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पाँच महिलाएं जिन्होंने उस उम्र में शुरू किया अपना बिज़नेस, जब आप रिटायर होने की सोचते हैं

पाँच महिलाएं जिन्होंने उस उम्र में शुरू किया अपना बिज़नेस, जब आप रिटायर होने की सोचते हैं

जानिए कैसे इन पाँच महिलाओं ने ढलती उम्र में संभाली अपने बिज़नेस की डोर।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इसके नाते हमें अपने जीवन के विविध क्षेत्रों में कई प्रकार की क्रियाओं को संपादित करना पड़ता है, इसमें सबसे ख़ास है – हमारी आर्थिक गतिविधियाँ। यह एक ऐसा पहलू है जो मानव जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री अल्फ्रेड मार्शल  के अनुसार, हमारे समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसके पीछे आर्थिक शक्तियाँ होती हैं। इसलिए समाज को समझने और इसे बेहतर बनाने में इसके आर्थिक आधार को समझना ज़रूरी है।

इसी कड़ी में, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि हर सक्षम और आदर्श समाज की रचना में, आरंभ से ही महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका रही है। 

भारत के संदर्भ में भी, महिलाओं की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। बात चाहे आज़ादी की लड़ाई की हो, या ज्ञान-विज्ञान की, देश निर्माण में महिलाओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यदि सिर्फ खेती की बात की जाए, तो इससे संबंधित करीब 65% कार्यभार महिलाओं के कंधों पर है, लेकिन, नए और उभरते-क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है, जो दुःखद है।

तथ्यों के अनुसार, देश के औद्योगिक क्षेत्र में महिला उद्यमियों की संख्या 14% से भी कम है। भारतीय उद्योग जगत में एक और मिथक है कि यहाँ केवल ऐसी महिलाएँ ही अपने कदम रख सकतीं हैं, जो उच्च शिक्षित हों या उनकी उम्र कम हो। 

आँकड़े बताते हैं कि देश की लगभग 52% महिलाएँ 25 वर्ष से 35 वर्ष के बीच, 20% महिलाएँ 25 वर्ष से 35 वर्ष के बीच और करीब 3.2% महिलाएँ ही, 50 वर्ष की उम्र के बाद बिज़नेस की दुनिया में अपने कदम रखतीं हैं।

बेशक उद्यमिता, जोखिम उठाने, आय, प्रतिष्ठा, आदि जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है, लेकिन बुलंदियों को छूने की कोई उम्र नहीं होती। उद्यमिता एक ऐसा तत्व है, जिसके ज़रिए देश की गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, लिंगभेद, आदि जैसे मुद्दों को ख़त्म किया जा सकता है।

ऐसी स्थिति में, आज महिलाओं में एक नए विश्वास को जागृत करने की विशेष ज़रूरत है, क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी जितनी अधिक होगी, हमारा देश आर्थिक और सामाजिक रूप से उतना ही अधिक समर्थ होगा।

इसी तथ्य को समझते हुए, भारत सरकार के साथ साझेदारी में जर्मन फ़ेडरल मिनिस्ट्री फॉर इकनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (BMZ) की ओर से GIZ के ‘इकनॉमिक एम्पावरमेंट ऑफ़ वीमेन एन्त्रेप्रेंयर्स एंड स्टार्टअप बाय वीमेन’ (Her&Now) कार्यक्रम चलाया जा रहा है। 

इस कार्यक्रम का उद्देश्य उद्योग-धंधे के क्षेत्र में महिलाओं को तकनीकी ज्ञान, प्रशिक्षण, आदि उपलब्ध कराने के साथ-साथ, मीडिया, प्रशासन, बाज़ार, आदि जैसे कई हितधारकों के बीच एक सीधा संवाद स्थापित कराना है। 

आज हम आपको कुछ ऐसी महिला उद्यमियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने इस कार्यक्रम का लाभ उठाया और अपने जुनून और जज़्बे से, बिज़नेस की दुनिया में दस्तक देकर समाज को एक नई दिशा दिखाई है। 

यदि आप कुछ अलग करने की चाहत रखतीं हैं, लेकिन महिला होने के कारण या उम्र-दराज़ होने के कारण आगे बढ़ने से झिझक रहीं हैं, तो इन प्रेरक महिलाओं की कहानियाँ ज़रूर पढ़ें।

