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Organic Cotton Farming

जानिए कैसे! यह किसान जैविक तरीकों से देसी कपास उगाकर, बनाता है जैविक कपड़े, कमाई लाखों में

पंजाब के फाजिल्का में गांव ढिंगावाली के रहने वाले 60 वर्षीय किसान, सुरेंद्र पाल सिंह अनाज, दलहन, तिलहन और फलों के साथ-साथ, देसी कपास की भी जैविक खेती करते हैं। वह खुद अपने कपास की प्रोसेसिंग कर, इससे त्वचा के लिए उपयुक्त जैविक कपड़े भी बनवा रहे हैं।

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आज देश के बहुत-से किसान रासायनिक खेती के दुष्परिणामों को समझकर, जैविक और प्राकृतिक खेती की तरफ लौट रहे हैं। खासकर, युवा किसान जैविक खेती को लेकर काफी सकारात्मक हैं। इसके साथ ही, लोगों में भी स्वस्थ खान-पान को लेकर काफी जागरूकता आई है। अब, लोग न सिर्फ पोषण से भरपूर भोजन करना चाहते हैं बल्कि पहनावे के लिए, जैविक सूती कपड़ों की मांग भी काफी बढ़ रही है। बाजार में आपको ऐसे बहुत से ब्रांड मिलेंगे, जो जैविक सूती कपड़े की बिक्री करते हैं। लेकिन, आज हम आपको एक ऐसे किसान से मिलवा रहे हैं, जो न सिर्फ खुद जैविक तरीकों से कपास की खेती (Organic Cotton Farming) करते हैं बल्कि जैविक तरीकों से कपड़े भी बना रहे हैं। 

पंजाब के फाजिल्का में गांव ढिंगावाली के रहने वाले 60 वर्षीय किसान, सुरेंद्र पाल सिंह दसवीं तक पढ़े हैं तथा खेती उन्हें विरासत में मिली है। वह कहते हैं, “हमारे यहाँ लोग या तो किसानी करते हैं या फिर भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देते हैं। मैंने सेना में जाने का प्रयत्न किया पर किसी कारणवश नहीं जा पाया। इसलिए, मैंने खेती करने पर ध्यान दिया। आज भी हमलोग संयुक्त परिवार में ही रहते हैं और हम सब मिलजुल कर जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं।” 

वह बताते हैं, “हमारे परिवार के पास काफी जमीन है इसलिए, हम जैविक और प्राकृतिक तरीकों से खेती करना, अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।जब धरती हमें इतना कुछ देती है तो उसके प्रति हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है। मैंने अपने बाप-दादा से यही सीखा कि अगर हम जमीन और प्रकृति से खिलवाड़ करेंगे तो अपना अस्तित्व खतरे में डालेंगे।” 

Organic Cotton Farming
सुरेंद्र पाल सिंह

इसलिए, उन्होंने कभी भी रासायनिक खेती पर जोर नहीं दिया। अगर, कभी रसायन इस्तेमाल किया भी तो बहुत ही कम मात्रा में। साल 1992 से, वह पूरी तरह से जैविक तथा प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनके यहाँ अमरूद, कीनू जैसे फलों के बागान हैं और इसके अलावा, वह गेहूं, बाजरा, ज्वार, मक्का, तिल, दाल, और कपास की खेती भी करते हैं। वह अपने घर के लिए साग-सब्जियां भी जैविक तरीकों से लगाते हैं। उनका कहना है, “अपने घर-परिवार की लगभग सभी जरूरतों के लिए मैं खेती पर ही निर्भर हूँ। हमारा खाना-पीना तो पहले ही हमारी खेती पर निर्भर था और अब हम ज्यादातर अपने जैविक कपास से ही कपड़े बनवाते हैं।” 

कपास की जैविक खेती 

सुरेंद्र अपनी चार एकड़ जमीन पर जैविक कपास की खेती करते हैं। वह कहते हैं, “पहले उत्तर-भारत में देसी कपास की खेती होती थी और चरखों व हथकरघों पर इसकी कताई, बुनाई करके कपड़ा बनाया जाता था। लेकिन आधुनिकता के चक्कर में, अब आपको चरखे ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेंगे। अब देसी कपास उगाने वाले किसान भी बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। ज्यादातर किसान इसकी हाइब्रिड किस्म ‘बीटी कपास’ (BT Cotton) लगाते हैं। मैंने कभी अपने खेतों में हाइब्रिड कपास नहीं लगाई।” 

