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अब हाउसवाइफ को बेरोजगार नहीं समझा जाएगा; सरकार करेगी उनके काम के मूल्य का आंकलन!

प्रतीकात्मक तस्वीर/विकिमीडिया कॉमन्स

पिछले कुछ समय से देश में गृहणियों के काम को लेकर बहस तेज हुई है। कल तक गृहणियों या फिर अपने खेतों में काम करने वाली महिलाओं के काम की गिनती कहीं भी नहीं होती थी। लेकिन अब भारत में इन सभी के काम को पहचान मिलने जा रही है।

दरअसल, भारत ने इन महिलाओं के काम की मैपिंग करने का फैसला किया है। जिसमें इनके काम को भी रोजगार के नजरिये से देखा जायेगा। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस, जनवरी 2019 से एक वर्ष का घरेलू सर्वेक्षण आयोजित करेगा इनके काम को मापने के लिए। इसमें पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि घरेलू महिलाएं किस तरह से अपना समय घर में बिताती हैं।

रोजगार के गिरते आंकड़ों को देखते हुए, सरकार बिना भुगतान वाले काम, विशेष रूप से घरेलू कामों के मूल्य का अनुमान चाहती है। ब्लूमबर्ग से बात करते हुए, एनएसएसओ के महानिदेशक देवी प्रसाद मंडल ने कहा कि सर्वेक्षण के निष्कर्ष जून 2020 में प्रकाशित किए जाएंगे।

हर तीन साल में एक बार ऐसा सर्वे कराया जाएगा। मंडल ने कहा कि इससे यह जान सकेंगे कि महिलाएं खाना पकाने और कपड़े धोने जैसे कामों में कितना वक्त देती हैं। इन नतीजों से पॉलिसी बनाने वालों को यह जानने में मदद मिलेगी कि अर्थव्यवस्था में रोजगार की क्या स्थिति है और वेलफेयर प्रोग्राम्स किस तरह से चलाए जा सकते हैं।

कुछ अनुमानों के मुताबिक, लगभग 70 करोड़ भारतीयों का योगदान- जो घरेलू कार्य करते हैं- राष्ट्रीय आय में दर्ज नहीं होते क्योंकि वे औपचारिक रूप से वर्कफोर्स का हिस्सा नहीं हैं। खासतौर पर महिलाओं की बात करें तो घर में किए गए उनके कामों को राष्ट्रीय आय में नहीं जोड़ा जाता।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पहचान न मिलने का सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को होता है। क्योंकि लगभग 75% महिलाएं बिना किसी वेतन के घ्रेरलू काम व देखभाल का काम करती हैं- जो वैश्विक जीडीपी में 13% का योगदान देता है।

भारत में 2011 की जनगणना के निष्कर्षों के अनुसार, 1590.9 लाख महिलाओं ने अपने मुख्य व्यवसाय के रूप में “घरेलू कार्य” कहा था। फेमिनिस्ट अर्थशास्त्री के अनुमानों के अनुसार, महिलाओं द्वारा किए गए अवैतनिक काम का मूल्य प्रति वर्ष लगभग 16 लाख करोड़ है। इस बारे में सामाजिक वैज्ञानिक अमृता नंदी और रोहिणी हेन्समैन ने द इंडियन एक्सप्रेस के एक कॉलम में तर्क दिया है,

“महिलाओं द्वारा बिना किसी वेतन के किये गए काम सीधे देश की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं। क्योंकि महिलाओं के इन्हीं कामों की वजह से बाकी सभी औपचारिक नौकरियां संभव हो पाती हैं।”

जो लोग महिलाओं के काम को रोजगार की दृष्टि से नहीं देखते उनके लिए नंदी और हेन्समैन कहते हैं,

“कोई कमाई नहीं करना और कोई काम ना करना, इन दोनों बातों में बहुत फर्क है, यदि आप बीमार या फिर अक्षम नहीं हैं तो। क्योंकि बेटियों, बहनों, पत्नी या फिर माँ के रूप में महिलाएं बिना किसी छुट्टी के फुल-टाइम काम करती हैं। इसके अलावा वे बच्चों की देखभाल का काम भी करती हैं। लेकिन इस काम में और औपचारिक नौकरी में सबसे बड़ा अंतर है कि इस काम की कोई सैलरी नहीं मिलती।”

हम उम्मीद करते हैं कि इस सर्वे से देश में इस अंतर को खत्म करने की कोशिश की जाएगी।


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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