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नौकरी छोड़, शुरू की जैविक खेती, मसाला गुड़, कैंडी, चाय बनाकर होती है लाखों में कमाई

सांगली, महाराष्ट्र में रहने वाले सचिन येवले और वर्षा येवले ‘कृषिदूत एग्रो फार्म’ ब्रांड के जरिये जैविक गुड़, मसाला गुड़, कैंडी, लॉलीपॉप और चाय बनाकर ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं।

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महाराष्ट्र के सांगली जिले में पडवलवाड़ी (Padvalwadi) गाँव के रहने वाले सचिन तानाजी येवले और उनकी पत्नी वर्षा सचिन येवले, पूरे इलाके में जैविक खेती कर उससे उत्पाद बनाकर मिसाल कायम कर रहे हैं। अपनी ढाई एकड़ जमीन पर वे गन्ने के साथ-साथ कई तरह की दालें, मौसमी सब्जियां, फल और कुछ औषधीय पौधे भी उगा रहे हैं। फल और सब्जियों के अलावा, वे आपने सभी उपज की प्रोसेसिंग करके विभिन्न खाद्य उत्पाद बनाते हैं। गन्ने से यह दंपति जैविक गुड़, मसाला गुड़, गुड़ की शक़्कर, लॉलीपॉप और कैंडी जैसे खाद्य उत्पाद बना रहे हैं। इन खाद्य उत्पादों को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अपने ब्रांड को, ‘कृषिदूत एग्रो फार्म’ के नाम से रजिस्टर कराया हुआ है।  

सचिन और वर्षा, दोनों ने ‘कृषि’ (एग्रीकल्चर) में अपनी पढ़ाई की है। वर्षा ने बीएससी (एग्रीकल्चर) किया है और वहीं सचिन ने ग्रैजुएशन के बाद ‘एग्रीबिजनेस मैनेजमेंट’ में पोस्ट-ग्रैजुएशन डिप्लोमा भी किया हुआ है। अपने सफर के बारे में बात करते हुए सचिन बताते हैं, “पढ़ाई के बाद मैंने एक कंपनी के साथ लगभग चार साल तक काम किया। उस समय मेरी सैलरी 43 हजार रुपये प्रतिमाह थी। लेकिन नौकरी के दौरान मुझे रह-रहकर ख्याल आता था कि खेती की जो तकनीकें मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान सीखीं थीं, उनका प्रयोग कहीं नहीं कर पा रहा हूँ। कंपनी में काम करके, मैं दूसरों को आगे बढ़ा रहा हूँ लेकिन अपने किसानों के लिए कुछ नहीं कर रहा हूँ। इसी सोच के कारण मैंने नौकरी छोड़ कर, खेती करने का फैसला किया।”

सचिन ने साल 2013 में, अपनी ढाई एकड़ पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। उनसे पहले इस जमीन को उनके पिता संभाल रहे थे और उनके यहां रासायनिक खेती हो रही थी। लेकिन सचिन ने अपने परिवार वालों को जैविक खेती करने के लिए राजी किया। उनके इलाके में सबसे ज्यादा गन्ने का उत्पादन होता है। सचिन ने जैविक तरीकों से गन्ना उगाया और इसके साथ-साथ दूसरी फसलें भी उगाई।

वह बताते हैं, “जब मैंने जैविक खेती करना शुरू किया, तो दो-ढाई साल तक बहुत कम उपज हुई। गाँव में लोग काफी मजाक भी बनाते थे कि नया करने के चक्कर में बर्बाद हो रहे हैं। वे कहते थे कि अगर खेती ही करनी थी, तो इतना पढ़ने-लिखने की क्या जरूरत थी। लेकिन मुझे पता था कि जैविक खेती में अच्छी उपज लेने के लिए हमें जमीन को वक़्त देना होगा। इसलिए, मैंने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया। सिर्फ मेहनत करता रहा।”

