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NGO For Women

नौकरी छोड़ लौटे स्वदेश, संवार रहे लाखों बच्चों व महिलाओं की जिंदगियां

पिछले साल की बात है जब अमेरिका के एक संगठन ने भारत के लगभग एक लाख जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक सहायता पहुंचाई। इस संगठन ने जरूरतमंद परिवार के बच्चों को आर्थिक रूप से सबल बनाने की कोशिश की है। आज हम उस संगठन की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह एक ऐसे एनआरआई (NRI) की कहानी है, जिन्होंने शिक्षा के लिए अपना शहर छोड़ दिया था।

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पिछले साल की बात है जब अमेरिका के एक संगठन ने भारत के लगभग एक लाख जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक सहायता पहुंचाई। इस संगठन ने इन जरूरतमंद परिवार के बच्चों को आर्थिक रूप से सबल बनाने की कोशिश की है। आज हम उस संगठन की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि यह एक ऐसे एनआरआई (NRI) की कहानी है, जिन्होंने शिक्षा के लिए अपना शहर छोड़ दिया था। यह NRI सैयद हुसैनी की यात्रा है, जिन्होंने शिक्षा की खोज में अपने शहर हैदराबाद को छोड़ दिया था और आज इस संगठन के द्वारा जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत से टेक्सस तक पहुंचने का सफ़र

सैयद ने साल 1972 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। लेकिन शहर में नौकरियों की कमी के कारण उन्हें रोजगार नहीं मिल सका। रोजगार की तलाश में उन्होंने पश्चिमी देशों की ओर रुख किया और उच्च शिक्षा प्राप्त करने का फैसला भी किया। उन्होंने इंजीनियरिंग में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वह टेक्सस स्थित डैलस शहर में ही बस गए।

द बेटर इंडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने गरीबी को महसूस किया है। वह दौर था, जब मेरे पास पैसे नहीं थे। उस समय, निज़ाम चैरिटेबल ट्रस्ट ने मुझे स्कॉलरशिप के रूप में कुछ पैसे दिए थे, जिससे मैंने हवाई जहाज का टिकट बुक कराया था। इस तरह से मैंने अपनी शिक्षा पूरी की थी। यदि आपके पास पैसे और संसाधन नहीं हैं, तो कुछ बनना बहुत मुश्किल हो सकता है।”

डैलस में रहकर ही उन्होंने अगले 26 साल तक कॉरपोरेट जगत में काम किया। साल 2007 में 69 साल की उम्र में उन्होंने नौकरी से रिटायरमेंट लेने का फैसला लिया। अगर NRI सैयद हुसैनी को आर्थिक मदद ना मिली होती तो दो दशक के अधिक समय तक चलने वाला उनका करियर संभव नहीं हो पाता। यह बात उनके दिमाग में हमेशा के लिए बनी रही।

सीड (SEED) की शुरुआत और क्या है इसका मकसद

सैयद ने बताया, “भारत में बहुत से लोगों को आर्थिक तंगी के कारण स्कूल जाने का मौका नहीं मिलता है। मैंने बहुत करीब से देखा है कि भारतीय समाज के सबसे गरीब व्यक्ति को आश्रय, भोजन और दवा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।”

Logo Of SEED
Logo Of SEED (Source : Seed Organisation)

गरीब और वंचित तबके के छात्रों की मदद के लिए सैयद हुसैनी ने 2009 में समान विचारधारा वाले लोगों के साथ मिलकर अमेरिका में Support for Educational and Economic Development (SEED) नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन अमरीकी सरकार द्वारा रजिस्टर्ड है। शुरुआती दिनों से ही इस संगठन को लोगों से आर्थिक मदद मिल रही है। इसके बारे में NRI सैयद हुसैनी कहते हैं, “यह सब समुदाय की एकता की बदौलत संभव हुआ है, मैं तो बस एक माध्यम हूं।”

एक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में यह संगठन पश्चिमी देशों में बसे भारतीय समुदाय के छात्रों के साथ साथ अन्य लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहा है। सैयद हुसैनी ने बताया कि वर्तमान में संगठन द्वारा कई तरह के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। वह कहते हैं, “हमारा मकसद गरीब बच्चों को स्कूल जाने में मदद करना है ताकि उन्हें भविष्य में आजीविका कमाने में मदद मिल सके। लोगों की बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखना और युवा अपनी शिक्षा पूरी कर सकें यह जिम्मेदारी संगठन की है।”

क्या विदेशों से ऐसे धनराशि लेना लीगल है?

