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14 जुलाई 1930: जब टैगोर से मिले आइंस्टीन!

“हम भारतीयों के कर्ज़दार हैं, जिन्होंने हमें गिनती करना सिखाया। जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती थी। ” – अल्बर्ट आइंस्टीन

सालों से, उनकी अविस्मरणीय छवि- कड़ी मूंछे, पैनी आँखें और घुंघराले व भारी बाल- जैसे वह सभी पोस्टरों और टी-शर्ट में से निकलकर हमे ताक रहा हो। यह कोई आश्चर्य नहीं कि अल्बर्ट आइंस्टीन को अभी भी दुनिया का प्रतिभावान पागल, और विज्ञान का पहला प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता है और यक़ीनन आज भी वे महान हैं।

आइंस्टीन की एक प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में यात्रा शुरू हुई; जब उन्होंने खोज की कि द्रव्यमान और ऊर्जा एक ही चीज़ के विभिन्न रूप हैं और इसे एक सटीक छोटे से सूत्र E=mc2 में व्यक्त किया। बाद में यह पता चला कि उनके लिए “जीवन की सबसे बड़ी संतुष्टि” – सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत था जो साबित करता है कि ऊर्जा और द्रव्यमान अंतरिक्ष व समय को विकृत करते हैं। इन्हीं प्रतिष्ठित विचारों ने उन्हें सार्वजनिक प्रसिद्धि दिलाई थी।

कुछ भारतीयों को पता है कि इतिहास में यह युग भारतीय विज्ञान के ‘स्वर्ण युग’ के रूप में अंकित है। जब आइंस्टीन गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों को साबित कर रहे थे; तब सर सीवी रमन को ‘स्कैटरिंग ऑफ़ लाइट’ पर उनके काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। साथ ही मेघनाद साहा ‘तारकीय विकिरण’ पर उनके काम के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा प्राप्त कर रहे थे।

हालाँकि इन दोनों ने ही सीधा आइंस्टीन के साथ काम नहीं किया, लेकिन एक व्यक्ति था जो उन तक पहुंचने में कामयाब रहा। कलकत्ता विश्वविद्यालय में साहा के एक सहपाठी, सत्येंद्रनाथ बोस ने डक्का विश्वविद्यालय (अब ढाका) के भौतिकी विभाग में काम किया।

साल 1926 में इस प्रतिभाशाली भौतिक विज्ञानी ने आइंस्टीन को एक पेपर भेजा। इस पेपर में उन्होंने सामान्य कण जो कि बल के प्राकृतिक वाहक (जैसे फोटॉन को पहली बार आइंस्टीन द्वारा प्रकाश के वाहक के रूप में जाना गया) हैं, इसको समझने के लिए एक सांख्यिकी मॉडल पर अपने विचार व्यक्त किये।

सत्येंद्रनाथ बोस

इस पेपर को ‘प्लैंकस लॉ एंड द हाइपोथिसिस ऑफ लाइट क्वांटा’ कहा जाता था। इस पेपर से प्रभावित होकर आइंस्टीन ने पेपर को जर्मन फिजिक्स जर्नल में प्रकाशित किया। उन्होंने बोस को अपने साथ काम करने के लिए बर्लिन बुलाया। उन्होंने साथ में एक बहुत महत्वपूर्ण खोज पर काम किया।  यही कारण है कि प्रकृति के सबसे छोटे वाहक कणों को बाद में ‘बोसोन्स’ नाम दिया गया था (2012 में पाए गए प्रसिद्ध हिग्स बोसोन समेत)।

आइंस्टीन की लिखित सिफारिश पर, युवा भारतीय सत्येंद्रनाथ बोस को विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के प्रमुख नियुक्त किया गया था।  उन्होंने सांख्यिकीय मैकेनिक्स, विद्युत चुम्बकीय, एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी, क्वांटम यांत्रिकी, थर्मो-लुमेनसेंस, और एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

