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केसरी सिंह बारहठ: वह कवि जिसके दोहों ने रोका मेवाड़ के महाराणा को अंग्रेजों के दिल्ली दरबार में जाने से!

राजस्थानी कवि केसरी सिंह बारहठ (21 नवम्बर 1872- 14 अगस्त 1941)

राजस्थान के चारण घराने से ताल्लुक रखने वाले केसरी सिंह बारहठ प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म  21 नवम्बर, 1872 को शाहपुरा रियासत के देवपुरा गाँव में हुआ था। उन्होंने बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं के साथ इतिहास, मनोविज्ञान, खगोलशास्त्र तथा ज्योतिष का अध्ययन भी किया था।

जब केसरी सिंह सिर्फ एक महीने के थे, तभी उनकी माँ का निधन हो गया। अतः उनका लालन-पालन उनकी दादी माँ ने किया। इनकी शिक्षा उदयपुर में हुई। बनारस से गोपीनाथ पंडित को बुलाकर इन्हें संस्कृत की शिक्षा भी दिलवाई गई। केसरी सिंह बारहट के अपने पढ़ने के लिए उनके पिता कृष्ण सिंह का प्रसिद्ध पुस्तकालय ‘कृष्ण-वाणी-विलास’ भी उपलब्ध था।

इसके अलावा पिंगलडिंगल भाषा में काव्य-सृजन करना तो उन्हें विरासत में मिला था। क्योंकि चारण घराने का साहित्य इसी भाषा-शैली में लिखा गया है। ‘पिंगल’ शब्द राजस्थान और ब्रज के सम्मिलित क्षेत्र में विकसित और चारणों में प्रचलित ब्रजी की एक शैली के लिए प्रयुक्त हुआ है तो राजस्थानी की प्रमुख बोली ‘मारवाड़ी’ का साहित्यिक रूप डिंगल शैली है।

केसरी सिंह बारहठ

केसरी सिंह बारहट को जब सुचना मिली कि रास बिहारी बोस भारत में सशस्त्र क्रांति की योजना बना रहे हैं तो राजस्थान में क्रांति का कार्य उन्होंने स्वयं संभाला और अपने भाई जोरावर सिंह और पुत्र प्रताप सिंह को रास बिहारी बोस के पास भेजा। इन दोनों ने रास बिहारी बोस के साथ लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय की सवारी पर बम फेंकने के साहसिक काम को अंजाम दिया।

स्वतंत्रता संग्राम में इनके भाई और बेटे, दोनों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। केसरी सिंह के बेटे वीर प्रताप को अंग्रेजों ने 1917 में ‘बनारस षड़यंत्र अभियोग’ में पकड़ लिया। पर उन्होंने कठोर यातना सहकर भी अपने क्रांतिकारी साथियों का भेद ब्रिटिश सरकार को नहीं दिया। बताया जाता है कि जब उन्हें उनकी माँ की दशा के बारे में बताया गया तो वीर प्रताप ने कहा था

“मेरी माँ रोती है तो रोने दो, मैं अपनी माँ को हंसाने के लिए हजारों माताओं को नहीं रुलाना चाहता।”

केसरी सिंह बारहठ के भाई और पुत्र

केसरी सिंह राजनीति में इटली के राष्ट्रपिता मैजिनी को अपना गुरु मानते थे | मैजिनी की जीवनी वीर सावरकर ने लन्दन में पढ़ते समय मराठी में लिख कर गुप्त रूप से लोकमान्य तिलक को भेजी थी क्योंकि उस समय मैजिनी की जीवनी पर लिखी किताब पर ब्रिटिश साम्राज्य ने पाबन्दी लगा रखी थी। केसरी सिंह ने इस मराठी पुस्तक का हिंदी अनुवाद किया था।

साल 1903 में जब लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ मेवाड़ के महाराणा का जाना राजस्थान के क्रांतिकारियों को उचित नहीं लग रहा था, तो उन्हें रोकने की जिम्मेंदारी सब ने क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह को दी। उस समय उन्होंने प्रसिद्द “चेतावनी रा चुंग्ट्या” नामक सोरठे रचे, जिन्हें पढ़कर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुए और ‘दिल्ली दरबार’ में न जाने का निश्चय किया। वे दिल्ली आने के बावजूद भी समारोह में शामिल नहीं हुए।

मेवाड़ के महाराणा और कवि केसरी सिंह

इस रचना में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी अभिव्यक्ति स्पष्ट कर दी थी। उनका विश्वास था कि आज़ादी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही संभव है। साल 1910 में उन्होंने आमेर में ‘वीर भारत सभा’ की स्थापना की थी। सशस्त्र क्रांति की तैयारी के लिए प्रथम विश्वयुद्ध (1914) के प्रारम्भ में ही वे इस कार्य में जुट गए। उन्होंने कारतूसों का एक पार्सल बनारस के क्रांतिकारियों को भेजा व रियासती और ब्रिटिश सेना के सैनिकों से संपर्क किया।

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ब्रिटिश सरकार की गुप्तचर रिपोर्टों में राजपूताना में क्रांति फैलाने के लिए केसरी सिंह बारहट व अर्जुन लाल सेठी को ख़ास जिम्मेदार माना गया था। साल 1912 में राजपूताना में ब्रिटिश सी.आई.डी.द्वारा जिन व्यक्तियों की निगरानी रखी जानी थी उनमें केसरी सिंह का नाम राष्ट्रीय-अभिलेखागार की सूची में सबसे ऊपर था।