Farmer Couple
Sachin Yevale and Varsha Yevale with their daughter in farm

सचिन ने जीरो-बजट फार्मिंग के जनक, सुभाष पालेकर की कई वर्कशॉप में हिस्सा लिया। उन्होंने, उनसे जैविक तरीकों से खेती करना और साथ ही, खेती करने के अलग-अलग मॉडल सीखे। लगभग तीन सालों में, वह अपने खेतों से अच्छी और जैविक उपज लेने लगे। लेकिन अपनी उपज को सही दाम में ग्राहकों तक पहुँचाना मुश्किल था। अपनी मेहनत के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा, “हमारा खेत सड़क के किनारे ही है। इसलिए हम अपने फल-सब्जियों की कटाई करने के बाद, बाल्टी में लेकर सड़क पर बैठते थे और इन्हें, आने-जाने वालों को बेचते थे। इसके अलावा, मैंने अपने इलाके के कई बड़े पदों पर नियुक्त लोगों जैसे डॉक्टर, पुलिस अफसर आदि के यहां फल-सब्जियों के थोड़े-थोड़े सैंपल भिजवाये। उनको कहा कि आप लोग इन्हें खा कर देखें और अगर अच्छा लगे तो अधिक फल-सब्जियों के लिए हमें ऑर्डर भी कर सकते हैं। आज ऐसे ही सैकड़ों लोग मुझसे व्हाट्सअप ग्रुप के जरिये जुड़े हुए हैं।”

करते हैं मिश्रित खेती:

सचिन बताते हैं कि जैविक खेती की तकनीकें अपनाने के बाद, उन्होंने अपने खेती के मॉडल पर काम किया। सामान्य खेती के साथ-साथ वह बागवानी भी कर रहे हैं। अपनी जमीन को उन्होंने अलग-अलग हिस्सों में बांटा हुआ है। वह कहते हैं, “जून में हम गन्ना लगाते हैं, गन्ने के साथ मूंगफली, दालें और सब्जियां भी उगाते हैं। इसके अलावा, हमारा एक अमरूद का बाग है। जिसमें, हम अमरूद के पेड़ों के बीच में मूंगफली और सब्जियां उगाते हैं। मौसमी सब्जियों के अलावा, हम मोरिंगा (सहजन), लेमनग्रास (नीबू घास) जैसी फसलें भी लगा रहे हैं।”

Maharashtra Farmers
Organic Farming

वह सभी फसलें जैविक तरीकों से उगाते हैं। मिट्टी तैयार करने के लिए, वह गोबर की खाद और वर्मीकम्पोस्ट का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा, फसलों को पोषण देने के लिए जीवामृत और वेस्ट डीकंपोजर (कचरा अपघटक) बनाते हैं। सचिन कहते हैं, “वेस्ट डीकम्पोजर हम दूसरे किसानों को भी मुफ्त में बांटते हैं। ‘नेशनल सेंटर ऑफ़ ऑर्गेनिक फार्मिंग’, गाजियाबाद में इसकी एक बोतल 20 रुपये में मिलती है। इस 20 रुपये की बोतल से आप 200 लीटर तरल खाद तैयार कर सकते हैं।” वेस्ट डीकम्पोजर से तरल खाद तैयार करना बहुत ही आसान है।  

इसके लिए, आप 20 रुपये की वेस्ट डीकम्पोजर की बोतल लीजिए। इसे 200 लीटर पानी में मिलाइये। अब इसमें दो किलो गुड़ मिलाएं और ढककर रख दें। सात दिनों तक आप इसे किसी लकड़ी की मदद से ‘क्लॉकवाइज’ (घड़ी की सुई की दिशा) और ‘एंटी-क्लॉकवाइज’ (दाँये से बाँये) घुमाते रहें। हफ्ते भर बाद आपकी तरल खाद तैयार हो जाती है। इस तरल खाद को आप पानी के साथ फसलों में दे सकते हैं। इसके अलावा, किसी फुहारे (स्प्रेयर) की मदद से खेत में छिड़काव भी कर सकते हैं। 

