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टंकी से पानी बहता देख, आया आईडिया और बन गए आविष्कारक, मिले कई राष्ट्रीय पुरस्कार

टंकी से पानी बहता देख, आया आईडिया और बन गए आविष्कारक, मिले कई राष्ट्रीय पुरस्कार

इम्फाल, मणिपुर में रहने वाले एम. मनिहर शर्मा मात्र दसवीं पास हैं। लेकिन, उन्होंने कई आविष्कार किये हैं, जैसे ‘ऑटोमैटिक पंप ऑपरेटिंग सिस्टम’, ‘इनोवेटिव ड्रायर’, ‘इन्सेंसे स्टिक मेकिंग मशीन’, ‘सोलर सिल्क रीलिंग कम स्पिनिंग मशीन’ इत्यादि।

“किसी चीज का आविष्कार, ऐसे ही सोचकर या बातों में नहीं किया जाता। बचपन में हर बच्चा बड़ा होकर कुछ न कुछ बनने की सोचता है और उसके लिए कोशिश करता रहता है। बस फर्क यह है कि कुछ लोगों की यह चाह, समय के साथ धीरे-धीरे खत्म हो जाती है तो कुछ लोग अपनी अलग सोच और कुछ करने की चाह को जीवनभर अपने साथ रखते हैं। मैं शायद उन्हीं लोगों में से हूँ। इसलिए, अब तक भी कुछ न कुछ नया करने की कोशिश में लगा रहता हूँ। बचपन में खेलते समय हम सभी दोस्त, अपने घर-मोहल्लों में पड़ी कबाड़ की चीजों को इकट्ठा करते थे। फिर मैं उन चीजों को इस्तेमाल करके नए-नए खिलौने बनाता था। मुझे तब नहीं पता था कि आविष्कार या इनोवेशन क्या होता है” यह कहना है मणिपुर में इम्फाल के रहने वाले 76 वर्षीय एम मनिहर शर्मा का। 

कभी ऑटो ड्राइवर, मैकेनिक और एक डॉक्टर के असिस्टेंट रहे, मनिहर शर्मा की पहचान आज एक आविष्कारक के तौर पर है। उन्हें ‘नैशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ द्वारा उनके इनोवेशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया है। उनके इनोवेशन के लिए, उन्हें ग्रांट भी मिली हैं। मात्र 10वीं तक पढ़े मनिहर का जीवन गरीबी में बीता, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अब तक ‘ऑटोमैटिक पंप ऑपरेटिंग सिस्टम’, ‘इनोवेटिव ड्रायर’, ‘इन्सेंस स्टिक मेकिंग मशीन’, ‘सोलर सिल्क रीलिंग कम स्पिनिंग मशीन’ बनाई है। 

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि वह आठ-नौ साल के थे, जब उनकी माँ का देहांत हुआ। इसके बाद, उन्हें उनकी बुआ ने गोद ले लिया। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सी परेशानियां झेली हैं, लेकिन कभी भी हार नहीं मानी और तरह-तरह की मशीनें बनाते रहे। आगे भी उनकी योजना नए-नए आविष्कारों पर काम करने की है। 

Manipur Innovator
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को अपना इनोवेशन दिखाते मनिहर शर्मा

टंकी से पानी बहते देख किया पहला इनोवेशन: 

वह बताते हैं कि उनके एक डॉक्टर दोस्त के यहां, वह असिस्टेंट के तौर पर काम करते थे। उन्होंने आगे कहा, “वह सुबह-सुबह अपने घर पर मरीजों को देखता था और फिर अस्पताल जाता था। सुबह मरीजों को संभालने के लिए उसे मदद चाहिए होती थी, जो मैं कर देता था। एक दिन उसे आने में देरी हो गई। तब उसने बताया कि घर की टंकी में पानी नहीं था तो नहाने के लिए तालाब से पानी लाना पड़ा। ऐसा इसलिए होता था, क्योंकि दिन में उसके घर में कोई नहीं होता था, जो बिजली आने पर टंकी भर ले। उसकी परेशानी सुनकर मैंने कहा कि मैं इस परेशानी का कोई हल तुम्हे जरूर दूंगा।” 

हालांकि, इस बात को कई महीने हो गए और मनिहर अपने कार्यों में व्यस्त हो गए। लेकिन, एक दिन वह अपने उसी दोस्त के साथ कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक घर की टंकी से बहुत ज्यादा पानी बह रहा है। घर के मालिक शायद मोटर बंद करना भूल गए थे। इस बात ने उन्हें विचलित कर दिया कि पानी की किल्लत बढ़ रही है और जरा सी लापरवाही इस परेशानी को और बढ़ा सकती है। तब उन्होंने ठान लिया कि उन्हें कुछ तो करना पड़ेगा। साल 1997 में उन्होंने अपने ‘ऑटोमैटिक पंप ऑपरेटर’ का पहला प्रोटोटाइप तैयार किया। 

लेकिन आर्थिक परेशानियों के चलते, वह अपने इस इनोवेशन को बड़े स्तर पर न ले जा सके। उन्होंने कहा कि वह घर चलाने के लिए, अलग-अलग तरह के काम करते थे। कभी मैकेनिक बनते तो कभी ऑटोरिक्शा चलाते थे। इन सबके साथ, वह अपने कई आइडिया पर काम करने की कोशिश भी करते थे। इसलिए, उन्हें अपने लगभग हर एक इनोवेशन को पूरा करने और इसे लोगों तक पहुंचाने में काफी समय लगा। उनके ‘ऑटोमैटिक पंप ऑपरेटर’ को 2005 में ‘मणिपुर साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी काउंसिल’ से मदद मिली। 