यह संगठन मीडिया के अलग-अलग माध्यमों के द्वारा अपनी बात लोगों तक पहुंचाती है और इस तरह कई लोग दान देते हैं और इससे जरूरतमंद लोगों को मदद मिलती है। दान की इस तरह की राशि को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) द्वारा संचालित गैर सरकारी संगठनों को दिया जाता है, जिससे जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचती है। हैदराबाद स्थित NAM Foundation, कोलकाता स्थित The Calcutta Muslim Orphanage और कर्नाटक स्थित Zohra Women and Children Charitable Welfare Trust जैसी संस्थाओं को सहायता पहुंच रही है।

सैयद हुसैनी (NRI) ने अपने जीवन में ढेर सारी चुनौतियों का सामना किया है, जिनमें से एक है निवेश करने के लिए सही योजना बनाने की चुनौती। अमेरिका में स्थित सीड चैरिटेबल ट्रस्ट अपने स्पष्ट मकसद के साथ लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में लगा हुआ है। ऐसे में कई पार्टनर चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़ने के लिए बोर्ड के पास पहुंचते हैं।

वहीं बोर्ड का इन पार्टनर्स से पहला सवाल यही रहता है कि वे एफसीआरए से प्रमाणित हैं या नहीं। एफसीआरए एक लाइसेंस है, जो भारत सरकार भारतीय संस्थाओं को विदेश से धन की प्राप्ति और उसके उपयोग को विनियमित करने के मकसद से जारी करती है। इसके साथ ही बोर्ड पार्टनर के काम करने की प्रामाणिकता की जांच के लिए छोटे स्तर पर एक योजना शुरू करता है।

बेरोज़गारों, महिलाओं व बच्चों की करते हैं मदद

The Widows & Destitute Families Support programme सीड चैरिटेबल ट्रस्ट की एक ऐसी परियोजना है, जो महिलाओं को गंभीर संकट में लाभ पहुंचाने के लिए काम करती है। इस परियोजना के तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता और रोजगार उपलब्ध होता है, जिससे वे अपने बच्चों का भरण-पोषण कर सकती हैं।

NRI सैयद हुसैनी कहते हैं, “आज के समय में 550 भारतीय महिलाओं को हमारी ओर से मासिक आय इस शर्त पर मिलती है कि वे अपने परिवार के लिए बुनियादी जरूरतों के साथ-साथ अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला कराएं। मासिक आय के तौर पर एक हजार से सात हजार के बीच की राशि महिलाओं को दी जाती है। हालांकि यह राशि परिवार की बुनियादी जरूरतों और बच्चों की संख्या पर निर्भर करती है।”

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साल 2014 में, संगठन ने बेरोजगार युवाओं और बीच में ही पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं को कौशल-आधारित प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए कर्नाटक स्थित Zohra Women and Children Charitable Welfare Trust के साथ आवासीय व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान का उद्घाटन किया। इसी तरह, वंचित तबके के बच्चों के लिए ट्यूशन फीस का भुगतान किया जाता है। साल 2021 में कुल 800 कॉलेज छात्रों को छात्रवृत्ति दी गई है।

Syed Hussaini With Children. He started NGO for women & children
Syed Hussaini With Children (Source: The Hans India)

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी शुरू किया काम

सीड ने स्वास्थ्य सेवा पर ध्यान केंद्रित करने वाले गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से क्लिनिक की शुरुआत की है। हैदराबाद में Helping Hand Foundation के संस्थापक मुजतबा अस्करी ने ऐसे ही एक क्लिनिक के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “राबिया क्लिनिक का संचालन हमारे द्वारा किया जाता है, एम्बुलेंस से लेकर इलाज तक और इसे सीड द्वारा आर्थिक सहयोग मिलता है। यह क्लिनिक एक दिन में 200 मरीजों को देख सकता है।”

इस तरह के क्लिनिक में अपनी बेटी का इलाज करवाने वाली हैदराबाद की एक महिला साध्या कहती हैं, “मेरी छोटी बेटी हाल ही में दस्त से पीड़ित हुई थी। इससे पहले, किसी भी मेडिकल इमरजेंसी के लिए बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती थी, जो आने-जाने और दवा खरीदने में खर्च होती थी। लेकिन राबिया क्लिनिक की वजह से अब मैं अपने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सुरक्षित महसूस करती हूं। मेरा पूरा परिवार जरूरत पड़ने पर क्लिनिक में परामर्श करता है और इलाज में पैसे भी खर्च नहीं होते हैं।”

एक साल में की 1,50,000 गरीबों की सहायता

हैदराबाद में ऐसे लगभग 13 प्राथमिक और मधुमेह क्लीनिक हैं और एक क्लीनिक उत्तर प्रदेश के जगदीशपुर में भी चल रहा है। NRI सैयद हुसैनी ने कहा कि इस साल अमेरिका स्थित चैरिटेबल ट्रस्ट सीड ने भारत में कुल 1,50,000 गरीबों की सहायता की है। इनमें से 18,000 बच्चों को स्कूल भेजा गया और 80,000 लोगों ने मुफ्त चिकित्सा सेवाओं का लाभ उठाया है।

टीम सीड के इस प्रयास की सराहना की जाती है। यह सच है टीम सीड द्वारा ये सभी प्रयास एक ऐसे शहर में किया जाता है जो भारत से दूर बसा है। टीम सीड ने भारत सरकार से भारत में एक शाखा खोलने के लिए आवेदन किया था जिसे सरकार ने रद्द कर दिया। इस चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े लोग समय – समय पर अपना योगदान देते हैं।

यदि आप भी इस संगठन तक सहायता पहुंचाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।

मूल लेख- रिया गुप्ता

संपादन- जी एन झा

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