दिलचस्प बात यह है कि, अपने संस्मरण में सुब्रमण्यम चंद्रशेखर (जिन्होंने सितारों के विकास पर उनके काम के लिए नोबेल पुरस्कार जीता) ने लिखा कि 1919 में भारत में साहा और बोस द्वारा आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत का रिकार्डेड अनुवाद किया गया। तब तक इस सिद्धांत की पुष्टि भी नहीं हुई थी।

भारत के साथ आइंस्टीन की बातचीत केवल वैज्ञानिकों तक ही सीमित नहीं थी। वह अक्सर उपनिवेशवाद, अहिंसा, सत्याग्रह और औद्योगिकीकरण जैसे मुद्दों पर गांधी और नेहरू के साथ पोस्टकार्ड के माध्यम से विचार-विमर्श किया करते थे।

हालाँकि, उनका सबसे अधिक जुड़ाव रबीन्द्रनाथ टैगोर के साथ था। दोनो नोबेल पुरुस्कार विजेताओं के मन में एक दूसरे के विचारों के प्रति गहन सम्मान था। वास्तव में, आइंस्टीन ने टैगोर को ‘रब्बी’ (शिक्षक के लिए इस्तेमाल होने वाला हेब्रू भाषा का शब्द) के रूप में भी संबोधित किया।

यही कारण है कि 14 जुलाई 1930 को आइंस्टीन के बर्लिन निवास में उनकी बैठक के दौरान हुई बातचीत को, इतिहास में “सबसे उत्तेजक और बौद्धिक रूप से उत्साही चर्चाओं” में से एक के रूप में वर्णित किया गया है।

फोटो स्त्रोत

यहां विचारों के इस ऐतिहासिक आदान-प्रदान से एक अंश दिया गया है (मोड्रन रिव्यु के जनवरी 1931 के अंक में प्रकाशित),

टैगोर: आप गणितज्ञों के साथ दो प्राचीन इकाई, समय और अंतरिक्ष की खोज में व्यस्त हैं। जबकि मैं देश में मनुष्य की वास्तविक दुनिया कर ब्रह्माण्ड की यथार्थता पर भाषण दे रहा हूँ।

आइंस्टीन: क्या आप दुनिया से अलग दिव्य में विश्वास करते हैं?

टैगोर: अलग नहीं है। मनुष्य का अनंत व्यक्तित्व ब्रह्मांड को समझता है। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जिसे मानव व्यक्तित्व द्वारा कम नहीं किया जा सके, और यह साबित करता है कि ब्रह्मांड की सत्य मानव सत्य है।

आइंस्टीन: ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं – दुनिया एकता के रूप में मानवता पर निर्भर है, और दुनिया यथार्थ रूप में मानव कारकों से स्वतंत्र है।

टैगोर: जब हमारा ब्रह्मांड मनुष्यों के साथ सामंजस्य में होता है, तो हम इसे सत्य के रूप में जानते हैं, हम इसके सौंदर्य को महसूस करते हैं।

आइंस्टीन: यह ब्रह्मांड की पूरी तरह से एक मानव अवधारणा है।

टैगोर: दुनिया एक मानव संसार है – इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी वैज्ञानिक व्यक्ति का है। इसलिए, हमारे अलावा कोई और दुनिया मौजूद नहीं है; यह एक सापेक्ष दुनिया है, जो अपनी वास्तविकता के लिए हमारी चेतना पर आधारित है। कारणों और आनंद के कुछ मानक है जो इसे सत्य बनाते हैं। शाश्वत व्यक्ति के मानक जिसके अनुभव हमारे अनुभवों के माध्यम से संभव होते हैं।

