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Organic Farming

नौकरी छोड़ी, ज़मीन नहीं थी, फिर भी खेती से करते हैं कमाई, जानिये कैसेे

जयपुर, राजस्थान के रहने वाले 25 वर्षीय अनिल थडानी ने कृषि विषय में पढ़ाई की है और उन्होंने अपने घर की छत से नर्सरी का काम शुरू किया, जिसके तहत आज वह 20 से ज्यादा लोगों के घरों में हाइड्रोपोनिक, वर्टिकल और टेरेस गार्डन लगा चुके हैं और लगभग ढाई हजार किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग दे रहे हैं।

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पढाई पूरी हो जाने के बाद, युवाओं को अक्सर कहीं अच्छी नौकरी या सरकारी नौकरी करने की सलाह दी जाती है। राजस्थान में जयपुर के रहने वाले अनिल थडानी ने, जब ‘कृषि’ विषय में अपनी मास्टर्स पूरी की तब उन्हें भी ऐसा ही करने की सलाह दी गई। उन्होंने विवेकानंद ग्लोबल यूनिवर्सिटी में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर, एक साल तक काम किया और फिर नौकरी छोड़कर अपनी नर्सरी, ‘पौधशालम‘ की शुरुआत की। नर्सरी के साथ-साथ, वह दूसरे किसानों को जैविक खेती (Organic Farming) पर परामर्श देने का काम भी कर रहे हैं। 

अनिल ने द बेटर इंडिया को बताया, “हमारा परिवार खेती नहीं करता है लेकिन, मैंने अपनी ग्रैजुएशन और मास्टर्स ‘कृषि’ विषय में ही की है। अपनी पढ़ाई के दौरान मैंने जैविक खेती (Organic Farming) भी की। हमें अपने प्रोजेक्ट और इंटर्नशिप के लिए, खेतों में किसानों के साथ काम करना होता था। इस तरह, मेरा खेती का अनुभव जमीनी स्तर पर अच्छा रहा।” 

पढ़ाई के बाद, साल 2018 में वह अपने शहर जयपुर आ गए और यहाँ यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे। इसके साथ ही, वह खेती का भी काम देखने लगे। अनिल आसपास के गांवों में किसानों से मिलते और उन्हें जैविक खेती के तरीके सिखाते थे। वह बताते हैं, “लगभग एक साल की नौकरी में ही मुझे समझ में आ गया कि मैं जमीनी स्तर पर काम करना चाहता हूँ। मुझे खुद पौधे लगाने तथा मुरझाये हुए पौधों को जैविक तरीकों से बचाने में जो खुशी मिलती है, वह कोई सरकारी नौकरी शायद कभी न दे सके। इसलिए, मैंने नौकरी के साथ-साथ जैविक खेती का भी काम किया।” 

Organic Farming
अनिल थडानी, पौधशालम

लोगों के घरों में लगा रहे हैं गार्डन 

साल 2020 में अनिल ने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपने घर की छत से अपनी नर्सरी का काम शुरू किया और इस काम में उन्होंने लगभग 14,000 रूपये का निवेश किया। वह कहते हैं कि उन्होंने शुरुआत में कुछ पेड़-पौधे और गमले आदि खरीदे और उन्हीं से और अधिक पौधे तैयार करने लगे। लॉकडाउन के कारण उनके काम पर काफी असर पड़ा लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी। उस समय को उन्होंने, कई नई चीजें करने के लिए उपयोग किया। 

वह कहते हैं, “लॉकडाउन के बाद जैस-जैसे मेरा काम बढ़ा तो मैंने अपनी नर्सरी को घर की छत से एक ‘100 गज’ की जगह में शिफ्ट कर लिया। मैं घर पर टेरेस गार्डनिंग भी कर रहा हूँ। मेरी नर्सरी में आज 4,500 पेड़-पौधे हैं। इसके अलावा, मैं शहरी लोगों और किसानों को पेड़-पौधों से जुड़ी अन्य जरुरी चीजें भी उपलब्ध कराता हूँ।” 

