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मंदिर से इकट्ठा होने वाले फूलों को जैविक खाद में बदल रहे हैं अहमदाबाद के ये दो इंजीनियर!

अर्जुन ठक्कर और यश भट्ट

क्या आपने कभी भी सोचा है कि हम जो रोज मंदिरों में जाकर भगवान् को फूल, अगरबत्ती, फल आदि चढ़ाते हैं, उनका पूजा के बाद क्या होता है? खासकर, फूलों का?

हर रोज मंदिरों में ना जाने कितने ही श्रद्धालु भगवान को फूलों की बनी माला, छत्र, चादर, आभूषण आदि अर्पित करते हैं। लेकिन हम वापिस आकर यह सोचते ही नहीं कि आखिर हमारे मंदिर इतने फूलों का क्या करते होंगे?

एक सीधा-सा जबाब, इनका विसर्जन, लेकिन कहाँ? जी हाँ, ज्यादातर पूजा में चढ़ी सामग्री को किसी भी पानी के स्त्रोत में बहा दिया जाता है, बिना यह सोचे-समझे कि इसका पानी और जलीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। लेकिन अहमदाबाद के रहनेवाले इंजीनियरिंग के do छात्रों ने न केवल इस बारे में सोचा बल्कि उन्होंने इसका समाधान भी ढूंढ निकाला।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए 21 वर्षीय अर्जुन ठक्कर ने बताया कि वे अपने दोस्त यश भट्ट (21 वर्षीय) के साथ मिलकर कॉलेज के एक प्रोजेक्ट के लिए ‘वेस्ट मैनेजमेंट’ (कचरा प्रबंधन) पर रिसर्च कर रहे थे। इसी के अंतर्गत उन्होंने मंदिरों से इकट्ठा होने वाले कचरे से जैविक खाद बनाने के बारे में सोचा।

प्रतीकात्मक तस्वीर/विकिमीडिया कॉमन्स/ट्रेडइंडिया

अर्जुन ने बताया, “केवल अहमदाबाद में ही लगभग 1500 मंदिर हैं और इन मंदिरों से हर दिन लगभग 2 टन फूल इकट्ठा होते हैं, इसलिए हमने सोचा कि क्यों न सबसे पहले इस पर काम किया जाये।”

सबसे पहले अर्जुन और यश ने बहुत से मंदिरों की समिति से बात की और उनसे जाना कि वे इन फूलों का क्या करते हैं। अर्जुन बताते हैं कि सबने बहुत अलग-अलग जबाब दिए, हिन्दू पुजारियों ने कहा कि हम नदी/तालाब में बहा देते हैं! वहीं जैन मंदिरों के संस्थापकों ने बताया कि वे इन फूलों को खुली हवा में छोड़ देते हैं।

अर्जुन ने कहा, “इनका जवाब सुनकर हमें लगा कि भारत में प्रदूषण बढ़ने के कारणों में एक यह भी शामिल है और इस पर काम करना बहुत जरूरी है। इसलिए हमने ‘बेस्ट आउट ऑफ़ वेस्ट’ (कचरे से अच्छी चीज़े निकालना) के तरीकों पर विचार किया। ताकि नदी और मिट्टी के प्रदूषण को कम किया जा सके और इसी के साथ लोगों की आस्था को भी ठेस नहीं पहुंचेगी।”

साल 2016 में अर्जुन और यश ने इस पर काम करना शुरू किया। उन्होंने अलग-अलग चीज़ों पर रिसर्च की और जाना कि वे कैसे फूलों से जैविक खाद आदि बना सकते हैं। उन्होंने अपनी इस पहल को ‘ब्रूक एंड ब्लूम’ नाम के साथ रजिस्टर करवाया। ब्रूक का मतलब ‘नदी की धारा’ और ब्लूम का मतलब ‘फूलों का खिलना’!

अपनी रिसर्च के दौरान उन्हें पता चला कि कोई भी साधारण जैविक खाद बनाने में लगभग 45- 60 दिन का समय लग जाता है। ऐसे में अर्जुन और यश ने मशीन को मॉडिफाई कर इस तरीके से बनवाया कि इस प्रक्रिया में केवल 15- 20 दिन लगें।

इस मशीन में सबसे पहले फूलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में अलग किया जाता है। जिसके बाद इन टुकड़ों को कैटेलिस्ट डालकर मशीन में पीसा जाता है। सबसे आखिर में इसे मशीन द्वारा छाना जाता है।