इसका मुख्य कारण है, उनके पशुधन। उनके घर में गाय-भैंसें पाली जाती हैं और इनके लिए, हरे चारे के अलावा दलिया, सरसों खली और बिनौला की जरूरत होती है। कपास की चुनाई (हार्वेस्टिंग) के बाद, जब उसकी बिलाई की जाती है तो उससे रुई और बिनौला बनता है। किसान, रुई को कपड़ा व्यवसायियों को देते हैं और बिनौला पशुओं के चारे के काम आता है। लेकिन सुरेंद्र का कहना है कि हाइब्रिड किस्म के कपास से जो बिनौला बनता है, वह पशुओं के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं होता है। इसलिए, उन्होंने हमेशा जैविक तरीकों से देसी कपास (Cotton) ही उगाई।  

सुरेंद्र बताते हैं, “कपास (Cotton) की बुवाई मई के महीने में हो जाती है। इससे एक महीने पहले, हम खेत को बुवाई के लिए तैयार करते हैं। जिस जमीन पर कपास लगानी है, उसकी अच्छे से जुताई की जाती है। इसके बाद, खेत को एक-दो हफ्तों के लिए खाली छोड़ दिया जाता है। वैसे तो इतने सालों से हो रही जैविक खेती के कारण, हमारे खेतों की मिट्टी काफी उपजाऊ हो गई है लेकिन, हम जुताई से पहले खेत में जीवामृत का छिड़काव कर देते हैं। अगर, कभी शुरू में जीवामृत नहीं दे पाएं तो जुताई के बाद और बुवाई से पहले खेत की सिंचाई के साथ जीवामृत दिया जाता है।” 

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कपास की खेती

जिस जमीन पर वह कपास लगाते हैं, उसी में कपास के साथ कुछ ऐसी फसलों की मिश्रित खेती करते हैं, जो मिट्टी में ‘नाइट्रोजन फिक्सेशन‘ का काम करें। जैसे वह मूंग और मोठ की दाल को कपास के साथ लगाते हैं। अधिक उत्पादन के लिए अच्छा पोलीनेशन होना जरुरी है। उन्होंने आगे कहा, “पोलीनेशन पक्षियों की मदद से होता है। इसलिए, हम कपास और दालों के बीच में, बाजरा या ज्वार की एक दो कतार लगाते हैं। क्योंकि, उनके फूलों से पक्षी आकर्षित होते हैं। साथ ही, खेतों की सीमा पर अरहर और गेंदे के फूल लगाए जाते हैं। इस तरह से, हम प्राकृतिक तरीकों से ही पोषण, पोलीनेशन और कीट-प्रबंधन कर लेते हैं। इन तरीकों से खेती करने से, आपको किसी रसायन की जरूरत नहीं पड़ती है।” 

सुरेंद्र लंबे वक्त से जैविक खेती कर रहे हैं। वह कहते हैं, “हमारे खेत का माहौल अब ऐसा है कि अगर किसी फसल में कीट लग भी जाए तो हम ज्यादा चिंता नहीं करते। क्योंकि, हमें पता है कि प्रकृति इसका प्रबंधन खुद-ब-खुद कर लेगी।” कपास की फसल की चुनाई अक्टूबर महीने में की जाती है। सुरेंद्र कहते हैं कि उन्हें एक एकड़ जमीन से लगभग तीन से सात क्विंटल कपास का उत्पादन मिलता है। 

खुद बना रहे हैं जैविक सूती कपड़े

सुरेंद्र बताते हैं कि वह पंजाब में जैविक खेती के लिए काम कर रही संस्था ‘खेती विरासत मिशन‘ से जुड़े हुए हैं। इनके साथ मिलकर, वह जैविक खेती के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैला रहे हैं। जैविक खेती के साथ-साथ खेती विरासत मिशन, पंजाब की पारंपरिक हस्तशिल्प कलाओं जैसे चरखा, फुलकारी आदि को भी सहेजने की कोशिश कर रहा है। मिशन द्वारा होने वाले आयोजनों में हिस्सा लेकर, सुरेंद्र ने यह जाना कि कपास उद्योग में रसायनों का प्रयोग करके, सूती कपड़े बनाए जा रहे हैं। भले ही वह जैविक कपास बाजार तक पहुँचा रहे हैं लेकिन, अगर कपड़े बनाने में अब भी रसायनों का प्रयोग हो रहा है तो इसका क्या फायदा? 