Organic Farming
लोगों के यहां लगाए हैं वर्टीकल और हाइड्रोपोनिक गार्डन

उन्होंने बताया, “मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान, जैविक तरीकों से अलग-अलग तरह की खाद, पोषक घोल, पॉटिंग मिक्स बनाना सीखा है। हम अपनी नर्सरी और किसानों के लिए वैज्ञानिक तरीकों से खाद और उर्वरक तैयार करते हैं। हमारा पूरा काम जैविक क्षेत्र में है। नर्सरी के साथ, हम लोगों के घरों में अलग-अलग तरह के गार्डन जैसे- हाइड्रोपोनिक, वर्टिकल, टेरेस गार्डन लगाने की सर्विस भी दे रहे हैं।”  

अनिल अब तक, नौ घरों में हाइड्रोपोनिक सेटअप और 10 से ज्यादा घरों में वर्टिकल और टेरेस गार्डन लगा चुके हैं। वह इनकी देख-रेख के लिए समय-समय पर जाते भी रहते हैं। 

Organic Farming
बनाते हैं जैविक खाद और पोषण

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अनिल कहते हैं कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण उनका काम काफी प्रभावित हुआ है। फिर भी, वह एक साल में तीन लाख रूपये का टर्नओवर लेने में सफल हुए हैं और उन्हें उम्मीद है कि आगे उनका काम बढ़ेगा। 

किसानों को देते हैं ट्रेनिंग

अपनी नर्सरी चलाने के साथ-साथ, अनिल चार अलग-अलग फार्म में लोगों को जैविक खेती (Organic Farming) करने में भी मदद कर रहे हैं। वह किसानों को खेती के नए-नए तरीकों, जैविक खाद, कीट प्रतिरोधक आदि बनाने की ट्रेनिंग देते हैं। अपने स्तर पर लगभग 25 किसानों से जुड़े हुए हैं। जिनकी वह खेती में मदद करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के बारे में अनिल बताते हैं, “सबसे पहले किसानों से मिलकर उनकी समस्या समझी जाती है। वे पहले अपना अनुभव साझा करते हैं, फिर जो मैंने सीखा है, वह जानकारी मैं उनके साथ साझा करता हूँ। इसके बाद, हम खेती का तरीका तय करते हैं। जैसे- कहीं खेत को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर फसलें उगाई जाती हैं तो कहीं लेयर-फार्मिंग करते हैं। सभी फसलें जैविक तरीकों से उगाई जाती हैं।” 

Organic Farming
अलग- अलग तरीकों से करते हैं जैविक खेती

इसके अलावा, वह कृषि क्षेत्र में काम कर रहे जयपुर के एक सामाजिक संगठन, सिकोईडिकोन (Centre For Community Economics and Development Consultants Society) के साथ भी काम कर रहे हैं। इस संगठन के जरिए, वह अलग-अलग समूहों में लगभग 2500 किसानों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। 

जयपुर के खोरा बिसल में रहने वाले एक किसान राम प्रताप मीणा बताते हैं कि पहले उनके दो एकड़ के अमरुद के बगीचे में, काफी ज्यादा तोते आने से फलों की बर्बादी होती थी। लेकिन अब लगभग आठ महीनों से, वह अनिल के मार्गदर्शन में काम कर रहे हैं। अनिल की मदद से, अब उनका बगीचा फलों से भरा रहता है।

अनिल ने उनके बगीचे में फलों को बचाने के लिए अलग-अलग तरीकों का उपयोग किया है जैसे- फलों को कपड़े से ढकना और कुछ जैविक घोल बनाकर छिड़काव करना ताकि पक्षी फलों से दूर रहें।

अंत में, अनिल कहते हैं, “मैं टेरेस गार्डन के माध्यम से, अपने घर में सभी तरह की सब्जियों की आपूर्ति कर लेता हूँ। इसके अलावा, मैं लोगों को जिन खेतों के लिए मैं परामर्श देता हूँ, वहाँ से अनाज, दाल आदि की आपूर्ति हो जाती है। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने मन का काम कर रहा हूँ। साथ ही, घर को शुद्ध भोजन मिल रहा है, वह भी बिना कहीं जमीन खरीदे या किराए पर लिए। इससे मुझे भी फायदा हो रहा है और किसानों को भी मदद मिल रही है।”

यदि आपकी भी रूचि जैविक खेती (Organic Farming) या गार्डनिंग में है तो आप अनिल से 08619008455 पर संपर्क कर सकते हैं। 

संपादन- जी एन झा

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