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भारतीय शास्त्रीय संगीत की विरासत को सहेज रहे हैं ये आठ विदेशी कलाकार!

भारतीय शास्त्रीय संगीत पुरे विश्व में प्रसिद्द है। न केवल भारतीय बल्कि और भी देशों के लोग हमारे यहां के संगीत को सुनना पसंद करते हैं। सिर्फ सुनना ही क्यों, आज हम ऐसे विदेशी कलाकारों के बारे में बात करेंगें जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में अपनी पहचान बनाई है।

जी हाँ, ऐसे कुछ लोग, जो भले ही भारत से बहुत दूर जन्में हैं पर उन्होंने हमारे संस्कृति को अपने दिल में बसाया। इन लोगों का शास्त्रीय संगीत के लिए प्यार कोई शौकिया अफसाना नहीं बल्कि पूरी मेहनत और लगन से हासिल की गयी महारत है।

आज, विदेशी मूल के ये भारतीय शास्त्रीय संगीतकार देश की संगीत विरासत को समृद्ध करने में एक अद्वितीय भूमिका निभा रहे हैं। आठ ऐसे विदेशी कलाकार, जिन्होंने दिखाया, कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुन्दरता और समृद्धि की कोई सीमा नहीं।

चोंग शिउ सेन (कर्नाटिक शास्त्रीय संगीत)

फोटो: यूट्यूब

मलेशिया में पैदा हुए चीनी चोंग शिउ कर्नाटिक गायक हैं। उन्होंने संस्कृति, संगीत और भाषा, सभी को पार कर अपनी पहचान बनाई है। उनकी शास्त्रीय संगीत से दोस्ती भजनों के कारण हुई। उन्होंने संस्कृत छंदों को सुनना और गाना शुरू किया। सेन ने मलेशिया में अपने गुरु को कर्नाटिक संगीत सीखने के लिए बहुत मुश्किलों से मनाया।

फिर वे आ पहुंचे चेन्नई। वहां उन्होंने स्वर्गीय कल्लपन स्वामीनाथन से कुछ दिन वीणा सीखा। फिर उन्होंने महसूस किया कि उनका दिल गायकी में बसता है। कर्नाटिक संगीत के लिए उनका प्यार देखकर महान डी. के. पट्टाम्मल ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया।

इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी आवाज़ में गहराई, स्पष्टता, और संगीत की शुद्धता को सुनकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

स्टीव गोर्न (बांसुरी वादक)

फोटो: यूट्यूब

एक बांसूरी और सेक्सोफोन वादक स्टीव, गैमी पुरुस्कार से सम्मानित, पूरी दुनिया में अपनी उम्दा और सबसे अलग संगीत शैली के लिए जाने जाते हैं। बहुत से भारतीय संगीतज्ञ और समीक्षकों द्वारा माना जाता है कि स्टीव उन विदेशी कलाकारों में से एक हैं, जिनकी भारतीय संगीत पर बहुत गहरी पकड़ है। स्टीव ने  थियेटर, नृत्य और टेलीविजन के लिए  भी काम किया है।

कोलकाता के उस्ताद स्वर्गीय श्री गौर गोस्वामी के शिष्य स्टीव ने  प्रदर्शन और रिकॉर्डिंग्स के साथ उनकी परम्परा को जारी रखा। ल्युमिनॉस राग (1994) सहित अनेकों सोलो अलबमों के साथ-साथ, उन्होंने विश्वभर के जैज़ संगीतकारों के साथ भी काम किया है।

जॉन हिग्गिंस (कर्नाटिक संगीत)

फोटो: विकिपीडिया

विदेशियों की कर्नाटिक संगीत में रूचि ब्रिटिश राज में शुरू हुई। इनमे से ज्यादातर विदेशियों ने इस कला को सिर्फ पढ़ा पर बहुत कम कलाकार बने। जॉन हिग्गिंस ने न केवल कला को पढ़ा बल्कि गायकी भी की। अमेरिका से ताल्लुक रखने वाले हिग्गिंस ने मशहूर टी. विश्वनाथन और उनके भाई टी.रंगनाथम की देख-रेख में कर्नाटिक संगीत सीखा। उन्होंने महान बालासरस्वती से भी शिक्षा ग्रहण की।

हिंगगिनस की गायकी सुनकर लोगों का दिल मोह जाता है और कोई नहीं कह सकता कि वे भारतीय नहीं हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन संगीत को दे दिया और आज लोग उनका संगीत सुनकर आश्चर्य से भर जाते हैं। भारत में उन्हें हिग्गिंस भगतवतार के नाम से भी जाना जाता है।

सास्किया राव-डी हास (इंडियन सेलो)

फोटो: इंडिया टुडे

नीदरलैंड्स में जन्मी सस्किया जब भारत आयीं तो उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उनकी ज़िन्दगी एकदम बदलने वाली है। सालों पहले वे गुरु हरी प्रसाद चौरसिया से संगीत सीखने आयी थीं। पर भारत आकर वे भारत की ही होकर रह गयी।

