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कारगिल का शेरशाह: कहानी भारतीय सेना के बहादुर जवान, कप्तान विक्रम बत्रा की!

26 जुलाई, 1999 को, भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल में एक निर्णायक युद्ध जीता। इस लड़ाई में, कई बहादुर युवा सैनिकों ने कारगिल के युद्धक्षेत्र पर अपने देश की रक्षा करने के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया था।

युद्ध को हुए अठारह साल से भी अधिक समय बीत गया, लेकिन आज भी कारगिल की लड़ाई में सैनिकों का बलिदान देश और देशवासियों की स्मृतियों में है। इन सभी बलिदानियों में एक ऐसा सैनिक भी था जो कारगिल में पुरे जज्बे से लड़ने वाले और अपने देश के लिए शहीद होने वाले हर एक युवा सैनिक का चेहरा बन गया।

ये कहानी है परमवीर चक्र विक्रम बत्रा की। वह अविश्वसनीय साहसी सैनिक, जिसने कारगिल के युद्धक्षेत्र पर वह कर दिखाया कि आने वाली हर पीढ़ी उसे याद रखेगी।

9 सितम्बर, 1974 को जन्में विक्रम का बचपन हिमाचल प्रदेश में पालमपुर की खूबसूरत वादियों में बीता। अपने जुड़वां भाई विशाल से 14 मिनट बड़े विक्रम अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। उनके पिता, गिरधारी लाल बत्रा एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल थे। उनकी माता कमल कांता बत्रा एक स्कूल टीचर थीं।

अपने सहपाठियों और शिक्षकों के बीच विक्रम खूब मशहूर थे। पढ़ाई में अच्छे होने के साथ-साथ वे खेलों में भी अच्छे थे। इसके अलावा स्कूल में होने वाली अनेकों गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। उत्तर भारत से सबसे अच्छा एनसीसी कैडेट होने के साथ-साथ विक्रम कराटे में ग्रीन बेल्ट होल्डर थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस भी खेला।

फोटो स्त्रोत

बचपन से देशभक्ति से भरे विक्रम हमेशा से भारतीय सेना में भर्ती होना चाहते थे। उनके परिवार के लिए यह कुछ नया नहीं था, जब उन्होंने साल 1995 में अपनी ग्रेजुएशन की पढाई के बाद संयुक्त रक्षा सेवाओं (सीडीएस) की परीक्षा के लिए तैयारी करने का फैसला किया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्हें होंगकोंग की एक फर्म द्वारा मर्चेंट नेवी के लिए चुना गया था। लेकिन उन्होंने अपना मन बदल लिया और अपनी माँ से कहा,

“पैसा जीवन में सबकुछ नहीं है। मुझे अपने देश के लिए कुछ अलग. कुछ बड़ा करना है।”

लेकिन एक दशक बाद उनके एक बेहतरीन नौकरी छोड़ देश की सेवा करने के फैसले ने उन्हें इंडियन आयल प्रिंट अभियान में श्रद्धांजलि दिलवाई।

आईओसी के उस विज्ञापन में, कप्तान बत्रा की एक ब्लैक एंड वाइट फोटो के साथ लिखा था, “कभी-कभी एक साधारण भारतीय 120,000 करोड़ रुपये की कंपनी को विनम्र महसूस करा सकता है। हम जो भी कदम उठाते हैं, उसके लिए एक प्रेरणादायक भारतीय तरीका हो सकता है।”

फोटो: विक्रम बत्रा

साल 1996 में वे सीडीएस की परीक्षा पास कर भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल हो गए जहां उन्हें लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया। उनकी पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के बारामुल्ला जिले में सपोरे शहर में थी।

जब कारगिल का युद्ध शुरू हुआ, तब विक्रम ने बेलगांव में अपना कमांडो कोर्स पूरा किया था। वे होली की छुट्टियां मनाने अपने घर पालमपुर आये थे। उस बार भी वे हर बार की तरह अपने दोस्तों के साथ कॉफी पीने के लिए न्युगल कैफ़े (नदी के किनारे एक खान-पान की जगह) गए।