Organic Farmers
Making Organic liquid composts

जैविक खाद के अलावा, वह जैविक कीट प्रतिरोधक भी इस्तेमाल करते हैं। फसलों को बीमारी और कीड़ों से बचाने के लिए वह अदरक, लहसुन और हरी मिर्च का पेस्ट बनाकर छिड़काव करते हैं। इसके अलावा, वर्टीसीलियम (verticillium) जैसे जैवकीटकनाशक (बायोपेस्टिसाइड) का इस्तेमाल किया जाता है। 

पत्नी ने दिया साथ:

सचिन अपनी सफलता के लिए अपनी पत्नी वर्षा को बराबर का भागीदार बताते हैं। वह कहते हैं, “पढ़ने-लिखने के बाद कौन शहर की अच्छी नौकरी नहीं करना चाहता है। लेकिन वर्षा ने, मेरे सपने और मेहनत को समझा और कभी मुझसे यह सब छोड़कर शहर में नौकरी करने के लिए नहीं कहा। उसने खुद भी नौकरी की बजाय जैविक खेती को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसके साथ से ही, आज हम खेती के अलावा और भी नई-नई चीजें कर पा रहे हैं।” 

इस बारे में वर्षा कहतीं हैं, “मेरी सोच सिर्फ यही थी कि शहर में प्रदूषण और केमिकल से भरा खाना खाने की बजाय, अच्छा है कि हम खुद अपने लिए जैविक खाना उगाएं। मैंने कृषि में ही पढ़ाई की है और इसलिए मैं जानती हूँ कि आज के समय में शुद्ध और स्वस्थ खाना उगाना और अपने परिवार को खिलाना कितना ज्यादा जरूरी है। साथ ही, मेरा मानना है कि जब हम खुद जैविक खेती करेंगे, तभी दूसरों को भी जैविक खेती करने की प्रेरणा दे सकते हैं।”

Krushidut Agro Farm
Started their own outlet

खड़ा किया अपना ब्रांड:

सचिन और वर्षा ने साथ मिलकर प्रोसेसिंग का कदम उठाया। वे बताते हैं कि जैविक खेती से उनका उत्पादन अच्छा हो रहा था। ऐसे में, उन्होंने अपनी उपज की मार्केटिंग पर ज्यादा ध्यान दिया। इसके लिए, सबसे पहले उन्होंने अपने खेतों के लिए जैविक प्रमाण-पत्र लिया। उन्होंने अपने फार्म को ‘कृषिदूत एग्रो फार्म’ का नाम दिया और इसी ब्रांड नाम के तहत अपनी उपज को बेचने लगे।

वर्षा बतातीं हैं, “सबसे पहले हमने अपने फार्म के नाम से ही, अपने खेतों के पास एक स्टॉल लगाया। यहां से हम खेतों में उगाई हुई ताजा सब्जियां बेचने लगे। इसके बाद, इसी स्टॉल पर हम अपनी दालें भी प्रोसेस और पैक करके रखने लगे। दालों की फसलों को कटाई के बाद, साफ करके और सुखाकर, हाथ की चक्की से हम घर पर तैयार करते हैं। इसके बाद, इन्हें पैक करके स्टॉल पर पहुँचाया जाता है।”

फल-सब्जियां और दालों को ग्राहकों तक पहुँचाना जब आसान हो गया तो इस दंपति ने गन्ने पर काम किया। सचिन कहते हैं, “प्रोसेसिंग यूनिट (प्रसंस्करण इकाई) लगाना मुश्किल था क्योंकि इसके लिए आपको काफी पैसे चाहिये। इसलिए, हमने दूसरे तरीके से काम करने की ठानी। हमने अपने इलाके की एक प्रोसेसिंग यूनिट से बात की और वहां पर अपने गन्ने की प्रोसेसिंग करने लगे।” 

