Search Icon
Nav Arrow
Radhika's Cafe Closed Due To COVID, Gave Auto Rickshaw Ambulance Service

कोविड के कारण बंद हुआ कैफे लेकिन नहीं मानी हार, ऑटो रिक्शा को एंबुलेंस बना की लोगों की मदद

राधिका शास्त्री ने जब कोविड -19 की दूसरी लहर में नीलगिरी को तबाह होते हुए देखा, तो उन्होंने ऑक्सीजन सिलेंडर और फर्स्ट एड किट वाली एक ऑटो-एम्बुलेंस डिजाइन करने का फैसला किया।

Advertisement

तमिलनाडु के नीलगिरी पहाड़ियों की खड़ी ढलानें पर्यटकों को खूब लुभाती हैं। मॉनसून के मौसम में कोहरे से ढकी पहाड़ियों और घाटों की सुंदर छटाएं यहां से गुजरने वाले हर शख्स के ज़हन में हमेशा के लिए बस जाती हैं। लेकिन जिन खूबसूरत ढलानों वाली पहाड़ियों के आप दीवाने हैं, वे यहां रहनेवाले लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी को कितना मुश्किल बना देती हैं, यह उनके अलावा कोई नहीं जानता। खासकर तब, जब कोई इमरजेंसी हो।

नीलगिरी पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी की लंबाई लगभग 2,636 मीटर है। पश्चिमी घाट की ये पहाड़ियां अक्सर मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाने या फिर समय पर प्राथमिक सेवाओं तक नहीं पहुंच पाने का कारण बनती हैं। इमरजेंसी की स्थिति में तो ये जिंदगी और मौत का सबब तक बन जाती हैं।

कुन्नूर की राधिका शास्त्री ने यहां रहनेवाले लोगों की इस परेशानी को काफी नजदीक से जाना और समझा और फिर एक दिन स्थिति को थोड़ा बेहतर बनाने का फैसला कर लिया। वह कुन्नुर में ‘डीम’ नाम का एक कैफे चलाती हैं। 

एम्बुलेंस का इंतजार हो गया और लंबा

Radhika Shastry with her Amburx
Radhika Shastry

मई, 2021 में पूरे देश में कोविड-19 के मामलों में अचानक से तेजी आई। नीलगिरी भी इससे अछूता नहीं था। यहां भी कोविड के मामले तेजी से बढ़ रहे थे। क्षेत्र में जितनी भी चिकित्सीय सुविधाएं थीं, बीमारी से निपटने के लिए उसे पूरी तरह से काम पर लगा दिया गया।

राधिका द बेटर इंडिया को बताती हैं, “इन खड़ी पहाड़ियों के रास्ते को पैदल तय नहीं किया जा सकता। बिना किसी सुविधा के अस्पताल तक पहुंचना मुश्किल है, यह मैं अच्छे से जानती थी। लेकिन स्थिति इतनी खराब है, इसका एहसास मुझे तब हुआ, जब मैंने अचानक से एक महिला की बातचीत सुनी। उन्हें हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत थी, लेकिन आने-जाने का कोई साधन न होने की वजह से वह अपना इलाज नहीं करवा सकीं।”

उनके अनुसार, उन कुछ दिनों में तो एम्बुलेंस के लिए इंतजार और लंबा हो गया था। इलाके में आना-जाना आसान नहीं था। वायरस से जूझ रहे मरीजों को प्राथमिकता दी जा रही थी। जब राधिका को इस वास्तविकता का एहसास हुआ, तो उन्होंने अपना सारा समय बदलाव में लगा दिया।

WhatsApp के फॉर्वर्ड मैसेज से मिला आइडिया 

लॉकडाउन के कारण राधिका का कैफे पूरे एक महीने के लिए बंद था। अब आप चाहें तो इसे किस्मत का खेल भी कह सकते हैं। खैर! उसी दौरान उन्हें व्हाट्सएप पर एक फॉर्वर्ड मैसेज मिला, जिसमें मध्यप्रदेश के जबलपुर के विवेक तन्खा नामक व्यक्ति के एक प्रोजेक्ट का जिक्र था। वह ऑटो रिक्शा से बैटरी ऑपरेटेड एम्बुलेंस बना रहा था। 

राधिका ने कहा, “इससे मुझे एक आइडिया मिल गया। मैंने इस क्षेत्र की जरूरतों को लेकर रिसर्च करना शुरू कर दिया। ऑटो से 22 किलोमीटर तक की सवारी की और लोगों से बातचीत की। ताकि पता चल सके कि इसे लेकर क्या काम किया जा सकता है और क्या नहीं।” ज्यादातर ऑटो रिक्शा ड्राइवर मौसम को लेकर परेशान थे। पहाड़ियों से यात्रा करना मुश्किल था, क्योंकि यहां मौसम के अनुकूल वाहनों की कमी थी। इन वाहनों की छत उतनी मजबूत नहीं थी। 

