Search Icon
Nav Arrow

मेरे दिल की राख कुरेद मत

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्करा के हवा न दे
ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे  ~ बशीर बद्र

 

बशीर बद्र की ज़बान की शक्कर एक न एक वक़्त में सबको अभिभूत कर ही जाती है. ख़ास तौर पर ये वाला शेर तो मेरा पसंदीदा रहा है, जो मैंने लगभग डेढ़ दशक पहले सुष्मिता सेन को सुनाया था, जब वे अपनी शोहरत और कैरियर के उरूज़ पर थीं और मैं उन्हें अपनी फ़िल्म ‘कर्मा, कंफेशंस एंड होली’ में पहली बार डायरेक्ट करने जा रहा था. इस शेर को सुनने पर उनकी तारीफ़जड़ी मृदुस्मित ऐसी थी कि लगता है कल ही की बात है. वो मुस्कान मुझे ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी. हासिल-ए-महफ़िल समझ यह थी कि ‘हूँ.. बशीर बद्र के शेर से मिस यूनिवर्स को भी हिलाया जा सकता है :)’

Advertisement

 

मनीष गुप्ता के साथ सुष्मिता सेन

वह शेर यह था:

कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में 

Advertisement

मैं जो सज संवर के चलूँ कहीं, मेरे साथ तुम भी चला करो 

 

इनकी भाषा की गमक के कुछ और उदाहरण देखें:

Advertisement

महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है 

 

या फिर:

Advertisement

अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना

हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है

बशीर बद्र अपनी पत्नी के साथ

 

Advertisement

उर्दू स्टूडियो / हिंदी कविता प्रॉजेक्ट शुरू होने के बाद बशीर बद्र की तबीयत कभी ठीक नहीं रही. उनके घर भोपाल में जाना भी हुआ लेकिन तब इनकी आवाज़ जा चुकी थी, और पता भी नहीं चलता था कि वे आपकी बात समझ पा रहे हैं या नहीं. फिर भी हम कोशिश पूरी करते हैं अपनी तरफ़ से क्या पता कौन सा मिरैकल हो जाए. उनके कमरे से बड़े दिनों बाद मोटे परदे हटाए गए. उनकी शरीक-ए-हयात डॉ. राहत बद्र ने बशीर साहब का सर गोद में रख कर उनकी एक पुरानी, कॉलेज के दिनों की एक नज़्म उन्हें सुनाई, जिसका लब्बो-लुआब यह था कि उस नज़्म में वे ग़ालिब साहब को टाटा कह रहे थे. वे ग़ालिब से इतनी हद तक प्रभावित थे कि अपनी शायरी में ग़ालिब की झलक उन्हें बड़ी हद तक परेशान कर जाती थी. उस दिन मिरैकल हुआ – बशीर साहब के चेहरे पर चमक आई, उन्होंने अपनी शरीके हयात की गोद में रखे अपने सर को हौले से हिलाया और एक हलकी सी मुस्कराहट के ज़रिये फ़रमाया कि वो सुन और समझ पा रहे हैं..हमारे लिए उनकी वो मुस्कराहट किसी अचीवमेन्ट से कम नहीं थी. ऐसे वक़्त में जब सब समझाने की कोशिश में थे कि अब बशीर बद्र साहब से मिलना फ़िज़ूल है, न वो बात करने में सक्षम हैं और न ही कुछ समझ पाने की स्थिति में. हमारे लिए ये एक ऐसा पल था जिसे सिर्फ हम ही महसूस कर सकते थे.

लेखक –  मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.

Advertisement

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे।

“NOTE: The views expressed here are those of the authors and do not necessarily represent or reflect the views of The Better India.”

close-icon
_tbi-social-media__share-icon