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Natural Farming

पिता-भाई की मौत ने झकझोरा, वकालत छोड़ शुरु की नैचुरल फार्मिंग, बने रोल मॉडल

पंजाब के फिरोजपुर के रहने वाले कमलजीत सिंह हेयर के परिवार में हुई कुछ घटनाओं ने उन्हें बैचेन कर दिया। इससे उन्हें वकालत छोड़, प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रेरणा मिली। आज उन्होंने अपने 20 एकड़ जमीन को खेती के एक ऐसे मॉडल के रूप में विकसित किया है, जो हर किसान के लिए आदर्श है।

किसानी एक ऐसा पेशा है, जिसमें यदि आप समय के अनुसार प्रयोग करते हैं तो मुनाफा ही मुनाफा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई किसान हैं जो अपने स्तर पर बदलाव लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

आज हम आपको पंजाब के एक ऐसे किसान की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी खेती के मॉडल से कई लोगों को प्रभावित किया है और कई किसान उनसे प्रभावित होकर प्राकृतिक खेती (Natural Farming) शुरू कर रहे हैं।

यह प्रेरक कहानी पंजाब के फिरोजपुर जिला के सोहनगढ़ रत्तेवाला गांव के कमलजीत सिंह हेयर की है। 45 वर्षीय कमलजीत के पास 20 एकड़ जमीन है और उस पर वह न सिर्फ सरसों, बाजरा, ब्लैक राइस, रेड राइस, अंगूर, आलू, टमाटर जैसे 50 से अधिक फसलों की खेती करते हैं, बल्कि आम, आंवला, जामुन, बैर, नारंगी जैसे फल भी उगा रहे हैं।

कमलजीत पूरी तरह से प्राकृतिक खेती (Natural Farming) करते हैं और उन्होंने लोगों को इसकी सीख देने के लिए अपनी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की भी शुरुआत की। पारंपरिक फसलों के अलावा वह तुलसी, लेमनग्रास, स्टीविया जैसे 50 से अधिक औषधीय पौधों की भी खेती करते हैं। उनके पास पशुधन के तौर पर गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी, बत्तख भी हैं।

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कमलजीत सिंह हेयर

किसानी की दुनिया में कदम रखने से पहले कमलजीत वकालत करते थे। उन्होंने जब वकालत छोड़ कर खेती को ही अपने जीने का जरिया बनाने का फैसला किया, तो उस वक्त उनकी महीने की सैलरी करीब डेढ़ लाख रुपए थी।

कैसे मिली प्रेरणा

कमलीत ने द बेटर इंडिया को बताया, “यह 1996 की बात है। मेरे 10 साल के छोटे भाई की मौत ब्रेन ट्यूमर के कारण हो गई। फिर, 2006 में पिता जी भी हार्ट अटैक के कारण चल बसे। उस वक्त वह सिर्फ 53 साल के थे। फिर, 2012 में मेरे दादाजी की मौत हो गई, उस वक्त वह 101 साल के थे।”

वह आगे कहते हैं, “मेरे भाई और पिताजी की असामयिक मौत ने मुझे बैचेन कर दिया था और मैंने अध्ययन किया कि आखिर लोगों की उम्र इतनी तेजी से क्यों घट रही है।”

इसी दौरान कमलजीत प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को बढ़ावा देने वाली एक स्थानीय संस्था “खेती विरासत मिशन” के संपर्क में आए। 

वह बताते है, “यहां मुझे कुछ हैरान करने वाली जानकारी मिली। पंजाब में पूरे देश की सिर्फ 1.5 फीसदी खेती करने लायक जमीन है, लेकिन केमिकल युक्त खादों और कीटनाशकों के मामले में यह आंकड़ा 18 फीसदी से अधिक है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम जो खाना खा रहे हैं, वह कितना जहरीला है।”

फिर, कमलजीत की मुलाकात हैदराबाद के जाने-माने कृषि वैज्ञानिक डॉ. ओम प्रकाश रुपेला से हुई।

वह कहते हैं, “डॉ. रुपेला दिसंबर 2012 में पंजाब आए थे। इससे पहले भी, 2009 में खेती के एक नए मॉडल को शुरू करने के लिए उनका पंजाब आना हुआ था। लेकिन वह प्रोजेक्ट फेल हो गया। लेकिन इस बार उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव की।”