अर्जुन और यश को उनके प्रोजेक्ट के लिए गुजरात टेक्निकल यूनिवर्सिटी के इन्क्यूबेशन सेंटर की स्टूडेंट स्टार्टअप इनोवेशन पॉलिसी के तहत फंडिंग मिली। इस पॉलिसी के जरिये कोई भी छात्र इन्नोवेटर अपने स्टार्टअप के लिए फंडिंग ले सकता है। 95,000 रूपये की फंडिंग के अलावा इन्होंने अर्जुन और यश को मशीन के लिए जगह भी दी, जहां उन्होंने दो महीने तक अपना पायलट प्रोजेक्ट किया।

जब अर्जुन और यश अपने प्रोजेक्ट में सफल होने लगे तो उन्हें ‘कलश प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत अहमदाबाद नगर निगम से जुड़ने का भी मौका मिला। अर्जुन ने बताया, “शुरू में, हम खुद ही मंदिरों से फूल आदि इकट्ठा करके लाते थे। लेकिन अब हमें एएमसी ने ट्रांसपोर्टेशन की सहयता दी है। साथ ही, अलग- अलग जगहों से जसोदाबेन जैसे कॉर्पोरेटर भी हमारी मदद कर रहे हैं। ये सभी लोग अपने-अपने इलाकों के मंदिरों में डस्टबिन दान कर रहे हैं। ताकि सभी कचरे को अलग- अलग कर इनमें डाला जा सके।”

फ़िलहाल, अर्जुन और यश लगभग 28 मंदिरों से जुड़े हुए हैं, हालाँकि उन्हें यकीन है कि यह संख्या कुछ दिनों में 50 तक पहुंच जाएगी। वे प्रतिदिन लगभग 300 किलो फूल इन मंदिरों से इकट्ठा करते हैं और लगभग 30-40 किलो खाद प्रतिदिन बनाते हैं।

किसी भी बदलाव के रास्ते में चुनौतियाँ तो आती ही हैं। ऐसी ही कुछ परेशानियां अर्जुन और यश ने भी झेली। अर्जुन ने कहा, “शुरू में कुछ मंदिरों के संस्थापक तो फूल देने के लिए राजी हो गए, लेकिन कुछ जगहों पर लोगों को समझाना बहुत मुश्किल था। लेकिन जैसे-तैसे जब हमारी मुहीम शुरू हुई तो हम उन्हें इसके लिए अलग से डस्टबिन दे देते। जिस पर हम लिखते भी थे कि अलग-अलग तरह की चीज़ें अलग डस्टबिन में डालें। फिर भी लोग एक ही जगह सब डाल देते।”

फ़िलहाल, ब्रूक एंड ब्लूम जैविक खाद बना रहा है। लेकिन वे आगे के चरणों में गुलाब जल, अगरबत्ती आदि बनाने के लिए भी काम कर रहे हैं। अभी उनका जैविक खाद अहमदाबाद की कई नर्सरियों में जाता है। इसके अलावा वे मंदिरों में भी स्टॉल लगाना शुरू करेंगें ताकि लोगों को ये चीज़ें बेचने के साथ-साथ जागरूक भी किया जा सके। अभी वे जैविक सामान बेचने वाली दुकानों में भी बात कर रहे हैं ताकि वे उनके प्रोडक्ट भी अपने यहां रख लें।

अर्जुन बताते हैं कि वे समय-समय पर मंदिरों में जागरूकता अभियान भी चलाते हैं। जिसमें वे लोगों को बताते हैं कि किस तरह से नॉन-बायोडिग्रेडेबल पूजा सामग्री का इस्तेमाल प्रदूषण का कारण बनता है। इसके अलावा उनको ये भी बताया जाता है कि किस तरह से उनके द्वारा चढ़ाये हुए फूलों को वे नई ज़िन्दगी देकर जैविक खाद बना रहे हैं।

अर्जुन और यश का लक्ष्य एक महीने में 200 मंदिरों को अपनी इस पहल से जोड़ना है। ताकि उनके इस काम का असर पुरे अहमदाबाद में हो। जब भी हम पूजा करते हैं तो उससे हमारी भावनाएं और आस्था जुड़ी होती है और हम इसके लिए हर एक सामग्री बहुत ध्यान से लेते हैं, जिसमें कोई बुराई नहीं है। बस हमें याद रखना चाहिए कि हमारी एक ज़िम्मेदारी प्रकृति की तरफ भी है और हम कोशिश करें कि जो प्रकृति हमें देती है हम उसे और भी बेहतर तरीके से प्रकृति को लौटाएं।

अर्जुन ठक्कर से सम्पर्क करने के लिए आप उनके फेसबुक पेज या फिर thakkararjun111@gmail.com पर मेल कर सकते हैं।

संपादन – मानबी कटोच


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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