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जतिंद्रनाथ दास: वह क्रांतिकारी जिसने देश की आज़ादी के लिए जेल में दे दी अपनी जान!

“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा”

र साल स्वतंत्रता दिवस पर ऐसी ही कुछ दिल छू जाने वाली पंक्तियाँ हम बड़े ही उत्साह के साथ अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर शेयर करते हैं। और अगर कोई हमसे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पूछ ले तो सबसे पहले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का नाम जुबान पर आता है। या फिर ऐसे चंद लोगों का जिन्हें इतिहास में जगह मिली।

बेशक, देश के लिए अपनी जान हँसते-हँसते कुर्बान कर देने वाले इन क्रांतिकारियों की कोई बराबरी नहीं। लेकिन गलत यह है कि हमारे इतिहास ने सिर्फ ऐसे चंद क्रांतिकारियों से रू-ब-रू कराया। न जाने और भी कितने नाम है जिनका जिक्र तक हमें नहीं मिलता।

ऐसा ही एक नाम है जतिंद्रनाथ दास का, जिन्हें उनके साथी क्रांतिकारी ‘जतिन दा’ कहकर पुकारते थें। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की ही तरह जतिंद्र भी बहुत ही कम उम्र में अपने देश के लिए कुर्बान हो गये थे। वे छोटी सी उम्र में ही बंगाल का क्रांतिकारी ग्रुप ‘अनुशीलन समिति’ में शामिल हो गये थे।

जतिंद्रनाथ दास

कोलकाता के एक साधारण बंगाली परिवार में 27 अक्टूबर 1904 को जन्मे जतिंद्रनाथ दास महज 16 साल की उम्र में ही देश की आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। महात्मा गाधी के असहयोग आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कलकत्ता के विद्यासागर कॉलेज में पढ़ने वाले जतिंद्र को विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 6 महीने की सजा हुई।

भारत माता के लिए कुछ करने का जज्बा लिए जतिन्द्रनाथ प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सचिन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए। जिसके बाद वे क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएश्न’ के अहम सदस्य बन गये।

साल 1925 में अंग्रेजों ने उन्हें ‘दक्षिणेश्वर बम कांड’ और ‘काकोरी कांड’ के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया। हालांकि सबूत नहीं मिलने के कारण उन पर मुकदमा तो नहीं चल पाया, लेकिन वे नजरबन्द कर लिए गए। जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे बुरे व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। जब जतींद्रनाथ की हालत बिगड़ने लगी तो अंग्रेज सरकार ने डरकर 21 दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया।

लाहौर षड्यंत्र केस में पकड़े गये क्रांतिकारियों में से एक थे जतिन दास

उन्होंने सचिंद्रनाथ सान्याल से बम बनाना सिखा और वे बाकी क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने लगे। उन्होंने हर कदम पर भगत सिंह का साथ दिया। भगत सिंह ने अन्य साथियों के साथ मिलकर लाहौर असेंबली में बम फेंका, जिसमें ब्रिटिश अधिकारी मारे गये। इसके बाद जब ब्रिटिश पुलिस ने भगत सिंह और उनके साथियों को पकड़ने के लिए गतिविधि तेज कर दी, तब इन क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने वाले कारखानों पर भी छापा पड़ा।

भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद लाहौर षडयंत्र केस में जतिंद्र को भी अन्य लोगों के साथ पकड़ लिया गया।

उन दिनों जेल में भारतीय राजनैतिक कैदियों की हालत एकदम खराब थी। उसी तरह के कैदी यूरोप के हों, तो उनको कुछ सुविधाएं मिलती थीं। यहां के लोगों की जिंदगी नरक बनी हुई थी। उनके कपड़े महीनों नहीं धोए जाते थे, तमाम गंदगी में खाना बनता और परोसा जाता था। इससे धीरे-धीरे भारतीय कैदियों में गुस्सा भरता गया।

इसके विरोध में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि ने लाहौर के केन्द्रीय कारागार में भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। जब इन अनशनकारियों की हालत खराब होने लगी, तो इनके समर्थन में बाकी क्रांतिकारियों ने भी अनशन प्रारम्भ करने का विचार किया। अनेक लोग इसके लिए उतावले हो रहे थेे।

फिर सब ने जतिंद्र को भी हड़ताल में शामिल होने के लिए कहा, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मैं अनशन तभी करूंगा, जब मुझे कोई इससे पीछे हटने को नहीं कहेगा। मेरे अनशन का अर्थ है, ‘जीत या फिर मौत!’