इसलिए, साल 2009 से उन्होंने तय किया कि वह अपने कपास की प्रोसेसिंग करके खुद कपड़े बनाएंगे। वह कहते हैं, “कपास की प्रोसेसिंग के लिए चरखे और हथकरघा मिलना बहुत ही मुश्किल हो गया था। क्योंकि जैसे-जैसे पंजाब में कपास की खेती कम हुई, वैसे ही घरों में चरखे से सूत कातना भी लगभग खत्म सा हो गया। पहले हर गाँव में जुलाहे होते थे, जो कपड़े बुनते थे। लेकिन, अब यह समुदाय भी आपको कहीं-कहीं ही मिलेगा। मैंने अपनी कपास को लगभग तीन साल तक बाजार में नहीं बेचा। लेकिन, जब कोई हथकरघा नहीं मिला तो मैंने एक ‘पावर लूम’ में बात की और 2013 में, उनसे ही कपास के जैविक सूती कपड़ें तैयार करवाने शुरू किये।” 

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कपास से मिली रुई और तैयार कपड़ा

हालांकि, इन कपड़ों को बनाने में कई तरह की परेशानियां आई लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी। वह कहते हैं, “एक क्विंटल कपास में 100 मीटर से ज्यादा कपड़ा बन जाता है और कपड़े की मात्रा इस पर भी निर्भर करती है कि आप कपड़ा मोटा बनवा रहे हैं या पतला। सामान्य किसान को एक क्विंटल कपास बाजार में बेचने से पांच-छह हजार रुपए मिलते हैं। वहीं हम एक क्विंटल कपास से तैयार कपड़े की बिक्री से 19 हजार रुपए तक कमा लेते हैं।”

अभी भी वह पावर लूम से ही कपड़े बनवा रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में, खेती विरासत मिशन की टीम ने पंजाब के गांवों में चरखों और हथकरघों को सहेजने का काम भी किया है। 

मिशन की एक सदस्य, रुपसी गर्ग बताती हैं, “हमारा उद्देश्य पंजाब की खोई हुई विरासत को वापस लाना है। पिछले 15-16 सालों से हमारा यही एक उद्देश्य है कि यहाँ का हर किसान जैविक खेती करे और इस तरह स्थानीय कला तथा शिल्प को सहेजा जाए। महिलाओं के साथ हम ‘त्रिंजन’ नामक एक प्रोग्राम चला रहे हैं। जिसके जरिए, हम महिलाओं को चरखे, हथकरघे, और दरी बनाने जैसे कामों से जोड़ रहे हैं। इस काम में सुरेंद्र जी जैसे किसानों का सहयोग, बहुत मददगार साबित हुआ है। सुरेंद्र जी का अनुभव हमें बहुत काम आता है। जिस जगह कपास की खेती लगभग खत्म हो चुकी थी, वहाँ वह देसी कपास उगाकर, एक मिसाल कायम कर रहे हैं।” 

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रुपसी गर्ग और सुरेंद्र पाल

आने वाले समय में, सुरेंद्र कपड़े बनाने के लिए मिशन द्वारा तैयार किए जा रहे महिला समूहों को ही, अपना कपास देने की योजना पर काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि कपास की फसल ऐसी फसल है, जिसमें चुनाई से लेकर इसकी बुनाई तक के हर पड़ाव पर, लोगों को रोजगार दिया जा सकता है। जब उनके खेत में कपास की चुनाई होती है तो वह एक बार में, लगभग 45 कामगारों को रोजगार देते हैं। 

सीधा ग्राहकों तक पहुँचा रहे हैं कपड़े 

सुरेंद्र जो भी जैविक सूती कपड़े बनवाते हैं, उन्हें वह सीधा ग्राहकों तक पहुँचा रहे हैं। वह कहते हैं, “इतने सालों में मुझसे सैकड़ों ग्राहक जुड़े हैं। उनके यहाँ अनाज, दाल और फल आदि हमारे खेतों से ही जाता है। इसलिए, जब हमने कपड़े बनाने शुरू किए तो इन्हीं ग्राहकों से शुरुआत की। हम एक ही जगह अपने सभी कपड़े नहीं पहुँचाते बल्कि ग्राहक हमसे साल भर कपड़ों की खरीदी करते रहते हैं।”

इसके अलावा, उन्हें रजाई-गद्दे बनाने के भी आर्डर मिलते हैं। वह इन कपड़ों से रजाई-गद्दों के खोल बनवाते हैं, जिसमें जैविक रुई ही भरी जाती है। वह कहते हैं कि रसायनों के इस्तेमाल से बने कपड़े पहनने या अन्य तरह से उपयोग में लेने से, लोगों को त्वचा संबंधित बीमारियां हो रही हैं। इसलिए, बहुत से ग्राहक उनसे जैविक कपास से बने कपड़े और रजाई-गद्दे खरीदते हैं। लुधियाना की उनकी एक ग्राहक सुप्रिया सदन ने, न सिर्फ अपने लिए बल्कि इंग्लैंड में रहने वाली अपनी बेटी के लिए भी, उनसे रजाई-गद्दे बनवाकर इंग्लैंड भेजे हैं। 