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कमलजीत के खेत

इसके बाद, कमलजीत ने डॉ. रुपेला के मार्गदर्शन में जनवरी 2013 में अपनी 20 एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती (Natural Farming) शुरू कर दी। 

वह बताते हैं कि उनकी जमीन पर दशकों से केमिकल युक्त खेती हो रही थी और अचानक प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को अपनाना आसान नहीं था। डॉ. रुपेला ने उन्हें सीख दी कि खेती फसलों, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों और सूक्ष्मजीवों जैसे पांच तत्वों का एक संयोग है। यदि कोई इसे अपना ले तो फसलों को जहरीला होने से बचाया जा सकता है।

छोड़ी वकालत

कमलजीत कहते हैं, “मैं अभी तक खेती और वकालत साथ में कर रहा था। लेकिन 2015 तक आते-आते लगने लगा कि दोनों में से किसी एक के साथ ही आगे बढ़ा जा सकता है और मैंने खेती की राह चुनी।”

वह आगे कहते हैं, “मैंने पहले कभी खेती नहीं किया था और मेरा पूरा परिवार वकालत छोड़ने के फैसले के खिलाफ था। लेकिन मैंने अपने दिल की सुनी और अपने फैसले पर अडिग रहा।”

लेकिन, कुछ महीने बाद कमलजीत के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने इसके बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। 

वह बताते हैं, “वकालत छोड़ने के करीब दो महीने के बाद डॉ. रुपेला की कैंसर के कारण मौत हो गई। इस खबर ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि अब आगे कैसे बढ़ना है। लेकिन मैंने डॉ. रुपेला से वादा किया था कि कुछ भी हो जाए, कभी मैदान छोड़ कर नहीं भागूंगा।”

लोगों ने बनाया मजाक

कमलजीत कहते हैं कि उन्होंने अपनी खेती में कई प्रयोग किए हैं और असफल हुए हैं।  शुरुआती कुछ वर्षों के दौरान उन्हें उपज के नाम पर कुछ नहीं हुआ। इस वजह से उन्हें कई आर्थिक तंगियों के सामना करना पड़ा। कमलजीत का परिवार उनके खिलाफ जा चुका था और लोग भी उनका मजाक बनाने लगे। लेकिन, धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा और आज उनकी कमाई केमिकल युक्त खेती से कहीं बेहतर है।

कैसे करते हैं खेती

कमलजीत बताते हैं, “मैं खेती के लिए बीजों को अपनी फसलों से ही तैयार करता हूं। मैं बाहर से कोई बीच नहीं खरीदता। वहीं, बारिश के पानी को बचाने के लिए मैंने रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी बनाया है।”

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खेती और पशुपालन का अद्भुत संयोग देखने के लिए मिलता है कमलजीत के फार्म में

वह बताते हैं, “मेरे पास मुर्गी-बत्तख से लेकर गाय भी है। इनकी देखभाल के लिए हमें बाहर से कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है और इनके मल-मूत्र का इस्तेमाल हम अपनी खेती के लिए करते हैं। इस तरह खेती और जीव-जंतु, दोनों एक-दूसरे पर आश्रित है।”

वहीं, कमलजीत कीटनाशक के तौर पर जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं। 

वह बताते हैं, “हमारे खेत में कुछ भी बेकार नहीं होता है। यहां मानव मल-मूत्रों का भी इस्तेमाल बायोगैस बनाने के लिए किया जाता है। इस तरह हम प्रकृति का किसी भी तरीके से नुकसान नहीं करते हैं।”

कैसे करते हैं मार्केटिंग

कमलजीत ने अपनी खेती को डॉ. रुपेला समर्पित करते हुए “डॉ. ओम प्रकाश रुपेला सेंटर फॉर नैचुरल फार्मिंग” नाम दिया।

वह कहते हैं, “मैं अपने कई उत्पादों को सीधे बेचने के बजाय प्रोसेसिंग पर ध्यान देता हूं। जैसे काला चना को मैं भूजिया या बेसन बनाकर बेचता हूं। इसके अलावा मैं फलों को आचार या मुरब्बा बना कर बेचता हूं। इस तरह वैल्यू एडिशन से मुझे अधिक कमाई होती है।”