शहीद जतिंद्रनाथ दास की मूर्ति

इस अटल प्रण के साथ उन की क्रांतिकारी भूख हड़ताल शुरू हुई। उनका मानना था कि संघर्ष करते हुए गोली खाकर या फांसी पर झूलकर मरना शायद आसान है। क्योंकि उसमें अधिक समय नहीं लगता; पर अनशन में व्यक्ति धीरे-धीरे मृत्यु की ओर आगे बढ़ता है। ऐसे में यदि उसका मनोबल कम हो, तो संगठन का मूल उद्देश्य खतरे में पड़ जाता है।

जतिंद्र नाथ के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन प्रारम्भ कर दिया। जेल में वैसे तो बहुत खराब खाना दिया जाता था; पर यह हड़ताल तोड़ने के लिए जेल अधिकारी स्वादिष्ट भोजन, मिठाई और दूध आदि इन क्रांतिकारियों को देने लगे। सब क्रांतिकारी यह सामान फेंक देते थे; पर जतिंद्र कमरे में रखे होने पर भी खाने को छूना तो दूर देखते तक न थे।

जेल अधिकारियों ने जबरन अनशन तुड़वाने का निश्चय किया। वे बंदियों के हाथ पैर पकड़कर, नाक में रबड़ की नली घुसेड़कर पेट में दूध डाल देते थे। जतिंद्र के साथ ऐसा किया गया, तो वे जोर से खांसने लगे। इससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी हालत बहुत बिगड़ गयी।

जेल प्रशासन ने उनके छोटे भाई किरणचंद्र दास को उनकी देखरेख के लिए बुला लिया; पर जतिंद्रनाथ दास ने उसे इसी शर्त पर अपने साथ रहने की अनुमति दी कि वह उनके संकल्प के बीच नही आएगा। इतना ही नहीं, यदि उनकी बेहोशी की अवस्था में जेल अधिकारी कोई खाना, दवा या इंजैक्शन देना चाहें, तो वह ऐसा नहीं होने देगा।

उस समय अखबारों में उनकी खबर छपी

हड़ताल का 63वां दिन था। बताया जाता है कि उस दिन उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज था। उन्होंने सभी साथियों को साथ में बैठकर गीत गाने के लिए कहा। अपने छोटे भाई को पास में बिठाकर खूब लाड़ किया। उनके एक साथी विजय सिन्हा ने उन का प्रिय गीत ‘एकला चलो रे’ और फिर ‘वन्दे मातरम्’ गाया।

यह गीत पूरा होते ही जतिंद्र ने इस दुनिया से विदा ले ली। वह दिन था 13 सितंबर 1929 और सिर्फ 24 साल की उम्र में भारत माँ का यह सच्चा सपूत अपने देश के लिए कुर्बान हो गया।

हालांकि, अंग्रेजों ने खूब चाहा कि जतिंद्र की मौत का ज्यादा तमाशा न बनें और उन्होंने हर संभव प्रयास किया कि उनका अंतिम-संस्कार आनन-फानन में कर के यह किस्सा खत्म किया जाये। उन्होंने ट्रेन से उनके पार्थिव शरीर को कलकत्ता रवाना किया।

उनके सम्मान में जारी की गई पोस्टल स्टैम्प

पर देश की एक और वीरांगना थी जिसने जतिंद्रनाथ दास की मौत को जाया ना जाने दिया। ये थीं महान क्रन्तिकारी दुर्गा भाभी, जिन्होंने जेल से बाहर आने के बाद जतिंद्र की शव-यात्रा का नेतृत्व किया। हर एक स्टेशन पर ट्रेन रोकी गयी। यहाँ लोगों ने जुलुस निकाला और इस सच्चे सेनानी के दर्शन किये।

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उनकी मौत की खबर सुनकर सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें ‘भारत का युवा दधीची’ कहा, जिसने अंग्रेजों के साम्राज्य के विनाश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

आज़ादी के बाद भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक पोस्टल स्टैम्प जारी की। भारत के इस महान क्रांतिकारी को हमारा शत-शत नमन!


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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