The inside of an AmbuRx ambulance
AmbuRx ambulance

काफी रिसर्च के बाद राधिका ने व्यावसायिक रूप से इस तरह की गाड़ी तैयार करने वाले उस उद्यमी मैन्यूफैक्चरर से संपर्क साधा और उन्हें बताया कि एंबुलेंस में क्या-क्या होना चाहिए और फिर उनसे नीलगिरी के लिए एक मॉडल डिजाइन करने के लिए कहा। हालांकि इसकी अपनी चुनौतियां थीं।

और फिर ऐसे तैयार हुई AmbuRX’ 

राधिका कहती हैं, “दक्षिण भारत के जिस हिस्से में हम रह रहे थे और जिन समस्याओं का सामना कर रहे थे, वह उनके लिए एकदम नई थीं। काफी कुछ बताने के बावजूद वह पहाड़ी की उंचाई और इलाके को समझ नहीं सका।” यह, वह समय था जब लोगों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। कोविड अपने चरम पर था। ऐसे में दक्षिण भारत में नए सिरे से किसी मैन्यूफैक्चरर को ढूंढने का कोई मतलब नहीं था, लेकिन कुछ तो करना था।

Advertisement

समस्या को दूर करने के लिए राधिका ने पहाड़ के ऊपर तक जाने का फैसला किया। यह काफी कठिन चढ़ाई थी, लेकिन राधिका वहां तक गईं और फोटो खींचकर कर मैन्यूफैक्चरर के पास भेजा, ताकि उन्हें इस इलाके के कठिन रास्तों का आभास हो सके और बस इसके बाद एक आदर्श ऑटो के डिजाइन पर दोनों की सहमति बन गई और वे इसे बनाने के लिए तैयार हो गए। इस आदर्श ऑटो एंबुलेंस को नाम दिया गया ‘AmbuRX’। एम्बुलेंस के लिए छोटा शब्द एंबु और आरएक्स मेडिकल से जुड़ा एक सांकेतिक शब्द है।

राधिका द्वारा डिजाइन किया गया यह एंबुलेंस डीजल से चलता है। इसमें 470 सीसी बजाज ऑटो रिक्शा का इस्तेमाल किया गया है। उपकरण रखने और लोगों के बैठने के लिए इसके पिछले हिस्से को बड़ा बनाया गया है। इसमें मरीज के लिए एक स्ट्रेचर, अटेंडेंट के लिए दो सीट, एक ऑक्सीजन सिलेंडर और एक फर्स्ट एड किट की सुविधा है। मरीज को झटके ना लगें, इसके लिए स्ट्रेचर में सीट बेल्ट भी लगाई गई है। ड्राइवर की सीट को, पार्टिशन कर अलग रखा गया है ताकि कोविड के मरीजों को लाने ले जाने में किसी प्रकार की दिक्कत न हो।

नीलगिरी के लोगों ने की मदद

AmbuRx ambulances
AmbuRx ambulance

इस काम के लिए काफी पैसों की जरूरत थी। छह एंबुलेंस तैयार करने का मतलब था कुल 24 लाख रुपये का खर्च, जिसका भार अकेले राधिका के लिए उठा पाना मुश्किल था। जब राधिका के सामने यह दिक्कत आई, तो रेस्टोरेंट से जुड़े ग्राहकों ने उनकी काफी मदद की। राधिका ने पैसे जुटाने के लिए एक वीडियो बनाया। इसमें एंबुलेंस से संबंधित सारी जानकारी दी गई कि वह इसे क्यों बनाना चाहती हैं और सोशल मीडिया पर कॉल टू एक्शन के साथ इस वीडियो को पोस्ट कर दिया।

वह बताती हैं, “एक एंबुलेंस को मैंने खुद से तैयार करवाया था, बाकी पांच एंबुलेंस के लिए स्टेप अप फाउंडेशन जैसी आर्थिक रुप से मदद देने वाली संस्थाओं ने सहयोग किया और इस तरह से 30 दिनों के अंदर एम्बुलेंस बनकर तैयार हो गए। राधिका ने काफी सोच-विचार और जांच करने के बाद इन सभी को स्टार एंबुलेंस सेवा, पुष्पा अस्पताल, केईएम अस्पताल और किंडर ट्रस्ट जैसे अस्पताल और गैर सरकारी संगठनों को दान करने का फैसला किया।

ये एम्बुलेंस अभी तक 15,00 से 5000 तक ट्रिप्स कर चुकी हैं और लगातार लोगों की जान बचाने और उनकी सेहत से जुड़ी रोजाना की दिक्कतों को दूर करने का काम कर रही हैं।

मूल लेखः रिया गुप्ता

संपादनः अर्चना दुबे

यह भी पढ़ेंः अमरिका से भारत आए ‘फकीरा’, मारुति 800 में बर्गर बेच बने IIM Icon

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें।

Advertisement
close-icon
_tbi-social-media__share-icon