आइंस्टीन: यह मानव इकाई की अनुभूति है।

टैगोर: हाँ, एक शाश्वत इकाई। हमें अपनी भावनाओं और गतिविधियों के माध्यम से इसका एहसास करना होगा। हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं में सर्वोच्च इंसान की अनुभूति करते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है। विज्ञान उस से संबंधित है जो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है; यह सत्य की व्यक्तित्वहीन मानव दुनिया है। धर्म इस सत्य को महसूस करता है और उन्हें हमारी गहरी जरूरतों के साथ जोड़ता है। इससे सत्य की हमारी व्यक्तिगत चेतना सार्वभौमिक महत्व प्राप्त करती है। धर्म सत्य को मूल्य देता है, और हम इसके साथ सद्भाव के माध्यम से सत्य को अच्छे रूप में जानते हैं।

आइंस्टीन: मैं साबित नहीं कर सकता, लेकिन मैं पाइथागोरियन में विश्वास करता हूँ जो कहता है कि सत्य मनुष्यों से स्वतंत्र है। यही निरंतरता के तर्क की समस्या है।

टैगोर: सत्य, जो सार्वभौमिक है, अनिवार्य रूप से मानवीय होना चाहिए; अन्यथा, जो भी हम व्यक्तियों को सत्य के रूप में महसूस होता है, कभी भी सत्य नहीं कहा जा सकता है। कम से कम, वह सच्चाई जिसे वैज्ञानिक रूप में वर्णित किया गया है और जिसे केवल तर्क की प्रक्रिया के माध्यम से जाना जा सकता है- दूसरे शब्दों में, मानव के विचारों द्वारा।

उन दोनों की यह बातचीत जल्दी ही मीडिया में सनसनी बन गयी थी। कई प्रकाशनों के पास इसकी रिकॉर्डिंग भी थी।

द न्यूयॉर्क टाइम्स ने “आइंस्टीन और टैगोर प्लंब द ट्रुथ” शीर्षक के साथ एक लेख लिखा और “मैनहट्टन में एक गणितज्ञ और एक रहस्यवादी की मुलाकात” कैप्शन लिखकर एक यादगार तस्वीर (उनकी न्यूयॉर्क बैठक की) के साथ छापा।

साल 1930 में आइंस्टीन व टैगोर/ट्विटर

आइंस्टीन और टैगोर और दो बार मिले और पत्रों के माध्यम से संपर्क में रहे। हालांकि यह भारत के साथ उनका सीमित संबंध था, लेकिन उनके विचारों ने अनगिनत भारतीयों को प्रेरित किया है। वास्तव में, भारत के कई वैज्ञानिक अभी भी समय, अंतरिक्ष और गुरुत्वाकर्षण के बारे में आइंस्टीन के विचारों से गहराई से जुड़े हुए हैं।

आइंस्टीन का त्रावणकोर विश्वविद्यालय (अब केरल विश्वविद्यालय) के इतिहास से भी थोड़ा सा रिश्ता है।

भारत से स्वतंत्र होने से एक दशक पहले, 1937 में, एक छोटी सी रियासत त्रावणकोर ने आइंस्टीन को अपने शुरुआती विश्वविद्यालय के पहले कुलगुरू के रूप में  6,000 रूपये (तब काफी बड़ी राशि) के मासिक वेतन के साथ आमंत्रित किया था। यह त्रावणकोर के तत्कालीन दीवान सी पी रामस्वामी अय्यर का विचार था। वह एक चतुर प्रशासक और उत्साही विद्वान थे; जो आधुनिक विज्ञान में समकालीन विकास के लिए बराबर भागीदार थे।

हालांकि, आइंस्टीन ने विनम्रतापूर्वक प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा कि वह अमेरिका में प्रिंसटन विश्वविद्यालय में शामिल होना चाहते हैं। हालांकि रामास्वामी के निमंत्रण का कोई प्रत्यक्ष रिकॉर्ड नहीं है; लेकिन कुछ विशिष्ट व्यक्ति इसका दावा करते हैं।

मूल लेख: संचारी पाल


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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