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ऑटोमैटिक पंप ऑपरेटर

आर्थिक समस्या को दूर करने के बाद, उन्होंने तकनीकी समस्याओं को हल करने पर ध्यान दिया। इसके लिए, उन्होंने ‘सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ़ प्लास्टिक इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी’ से एक ट्रेनिंग कोर्स भी किया। वह बताते हैं कि यहां पर उन्होंने ‘प्लास्टिक मोल्डिंग तकनीक’ सीखी। लगभग 15 साल की मेहनत से उन्होंने ‘ऑटोमैटिक पंप ऑपरेटर’ के सात मॉडल बनाये, जो अलग-अलग तरह से काम करते हैं। उन्होंने आगे कहा, “यह ऑपरेटर एक कंट्रोल पैनल से काम करता है। जैसे ही घर की टंकी में पानी एक स्तर से नीचे जाता है तो पंप अपने-आप ऑन हो जाता है और जैसे ही टंकी भर जाती है, पंप बंद हो जाता है।” 

अपने इस इनोवेशन के लिए मनिहर को साल 2009 में, ‘नैशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया था। इसके बाद, उन्होंने फल-सब्जियों को ‘डीहाइड्रेट’ यानी सुखाने के लिए एक ख़ास ‘इनोवेटिव ड्रायर’ भी बनाया और फिर ‘धूप/इन्सेंस स्टिक मेकिंग मशीन’ का भी निर्माण किया। उन्होंने अपने घर में एक छोटी सी वर्कशॉप बनाई हुई है, जहां वह अपने सभी आइडिया पर काम करते हैं। 

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Dryer Machine and Incense Stick Making Machine

बनाई सोलर सिल्क रीलिंग कम स्पिनिंग मशीन: 

मनिहर ने बताया, “मणिपुर में ज्यादातर महिलाएं रेशम के काम से जुड़ी हुई हैं और हाथ से बोबिन में रेशम का धागा भरने और कातने में बहुत समय लगता है। इसलिए इस काम के लिए, बाजार में कई तरह की मशीनें भी उपलब्ध हैं। लेकिन, ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में बिजली की सुविधा बहुत कम है। जिस वजह से, मशीनों से काम करना आसान नहीं है।” इस परेशानी का हल ढूंढने के लिए, मनिहर ने सौर ऊर्जा से संचालित ‘सोलर सिल्क रीलिंग कम स्पिनिंग मशीन’ बनाई। उनकी इस मशीन के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। 

इस मशीन से रेशम की ‘रीलिंग’ और ‘स्पिनिंग,’ दोनों काम एक साथ हो सकते हैं। उनकी यह मशीन पर्यावरण के अनुकूल और किफायती है। इसे बहुत ही आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। यह मशीन सौर ऊर्जा और बिजली, दोनों से चल सकती है। आकार में छोटी होने के साथ-साथ, इस मशीन का वजन भी कम है और इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। साथ ही, यह हर तरह के रेशम के लिए अनुकूल है। 

अगर किसी के पास रेशम का ज्यादा काम है तो वह एक मशीन खरीदने की बजाय ‘डोमेस्टिक यूनिट’ (घरेलू इकाई) सेटअप कर सकता है। इसमें आपकी जरूरत के हिसाब से तीन या पांच मशीनें आती हैं। पांच मशीन वाली यूनिट की कीमत 70 हजार रुपए है और तीन मशीन की यूनिट की कीमत 46, 800 रुपए है। वहीं एक मशीन की कीमत 11 हजार रुपए है। मनिहर बताते हैं कि वह अब तक लगभग 80 मशीन बेच चुके हैं और उन्हें लगातार इस मशीन के लिए ऑर्डर मिल रहे हैं। 

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Solar Silk Reeling cum Spinning Machine

उत्तर-पूर्वी राज्यों में ‘एनआईएफ गुवाहाटी सैल’ के कोऑर्डिनेटर और वैज्ञानिक डॉ. नितिन मौर्य का कहना है, “मनिहर शर्मा अपने आसपास की समस्याओं पर बहुत गहराई से विचार करते हैं और फिर उनका समाधान ढूंढते हैं। जीवन में ढेरों परेशानियों के बावजूद, लोगों के लिए कुछ करने की उनकी चाह बिल्कुल भी कम नहीं हुई है। उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया है और एनआईएफ ने उनके तीन आविष्कारों के लिए पेटेंट फाइल किया है, जिसमें से ‘इनोवेटिव ड्रायर’ के लिए उन्हें पेटेंट मिल गया है।” वह आगे कहते हैं कि एनआईएफ द्वारा उन्हें उनकी मशीनों को अच्छे स्तर पर विकसित करने और उनकी मार्केटिंग करने में मदद दी जा रही है। 

मनिहर शर्मा कहते हैं कि उन्हें अपने सफर में बहुत से लोगों का साथ मिला है, जिनकी वजह से वह यहां तक पहुंचे हैं। आगे भी, उनकी योजना लोगों के लिए कुछ न कुछ नया बनाते रहने की है। साथ ही, वह हर किसी को अपने आइडिया को समझने और उन पर काम करने की सलाह देते हैं। 

अगर आप मनिहर शर्मा से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे कोई मशीन खरीदना चाहते हैं तो उन्हें mmanihar.mm@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं। 

संपादन – प्रीति महावर

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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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