“युद्ध शुरू हो चूका है। क्या पता तुम्हें कब बुला लिया जाये। इसलिए अपना ध्यान रखना।”

“चिंता मत करो। या तो मैं जीत के बाद तिरंगा लहरा कर आऊंगा या फिर उसी तिरंगें में लिपटकर आऊंगा। लेकिन आऊंगा जरूर,” विक्रम ने अपने चिंतित दोस्त को जबाब दिया।

जल्द ही विक्रम की यूनिट को कारगिल आने का आदेश मिला और 1 जून 1999 को उन्होंने ड्यूटी पर रिपोर्ट किया। अठारह दिन बाद 19 जून 1999 को उन्हें इस युद्ध की अपनी सबसे बड़ी लड़ाई में पॉइंट 5140 को फिर से हासिल करने के आदेश मिले।

दुश्मन को ऊंचाई पर होने का फायदा था। लेकिन फिर भी विक्रम और उनके साथियों ने बहुत ही शानदार ढंग से उनकी पोस्ट को ध्वस्त कर दिया। कई दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स ने निर्णायक जीत हासिल की। इसके चलते युद्ध में भारत की स्थिति बहुत मजबूत हो गयी थी। (यह टाइगर हिल के गिरने का कारण भी बना और भारत युद्ध जीत गया)

इस मिशन के दौरान विक्रम और उनके सभी साथी सुरक्षित थे। इस बात से खुश विक्रम ने अपने कमांडर से पेप्सी का मशहूर स्लोगन कहा, ‘ये दिल मांगें मोर’- यह कहकर उन्होंने अपनी बहुत कुछ कर दिखने की इच्छा जताई थी। इसके अलावा अपने दोस्तों के साथ हँसते हुए और हाथ में पाकिस्तानी सैनिकों से छीनी हुई एक एंटी-एयरक्राफ्ट बन्दुक के साथ उनकी तस्वीर टेलीविज़न पर छा गयी थी। यह पहला युद्ध था जिसे टीवी पर दिखाया गया था।

फोटो स्त्रोत

विक्रम के पिता 20 जून को एक फ़ोन कॉल पर हुई बात को आजतक नहीं भूले हैं। सैटेलाइट फ़ोन पर नेटवर्क के चलते उन्हें कुछ वक़्त लगा अपने बेटे के अस्पष्ट शब्दों को समझने में,

“डैडी, मैंने दुश्मन की पोस्ट पर कब्ज़ा कर लिया है। मैं ठीक हूँ, मैं ठीक हूँ।”

“बेटा मुझे तुम पर गर्व है। भगवान तुम्हारे अगले काम के लिए भी तुम पर आशीर्वाद बनाये रखे,” अपने बेटे की बहादुरी से खुश व आश्वस्त पिता ने उत्तर दिया।

नौ दिन बाद, विक्रम ने एक और महत्वपूर्ण ऑपरेशन के लिए जाने से पहले बेस कैंप से फ़ोन किया। उन्होंने अपने माता-पिता से कहा, “एकदम फिट हूँ, फ़िक्र मत करना।” ये आखिरी बार था जब उनकी बात हुई।

विक्रम का अगला ऑपरेशन कारगिल के दौरान किए गए सबसे कठिन अभियानों में से एक था – 17000 फीट ऊंचे प्वाइंट 4875 का कब्जा। इस चोटी की बर्फीली ढलान 80 डिग्री पर खड़ी थी (अत्यधिक धुंध ने हालात और खराब कर दिए थे) और पाकिस्तानी सैनिकों ने स्वयं को 16000 फीट की ऊंचाई पर तैनात किया था।

