
आग बुझती रही, आग जलती रही !

जो जला सो जला, ख़ाक खोदे बला,
मन न कुंदन बना, तन तपा, तन गला,
कब झुका आसमाँ, कब रुका कारवाँ,
द्वंद्व चलता रहा पीर पलती रही !

बात ईमान की या कहो मान की
चाहता गान में मैं झलक प्राण की,
साज़ सजता नहीं, बीन बजती नहीं,
उँगलियाँ तार पर यों मचलती रहीं !

और तो और वह भी न अपना बना,
आँख मूंदे रहा, वह न सपना बना !
चाँद मदहोश प्याला लिए व्योम का,
रात ढलती रही, रात ढलती रही !

यह नहीं जानता मैं किनारा नहीं,
यह नहीं, थम गई वारिधारा कहीं !
जुस्तजू में किसी मौज की, सिंधु के-
थाहने की घड़ी किन्तु टलती रही !


2. ‘जीना भी एक कला है’ कविता

जीना भी एक कला है।
इसे बिना जाने हीं, मानव बनने कौन चला है?
फिसले नहीं,चलें, चटटानों पर इतनी मनमानी
आँख मूँद तोड़े गुलाब,कुछ चुभे न क्या नादानी?
अजी,शिखर पर जो चढ़ना है तो कुछ संकट झेलो,
चुभने दो दो-चार खार, जी भर गुलाब फिर ले लो
तनिक रुको, क्यों हो हताश,दुनिया क्या भला बला है?
जीना भी एक कला है.

कितनी साधें हों पूरी, तुम रोज बढाते जाते ,
कौन तुम्हारी बात बने तुम बातें बहुत बनाते,
माना प्रथम तुम्हीं आये थे,पर इसके क्या मानी?
उतने तो घट सिर्फ तुम्हारे, जितने नद में पानी
और कई प्यासे, इनका भी सूखा हुआ गला है
जीना भी एक कला है

बहुत जोर से बोले हों,स्वर इसीलिए धीमा है
घबराओ मन,उन्नति की भी बंधी हुई सीमा है
शिशिर समझ हिम बहुत न पीना,इसकी उष्ण प्रकृति है
सुख-दुःख,आग बर्फ दोनों से बनी हुई संसृति है
तपन ताप से नहीं,तुहिन से कोमल कमल जला है
जीना भी एक कला है।


3. ‘मौज’ कविता

सब अपनी-अपनी कहते हैं!
कोई न किसी की सुनता है,
नाहक कोई सिर धुनता है,
दिल बहलाने को चल फिर कर,
फिर सब अपने में रहते हैं!
सबके सिर पर है भार प्रचुर
सब का हारा बेचारा उर,
सब ऊपर ही ऊपर हँसते,
भीतर दुर्भर दुख सहते हैं!
ध्रुव लक्ष्य किसी को है न मिला,
सबके पथ में है शिला, शिला,
ले जाती जिधर बहा धारा,
सब उसी ओर चुप बहते हैं।


4. ‘माझी, उसको मझधार न कह’ कविता

रुक गयी नाव जिस ठौर स्वयं,
माझी, उसको मझधार न कह!

कायर जो बैठे आह भरे
तूफानों की परवाह करे
हाँ, तट तक जो पहुँचा न सका,
चाहे तू उसको ज्वार न कह!

कोई तम को कह भ्रम, सपना
ढूँढे, आलोक-लोक अपना,
तव सिन्धु पार जाने वाले को,
निष्ठुर, तू बेकार न कह!


5. ‘गुलशन न रहा, गुलचीं न रहा’ कविता

गुलशन न रहा, गुलचीं न रहा, रह गई कहानी फूलों की,
महमह करती-सी वीरानी आख़िरी निशानी फूलों की ।

जब थे बहार पर, तब भी क्या हँस-हँस न टँगे थे काँटों पर ?
हों क़त्ल मज़ार सजाने को, यह क्या कुर्बानी फूलों की ।

क्यों आग आशियाँ में लगती, बागबाँ संगदिल होता क्यों ?
काँटॆ भी दास्ताँ बुलबुल की सुनते जो ज़ुबानी फूलों की ।

गुंचों की हँसी का क्या रोना जो इक लम्हे का तसव्वुर था;
है याद सरापा आरज़ू-सी वह अह्देजवानी फूलों की ।

जीने की दुआएँ क्यों माँगीं ? सौंगंध गंध की खाई क्यों ?
मरहूम तमन्नाएँ तड़पीं फ़ानी तूफ़ानी फूलों की ।

केसर की क्यारियाँ लहक उठीं, लो, दहक उठे टेसू के वन
आतिशी बगूले मधु-ऋतु में, यह क्या नादानी फूलों की ।

रंगीन फ़िज़ाओं की ख़ातिर हम हर दरख़्त सुलगाएँगे,
यह तो बुलबुल से बगावत है गुमराह गुमानी फूलों की ।

‘सर चढ़े बुतों के’- बहुत हुआ; इंसाँ ने इरादे बदल दिए;
वह कहता : दिल हो पत्थर का, जो हो पेशानी फूलों की ।

थे गुनहगार, चुप थे जब तक, काँटे, सुइयाँ, सब सहते थे;
मुँह खोल हुए बदनाम बहुत, हर शै बेमानी फूलों की ।

सौ बार परेवे उड़ा चुके, इस चमन्ज़ार में यार, कभी-
ख़ुदकिशी बुलबुलों की देखी ? गर्दिश रमज़ानी फूलों की ?


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

close-icon
_tbi-social-media__share-icon