कटाई के बाद 10-15 दिन, वह प्रोसेसिंग यूनिट पर रहकर अपनी सभी उपज को प्रोसेस करके गुड़ बनाते हैं। हालांकि, सामान्य जैविक गुड़ की इतनी ज्यादा मांग नहीं थी। इसलिए, उन्होंने गुड़ के उत्पादों में प्रयोग किया। सबसे पहले उन्होंने सामान्य गुड़ के साथ-साथ, इलायची, सौंफ, अदरक, आदि डालकर मसाला गुड़ बनाया। इसके बाद, उन्होंने इसी मसाला गुड़ की पांच-सात ग्राम की कैंडी बनाई। कैंडी के अलावा, उन्होंने गुड़ से ही 14 ग्राम की लॉलीपॉप भी बनाई। मसाला गुड़, कैंडी और लॉलीपॉप के अलावा वे गुड़ की शक़्कर भी बनाते हैं। 

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Maharashtra Farmer Couple
Their Jaggery Products

सचिन बताते हैं, “हमने बच्चों को ध्यान में रखते हुए, कैंडी और लॉलीपॉप बनाई हैं। खासतौर पर लॉलीपॉप के लिए हमने एक साँचा भी तैयार कराया है। दोनों ही, चीजें शुद्ध और जैविक गुड़ से बनी हैं। इनकी अन्य सामग्रियों जैसे – अदरक, हल्दी, सौंफ आदि भी हम अपने खेतों पर ही उगाते हैं। ये कैंडी और लॉलीपॉप, हर किसी के लिए पोषण प्राप्त करने का एक साधन हैं। पिछले साल, हमारे ये दोनों खाद्य उत्पाद कई ट्रायल्स के बाद बनकर तैयार हुए हैं। फिलहाल, हम अपनी दूकान पर ही इनकी बिक्री कर रहे हैं। लेकिन, अगर कोई बाहर से ऑर्डर देता है तो हम इन्हें भेजने के लिए भी तैयार हैं।”

उनकी ‘गुड़ की शक़्कर’ की भी बाजार में काफी मांग है। फिलहाल वह, ग्राहकों तक सीधा पहुँचने के अलावा, पुणे और पणजी के तीन होटलों में भी शक़्कर की सप्लाई कर रहे हैं। 

खाध्य उत्पादों की पैकेजिंग और मार्केटिंग में मार्गदर्शन के लिए, वह अपने गाँव के रिटायर्ड कस्टम अफसर, मदन पवार को श्रेय देते हैं। मदन पवार को जैविक खेती में काफी दिलचस्पी है। क्योंकि, वह रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को समझते हैं। पिछले कई सालों से, मदन पवार उनसे जुड़े हुए हैं। पवार बताते हैं, “मुझे जब सचिन और वर्षा के बारे में पता चला तो बहुत गर्व हुआ कि हमारे गाँव के युवा शहर में करियर बनाने की बात छोड़कर, जैविक खेती को आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए, मुझे इस क्षेत्र में जो भी ज्ञान है, उससे मैं उनकी मदद करने की कोशिश करता हूँ। आजकल जहां किसान खेती छोड़कर शहरों में बस रहे हैं, वहीं यह युवा दंपति स्वस्थ और शुद्ध खाना उगा रहा है।”

Organic Jaggery Products
Selling their products directly to customers

उनके खाद्य उत्पादों के बारे में पवार कहते हैं, “उनकी फल-सब्ज़ियों से लेकर गुड़-शक़्कर तक, सभी कुछ जैविक है। इतने सालों तक अलग-अलग शहरों में रहकर लगातार रसायन युक्त खाना खाने के बाद, सचिन द्वारा निर्मित शुद्ध और पौष्टिक आहार खाना, सबसे बेहतरीन अनुभव है। उनके यहां से जो एक बार सामान ले जाते हैं, उन्हें फिर से खरीदने के लिए लौटकर वापस जरूर आते हैं। दूसरे किसान जहां बाजार ढूंढते हैं, वहां सचिन के फल-सब्जियों और गुड़ की पहले से ही बुकिंग हो जाती है। इसका सिर्फ एक ही कारण है कि वह पूरी तरह से जैविक खेती कर रहे हैं।”

शुरू किया खास जैविक गुड़ की चाय का स्टॉल:

सचिन ने अपने दादा-दादी की पारंपरिक गुड़ की चाय की रेसिपी में थोड़ा बदलाव करके, एक खास जैविक गुड़ की चाय की रेसिपी तैयार की है। उन्होंने अपनी दुकान के पास ही इसका एक स्टॉल शुरू किया है। इस चाय को बनाने के लिए चायपत्ती, चीनी या दूध की जरूरत नहीं होती है। वह बताते हैं, “मैंने जैविक गुड़ के साथ लेमनग्रास, इलायची, अदरक जैसी जड़ी बूटियां डालकर, एक खास रेसिपी तैयार की है। यह चाय पीने में स्वादिष्ट और साथ ही, स्वास्थ्य के लिए अच्छी है।”

Jaggery Tea
Their Special Jaggery Tea

उनकी यह खास गुड़ की चाय, सांगली में धीरे-धीरे मशहूर हो रही है। वह बताते हैं कि बहुत से ग्राहक उनसे मांग करते हैं कि वे ऐसा कुछ करें जिससे लोगों को अपने घर में भी, इस चाय का आनंद मिल सके। चाय को पैकेज्ड रूप देने के लिए सचिन और वर्षा काम कर रहे हैं। इसके लिए, वे कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं ताकि सभी सामग्रियों को सूखे रूप में पैक करके लोगों तक पहुंचा सकें।  

किसानों को देते हैं मुफ्त ट्रेनिंग:

खुद आगे बढ़ने के साथ-साथ सचिन और वर्षा, दूसरे किसानों को भी जैविक खेती की राह दिखा रहे हैं। ‘एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी’ (ATMA) के सांगली ब्रांच के साथ मिलकर, वह 2000 से ज्यादा किसानों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। ATMA के ब्लॉक टेक्निकल मैनेजर, अमित राम राव बताते हैं, “सचिन और वर्षा, हमारे साथ मिलकर ब्लॉक के किसानों की ट्रेनिंग करते हैं। उनके साथ होने से किसानों को जैविक खेती से जोड़ने में काफी मदद मिल रही है। अगर हम सीधा किसानों से संपर्क करें तो उनके बहुत-से सवाल होते हैं। किसान सबसे पहले फायदे और  नुकसान की बात करते हैं। लेकिन सचिन और वर्षा का एक अच्छा उदहारण संगठन के पास है। उनकी मदद से, संगठन बहुत से किसानों को जैविक खेती से जोड़ने में कामयाब रहा है।” 

किसानों को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ वह मार्केटिंग में भी उनकी मदद करते हैं। अगर कोई किसान प्रोसेसिंग करके अपने खाद्य उत्पाद बना रहा है तो वे उनके उत्पाद अपने स्टॉल पर रखते हैं। अगर कोई किसान सीधा उन्हें अपनी जैविक उपज बेचना चाहता है तो वह उनसे उपज लेकर, इसकी प्रोसेसिंग करते हैं। किसानों को खेतों के लिए जैविक खाद और तरल पोषण पदार्थ बनाने में भी वे मदद करते हैं। अपनी जैविक खेती और प्रोसेसिंग के जरिये वे गाँव की महिलाओं को रोजगार भी उपलब्ध करवा रहे हैं।

Farmer Couple
Won awards and Giving Training to Farmers

सचिन और वर्षा को कृषि क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए बहुत से सम्मानों से भी नवाजा गया है। जिनमें, 2018 में ‘इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर’ (ICCOA) द्वारा दिया गया ‘बेस्ट ऑर्गेनिक फार्मर’ (दूसरा स्थान), 2019 में जलगांव में मिला ‘कृषि सेवक सम्मान’ और मुंबई में हुए  ‘ऑर्गेनिक इंडिया फ़ूड कॉन्क्लेव-2019’ में मिला ‘OFIC 2019 ऑर्गेनिक फार्मर ऑफ़ द ईयर’ जैसे अवॉर्ड शामिल हैं। 

अगर आप सचिन और वर्षा से संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें 8888158553 और 9096538949 पर कॉल कर सकते हैं। 

संपादन – प्रीति महावर

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