वह आगे बताते हैं, “मुझे अपने उत्पादों को बेचने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। मैं सारे उत्पाद अपने आउटलेट से ही बेचता हूं। मेरे पास पंजाब के कई हिस्से के स्थायी ग्राहक हैं।”

एग्रो फार्म टूरिज्म का दिया रूप 

कमलजीत बताते हैं, “मैंने अपनी खेती को ईको टूरिज्म के रूप में विकसित करने के लिए हर प्रकार के पेड़-पौधे लगाए हैं और सभी संरचनाओं को बनाने के लिए मिट्टी का इस्तेमाल किया है। यहां हर दिन करीब 50 लोग घूमने आते हैं।”

हर दिन 50 से अधिक लोग आते हैं कमलजीत के फार्म पर

कमलजीत ने अपने खेती के सभी कामों को संभालने के लिए पांच-छह लोगों को रोजगार भी दिया है।

दूसरों को भी किया प्रेरित

कमलजीत से प्रेरित होकर कई लोगों ने प्राकृतिक खेती शुरू की है। 

उनसे मदद पाने वालों में पंजाब के मोगा जिला के लोहारा गांव के रहने वाले राजविंदर सिंह भी हैं। वह पहले अमेरिका में होटल मैनेजमेंट में काम कर रहे थे। लेकिन कुछ अलग करने की चाहत में अपने देश लौट गए।

इस विषय में वह कहते हैं, “कमलजीत से मेरी मुलाकात 2017 में सोशल मीडिया के जरिए हुई। फिर मैं उनके खेत गया। मैं उनके खेती के तरीकों से काफी प्रभावित हुआ और मैंने उन्हीं की मदद से अपनी छह एकड़ जमीन पर खेती शुरू की। आज मैं अपनी आठ एकड़ जमीन पर न सिर्फ गन्ना, हल्दी जैसे फसलों की प्राकृतिक तरीके से खेती (Natural Farming) करता हूं, बल्कि उसे प्रोसेस कर वैल्यू एडिशन भी करता हूं।”

ट्रेनिंग देते कमलजीत

कमलजीत कहते हैं कि उनका मकसद प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को बढ़ावा देना है। इसके लिए उन्होंने ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की भी शुरुआत की है।

वह बताते हैं, “हम पहले महीने में एक दिन के ट्रेनिंग सेशन का आयोजन करते थे। लेकिन अब पांच दिनों का करते हैं। हर बैच में करीब 10 लोग होते हैं। यदि कोई हमारे पास ही रह कर ट्रेनिंग लेना चाहता है तो इसके लिए 5000 रुपए फीस है, नहीं तो 2500 रुपए।”

अनजानों ने दी नई हिम्मत

कमलजीत बताते हैं, “यह बात अप्रैल 2019 की है। मैं काफी मुश्किलों से अभी थोड़ा संभल ही रहा था कि एक रात आई भयंकर आंधी ने मेरा सबकुछ खत्म कर दिया। मेरे खेत बर्बाद हो चुके थे। इससे मैं पहली बार अपनी हिम्मत हार गया और खेती छोड़ने का फैसला कर लिया। मैंने अगली सुबह इसे लेकर फेसबुक पर एक पोस्ट किया।”

वह आगे कहते हैं, “नुकसान काफी हो चुका था और मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन लोगों ने न सिर्फ मुझे हिम्मत दी, बल्कि कई लोगों ने खुद ही पूछ कर, आर्थिक रूप से भी मदद की। मैं उन्हें नहीं जानता था। लेकिन उन्होंने मुझसे मैदान न छोड़ने की अपील की। यह समाज वाकई बहुत अच्छा है।”

वह अंत में कहते हैं, “आज केमिकल युक्त खेती के कारण किसानों की बाजार पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। आज किसानों की लड़ाई कारपोरेट घरानों से है, लेकिन इस शैली से खेती के कारण वे आखिर में उन्हीं पर आश्रित हो जाते हैं। इससे उनका नुकसान ही होगा, वे आत्मनिर्भर नहीं बन सकते हैं। यदि किसानों को आत्मनिर्भर बनना है तो हमें अपने व्यवहार को बदलते हुए प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को अपनाना होगा।”

आप कमलजीत से 9804072072 पर संपर्क कर सकते हैं।

संपादन- जी एन झा

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