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केसरी सिंह को शाहपुरा में ब्रिटिश सरकार द्वारा दिल्ली-लाहौर षड्यन्त्र केस में राजद्रोह, षड्यन्त्र व कत्ल आदि के जुर्म लगा कर 21 मार्च 1914 को गिरफ्तार किया गया। जिस दिन केसरी सिंह को गिरफ्तार किया गया उसी दिन से उन्होंने अन्न-त्याग दिया। उन्हें भय था कि गुप्त बातें उगलवाने के लिए पुलिस कोई ऐसी चीज न खिला दे जिससे उनके दिमाग पर असर पड़े। इस प्रण को उन्होंने पाँच वर्ष तक जेल-जीवन में निभाया।

इस मुक़दमे में केसरी सिंह को कई वर्षों की सख्त क़ैद की सजा सुनाई गई और राजस्थान से दूर ‘हज़ारीबाग़ केन्द्रीय जेल’, बिहार भेज दिया। जेल में वे दाल व अनाज के दानों से क, ख, ग आदि अक्षर बनाकर अनपढ़ कैदियों को अक्षर-ज्ञान देते और अनाज के दानों से ही जमीन पर भारत का नक्शा बनाकर क़ैदियों को देश के प्रान्तों का ज्ञान भी कराते थे।

साल 1920 में वे जेल से रिहा हुए। जिसके बाद सेठ जमनालाल बजाज द्वारा आमंत्रित करने पर केसरी सिंह सपरिवार वर्धा चले गए। वर्धा में उनके नाम से ‘राजस्थान केसरी’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया गया, जिसके संपादक विजय सिंह पथिक थे। वर्धा में ही केसरी सिंह का महात्मा गाँधी जी से संपर्क हुआ।

केसरी सिंह को गाँधी जी द्वारा लिखा गया पत्र

उनकी पोती विजयलक्ष्मी ने बताया कि बीमारी के अंतिम सात दिनों में दाता निरंतर गीता और उपनिषदों के श्लोक ही बोला करते थे। अपने आखिरी क्षणों में वे केवल अपने बेटे की तस्वीर को निहार रहे थे। जब तस्वीर उनके हाथ में दी गयी तो एक दोहा उनके मुंह से निकल पड़ा,

“कहाँ जाये कहाँ ऊपने, कहाँ लड़ाये लाड।
का जाने केहि खाड में, जाय पड़ेंगे हाड॥”

देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले क्रान्तिकारी कवि केसरी सिंह बारहठ ने ‘हरिओम तत् सत्’ के उच्चारण के साथ 14 अगस्त, 1941 को आखिरी सांस ली।

केसरी सिंह बारहठ की प्रतिमा

उनके द्वारा लिखे गये “चेतावनी रा चुंग्ट्या” के कुछ दोहे (हिंदी अनुवाद के साथ),

पग पग भम्या पहाड,धरा छांड राख्यो धरम |

(ईंसू) महाराणा’र मेवाङ, हिरदे बसिया हिन्द रै ||

अनुवाद: भयंकर मुसीबतों में दुःख सहते हुए मेवाड़ के महाराणा नंगे पैर पहाडों में घुमे ,घास की रोटियां खाई फिर भी उन्होंने हमेशा धर्म की रक्षा की। मातृभूमि के गौरव के लिए वे कभी कितनी ही बड़ी मुसीबत से विचलित नहीं हुए उन्होंने हमेशा मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है वे कभी किसी के आगे नहीं झुके। इसीलिए आज मेवाड़ के महाराणा हिंदुस्तान के जन जन के हृदय में बसे है।

घणा घलिया घमसांण, (तोई) राणा सदा रहिया निडर |

(अब) पेखँतां, फ़रमाण हलचल किम फ़तमल ! हुवै ||

अनुवाद: अनगिनत व भीषण युद्ध लड़ने के बावजूद भी मेवाड़ के महाराणा कभी किसी युद्ध से न तो विचलित हुए और न ही कभी किसी से डरे उन्होंने हमेशा निडरता ही दिखाई। लेकिन हे महाराणा फतह सिंह आपके ऐसे शूरवीर कुल में जन्म लेने के बावजूद लार्ड कर्जन के एक छोटे से फरमान से आपके मन में किस तरह की हलचल पैदा हो गई ये समझ से परे है।

गिरद गजां घमसांणष नहचै धर माई नहीं |

(ऊ) मावै किम महाराणा, गज दोसै रा गिरद मे ||

अनुवाद: मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा लड़े गए अनगिनत घमासान युद्धों में जिनमे हजारों हाथी व असंख्य सैनिक होते थे कि उनके लिए धरती कम पड़ जाती थी आज वे महाराणा अंग्रेज सरकार द्वारा 200 गज के कक्ष में आयोजित समरोह में कैसे समा सकते है? क्या उनके लिए यह जगह काफी है?

अब लग सारां आस , राण रीत कुळ राखसी |

रहो सहाय सुखरास , एकलिंग प्रभु आप रै ||

अनुवाद: हे महाराणा फतह सिंह जी पुरे भारत की जनता को आपसे ही आशा है कि आप राणा कुल की चली आ रही परम्पराओं का निरवाह करेंगे और किसी के आगे न झुकने का महाराणा प्रताप के प्रण का पालन करेंगे। प्रभु एकलिंग नाथ इस कार्य में आपके साथ होंगे व आपको सफल होने की शक्ति देंगे।

मान मोद सीसोद, राजनित बळ राखणो |

(ईं) गवरमेन्ट री गोद, फ़ळ मिठा दिठा फ़ता ||

अनुवाद: हे महाराणा सिसोदिया राजनैतिक इच्छा शक्ति व बल रखना। इस सरकार की गोद में बैठकर आप जिस मीठे फल की आस कर रहे है वह मीठा नहीं खट्ठा है।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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