फोटो: विक्रम बत्रा के जुड़वां भाई विशाल द्वारा सहेज कर रखा गया उनका खत

7 जुलाई की रात को विक्रम और उनके साथियों ने चढ़ाई पर आगे बढ़ना शुरू किया। 16000 फ़ीट की ऊंचाई पर भारतीय सेना पहले ही पाकिस्तानी सैनिकों से लड़ रही थी। दुश्मनों को पता चला गया था कि शेरशाह आ गया है। शेरशाह विक्रम का कोड नाम था। इसलिए पाकिस्तानी सेना ने अपने हमले और भी तीव्र कर दिए थे। वे भलीभांति जानते थे कि शेरशाह कौन है। तब तक दोनों देशों की सेनाएं युवा विक्रम के युद्ध में हौसलें और बहादुरी से परिचित थीं।

विक्रम ने भी अपने दोस्त और साथी अधिकारी अनुज नय्यर के साथ मिलकर उतनी ही तीव्रता से हमला किया। दुश्मन के बंकरों को ध्वस्त करते हुए और अपनी सेना को आगे बढ़ाते हुए, दोनों नौजवान सैनिकों ने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

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मिशन लगभग खत्म हो गया था। तभी विक्रम का एक जूनियर अधिकारी विस्फोट में घायल हो गया। उसे बचाने के लिए विक्रम अपने बंकर से बाहर जाने लगे तो उनके सूबेदार ने उन्हें रोका। और खुस बाहर जाने का आग्रह किया। जिस पर विक्रम ने उसे कहा, “तू बाल-बच्चेदार है, हठ जा पीछे।”

भयानक आग के बीच भी उन्होंने दुश्मन की पोस्ट पर एक बम फेंका और उनके पांच सैनिकों को मार गिराया। अपने साथी के पास पहुंचने पर वे उसे अपने बंकरों की तरफ खींच रहे थे कि तभी एक गोली उनके सीने में लगी।

अपने मिशन को पूरा करने के बाद विक्रम शहीद हो गए। लेकिन आज भी उनका नाम देशभर में गूंजता है। युद्ध में उनके साथी लेफ्टिनेंट अनुज नय्यर की भी दुश्मन बंकरों का सफाया करते वक़्त मृत्यु हो गयी थी। सुबह तक, भारत ने पीक 4875 (जिसे अब विक्रम बत्रा टॉप कहा जाता है) को पुनः प्राप्त कर लिया था, लेकिन देश ने अपने दो बेटों को खो दिया था।

विक्रम के अंतिम संस्कार में, उनकी मां ने कहा, “शायद यही कारण था कि भगवान ने मुझे जुड़वा बच्चे दिये। एक देश के लिए और एक मेरे लिए।”

विक्रम बत्रा के पिता जी. एल बत्रा कारगिल युद्ध की 10वीं सालगिरह पर सम्मान प्राप्त करते हुए

आज उनके बेटे की मूर्ति पालमपुर टाउन स्क्वायर पर सोमनाथ शर्मा की मूर्ति के साथ लगी हुई है। सोमनाथ शर्मा भी पालमपुर से थे और वे भारत के पहले परम वीर चक्र विजेता थे।

भारत-पाक 1947 के युद्ध में अपनी जान देने से पहले मेजर शर्मा ने कहा था, “दुश्मन हमसेकेवल 50 गज की दूरी पर है। हमारे संख्या बहुत कम है। लेकिन फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी साँस तक लडूंगा।”

मेजर शर्मा की इस भव्य विरासत के लिए विक्रम से बेहतर उत्तराधिकारी नहीं हो सकता था। जो पुरे देश के युवाओं के लिए एक आदर्श बन गया।

कारगिल युद्ध के दौरान अपने अविश्वसनीय सहस के लिए विक्रम बत्रा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सम्मान परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। कप्तान अनुज नय्यर को देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान महा वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा पर जल्द ही बायोपिक फिल्म बनेंगी। खबरे हैं कि इस फिल्म में विक्रम का किरदार अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा निभाएंगे। अब फिल्म कब रिलीज़ होगी, इसके लिए इंतजार करना होगा। पर हमें उम्मीद है कि इस फिल्म के जरिये शहीद विक्रम बत्रा की कहानी को हर घर तक पहुंचाया जायेगा।


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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