जी हाँ, सस्किया वो शख्सियत हैं जिन्होंने भारतीय सेलो को शक्ल दी। दरअसल, सस्किया को बहुत अजीब लगता था जब वे अपने बड़े सेलो के सतह कुर्सी पर बैठती और उनके गुरु जमीन पर क्योंकि उस बड़े सेलो को जमीन पर रखकर बैठना मुश्किल था।

उन्होंने हॉलैंड में अपने एक दोस्त जो कि साज बनाते हैं, उनसे दरख्वास्त की और सेलो का भारतीय रूप बनवाया। यह असली सेलो से थोड़ा छोटा था। सास्किया राव-डी हास और उनके पति (सितार वादक शुभेंद्र राव) ने भारतीय संगीत फाउंडेशन भी शुरू किया है जिसके तहत वे गायन, बांसुरी, भारतीय सेलो और अन्य उपकरणों में बच्चों को प्रशिक्षित करते हैं।

केन जुकेरमन (सरोद)

फोटो: यूट्यूब

केन ने अपनी शुरुआत केवल भारतीय संगीत को जानने की इच्छा रखने वाले एक जिज्ञासु के रूप में की थी। पर किसे पता था कि उनका यही जिज्ञासा भरा सफर उन्हें भारतीय सरोद पर महारथ हासिल करा देगा। जी हाँ, महान अली अकबर खान जैसे उस्ताद के अनुशासन में 37 साल सीखने के बाद आज वे मशहूर कलाकार हैं।

भारत के महान तबला वादकों के साथ काम करने के अलावा बहुत से सांस्कृतिक क्रॉसओवर प्रोजेक्ट पर भी काम किया है। हाल ही में उन्होंने पारम्परिक भारतीय साज़ों की अभिनव तरीके से विकास की तरफ पहल की है।

शंकर टकर (शहनाई)

फोटो: यूट्यूब

मैसाचुसेट्स में पैदा हुए शंकर टकर को शंकर नाम आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी से मिला, जब वे केवल तीसरी कक्षा में थे। यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनका संगीत की तरफ रुझान बढ़ा और फिर गुरु हरिप्रसाद चौरसिया से सीखने के लिए उन्हें स्कॉलरशिप पर भारत आने का मौका मिला।

शहनाई सीखना उनके लिए आसान नहीं था क्योंकि भारतीय संगीत के लिए शहनाई को पहले ही अनुपयुक्त माना जाता है। पर उन्होंने हार नहीं मानी और जल्द ही उनकी मेहनत रंग लाने लगी। आज वे फ्यूज़न शैली पर काम कर भारतीय शहनाई को अलग पहचान दे रहे है। उनका संगीत उनके यूट्यूब चैनल ‘द श्रुतिबॉक्स’ पर सुना जा सकता है।

गियांनी रिचचिज़ी (विचित्र वीणा और सितार)

फोटो: musicaindiana.it

इटली में जन्में गियांनी उन लोगों में हैं जो आज भी पौराणिक विचित्र वीणा बजाते हैं। उन्होंने भारतीय संगीत और सितार में अपनी मास्टर डिग्री बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से प्राप्त की। यहीं पर उनकी रूचि विचित्र वीणा के लिए जन्मीं।पर विचित्र वीं को बजाने वाले बहुत ही कम कलाकार हैं देश में। उनके गुरु ज़िआ मोहिउद्दीन डागर की मृत्यु के बाद अब गीयांनी इसके मशहूर वादक हैं।

इटली में भारतीय संगीत का केवल एक केंद्र है सरस्वती हाउस। सरस्वती हाउस सालों से शास्त्रीय संगीत का आयोजन करता आ रहा है। वर्तमान में गियांनी भारतीय संगीत और संस्कृति के कई पहलुओं पर काम करने वाले एकेडमी ऑफ म्यूजिक ऑफ विसेंज़ा में तहत सितार और विचित्र वीना सिखाते हैं।

सेतसुओ मियाशिता (संतूर)

फोटो: yogasatsang.jp

जापान के मियाशिता अपने होटल का कारोबार छोड़ महान गुरु शिवकुमार शर्मा से संतूर सीखने आये थे। साल 2006 में डीएनए को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया,

“साल 1987 में मैने एक जापानी टीवी चैनल पर शिवजी (शिवकुमार शर्मा) को सुना। उनका वह दिव्य संगीत केवल छह मिनट का था पर इसने मेरा जीवन बदल दिया। मुझे पता था मुझे क्या करना है। जब मैं सालों बाद मुंबई आया तो उनसे मिला। मैं गिटारिस्ट था पर संतूर बहुत अलग साज है। गिटार में जहां 6 स्ट्रिंग होती  संतूर में 100 होती है।”

आज, मियाशिता जापान में मशहूर भारतीय शास्त्रीय संगीत कलाकारों में से एक है। इसके साथ ही वे अन्य लोगों को भी सिखाते हैं। सौंदर्य, उपचार, शांति और सद्भाव के लिए उनका संगीत प्रसिद्ध है।


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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