सुप्रिया को सिंथेटिक कपड़ों से बनी रजाई और गद्दों के कारण त्वचा संबंधित परेशानी रहती थी। लेकिन, जबसे उन्होंने जैविक कपास से बने रजाई-गद्दे का इस्तेमाल किया है, उनकी परेशानी खत्म हो गयी हैं। उनकी बेटी को भी यही समस्या थी। इसलिए, उन्होंने उसके लिए भी आर्डर देकर चीजें बनवाई। एक और ग्राहक, सुनैना वालिया ने तीन-चार महीने में लगभग 70 मीटर कपड़ा खरीदा है। जालंधर में प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधनों का व्यवसाय करने वाली सुनैना को ‘खेती विरासत मिशन’ के जरिए ही सुरेंद्र के बारे में पता चला। 

वह कहती हैं, “मैं अपने ग्राहकों को ‘मेकअप रिमूवर’ भी उपलब्ध कराती हूँ। हम मेकअप हटाने के लिए, रुई का इस्तेमाल कर उसे फेंक देते हैं, जो पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है। इसलिए, जब मुझे सुरेंद्र जी के जैविक कपड़ों के बारे में पता चला तो मैंने उनसे कुछ मीटर कपड़ा खरीदा और इससे बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाले, मेकअप रिमूवर पैड बनाए। ये सभी तरह की त्वचा के लिए उपयुक्त हैं। इनके लिए, मुझे अपने ग्राहकों से भी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। इसलिए, अब मैं उनके जैविक कपड़ों से और भी अलग-अलग चीजें बनाने पर विचार कर रही हूँ।” 

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विदेशों से भी आते हैं लोग उनके खेत देखने

सुरेंद्र कहते हैं कि फ्रांस के एक कपड़ा उद्यमी, जो बच्चों के लिए सूती कपड़ों की बिक्री करते हैं, उनके सूती कपड़ों से बच्चों को त्वचा संबंधित समस्या आने लगी। ऐसे में, उन्होंने इसका कारण जानना चाहा तो पता चला कि यह हाइब्रिड किस्म के कपास और रसायनों के प्रयोग के चलते हो रहा है। इसलिए, वह जैविक कपास उगाने वाले किसानों के खेतों को देखने तथा खेती से जुड़ी बारीकियों को समझने के लिए, भारत दौरे पर आए। देसी कपास के साथ-साथ, सुरेंद्र नरमा कपास भी उगा रहे हैं। यह प्राकृतिक तौर पर खाकी रंग की होती है। 

उन्होंने बताया, “यहाँ पहले नरमा कपास की खेती होती थी पर, अब यह बड़ी मुश्किल से मिलती है। मुझे भी इसके बीजों की तलाश करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। जब बीजों की तलाश पूरी हुई तो मैंने बहुत ही छोटे स्तर पर इनकी खेती शुरू की। हालांकि, अभी भी हम बीज तैयार करने की स्थिति में ही है। लेकिन, जब फ्रांस से आए उद्यमी ने इस नरमा कपास को देखा तो वह चौंक गए। तब, उन्होंने कहा कि अगर देसी कपास इस तरह के रंगों में मिल जाये तो केमिकल डाई करने की जरूरत ही नहीं होगी। उनकी यह बात, हमें भी अच्छी लगी और इसलिए, अब हम ऐसी फसलें भी उगाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे प्राकृतिक डाई बन सके।”

खाकी रंग की कपास

अपनी सभी तरह की फसलों और प्रोसेसिंग के कारण, आज सुरेंद्र की सालाना कमाई लाखों में है। लेकिन, उनका कहना है कि अब उनकी प्राथमिकता सिर्फ पैसा कमाना नहीं है बल्कि वह लोगों के जीवन स्तर को अच्छा बनाना चाहते हैं। वह पर्यावरण के हित में काम करते हुए, लोगों को अच्छा खाना और कपड़ा उपलब्ध करवाना चाहते हैं। वह कहते हैं, “खेती हमारे लिए कोई धंधा नहीं है बल्कि यह हमारी जीवनशैली है। हमारी लगभग सभी जरूरतें, खेती से पूरी हो रही हैं तो हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि हमारी सालाना कमाई क्या है? हम खुद अच्छे से जी रहे हैं और कुछ हाथों को रोजगार दे रहे हैं, इससे बड़ी कोई कमाई नहीं है।” 

अगर आप सुरेंद्र पाल सिंह से संपर्क करना चाहते हैं तो उनसे 9417763067 पर संपर्क कर सकते हैं। 

संपादन- जी एन झा

तस्वीरें: सुरेंद्र पाल सिंह

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