1. शकुंतला, संस्थापक – पुरसो सा, जयपुर (राजस्थान)

शकुंतला झाला, राजस्थान के जयपुर की रहने वाली हैं। 47 वर्ष की उम्र में उन्होंने तमाम तकनीकी समस्याओं के बीच GIZ के Her&Now कार्यक्रम से अनुभव प्राप्त कर, अपनी फूड कंपनी “पुरसो सा” की शुरुआत की। इसके तहत, वह दाल-बाटी चूरमा, गुजिया, मठरी जैसे कई राजस्थानी व्यंजनों को बनाने का काम करतीं हैं।

Successful Women Entrepreneurs
शकुंतला झाला

शकुंतला पहले गहनों का कारोबार करतीं थीं, लेकिन उसमें हुए भारी नुकसान के बाद उन्होंने नए बिज़नेस में हाथ आज़माया।

वह बतातीं हैं, “मैंने यहाँ अपनी ट्रेनिंग सितंबर, 2019 में शुरू की और इसी की मदद से जनवरी, 2020 में ज़ीरो इनवेस्टमेंट से अपने घर में खाना बनाने का कारोबार शुरू किया। आज मुझे इससे हर महीने 20-30 हज़ार की कमाई हो रही है।”

वह आगे बतातीं हैं, “मेरी उम्र 50 की होने को है। अब इस उम्र में कंप्यूटर चलाना सीखना बहुत मुश्किल था, लेकिन अपनी बेटी और Her&Now की मदद से मैंने यह सीखा। अब मैं जल्द ही अपने उत्पादों की ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा उपलब्ध कराने जा रही हूँ, ताकि मुझे अपने कारोबार को आगे ले जाने में मदद मिले। इसके साथ ही, एक फूड स्टूडियो बनाने की भी मेरी योजना है।”

2. निशा चौधरी, संस्थापक – वन भूमि, जयपुर (राजस्थान)

राजस्थान के जयपुर की रहने वाली निशा चौधरी की उम्र 49 साल है और उन्होंने करीब 2 साल पहले ‘वनभूमि’ नाम से अपनी एक कंपनी को शुरू किया। इसके तहत वह न सिर्फ पेड़-पौधों का कारोबार करतीं हैं, बल्कि लोगों को बागवानी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी भी देतीं हैं।

निशा बतातीं हैं, “इस उम्र में नए बिज़नेस को शुरू करने के बाद काफ़ी पारिवारिक दबाव था। हर तरफ सवाल उठ रहे थे कि इस उम्र में यह जोखिम उठाने की क्या ज़रूरत है, लेकिन मेरा मानना था कि किसी चीज़ को शुरू करने का जुनून हो तो, उम्र कोई बंधन नहीं होता है। मैं इसी सोच के साथ आगे बढ़ी। एक बार जब लोगों को मुझ पर भरोसा हो गया, तो सभी का सपोर्ट मिलने लगा।”

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निशा चौधरी

निशा ने अपने कारोबार को महज़ 15-20 हज़ार रुपए से शुरू किया था, और आज इससे वह न सिर्फ 25-30 हज़ार की कमाई कर रहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपने यहाँ 4 लोगों को नौकरी भी दी है।

अपने कारोबार को नई उंचाईयों तक पहुँचाने के लिए निशा कुछ नया सीखना चाहती थीं तभी उन्हें एक विज्ञापन के ज़रिए GIZ के Her&Now प्रोग्राम के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने इसके बारे में पता किया और लोकल पार्टनर स्टार्टअप ओएसिस ने आवेदन कर दिया और उनका  चयन हो गया।

वह इसके बारे में बतातीं हैं, “मैं यहाँ जून, 2020 से ट्रेनिंग ले रही हूँ और मुझे उम्मीद है कि यहाँ मुझे जो सीखने के लिए मिल रहा है, उससे मुझे अपने बिज़नेस को एक नए मुकाम पर ले जाने में सफलता मिलेगी। कोरोना महामारी की वजह से लोगों का रुझान बागवानी की ओर काफ़ी बढ़ा है और इन्हीं संभावनाओं को देखते हुए, मैं अपने उत्पादों को ऑनलाइन बेचने की योजना बना रही हूँ।”

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3. जीना खुमूजन, संस्थापक – मा-नगल, इंफाल (मणिपुर)

मणिपुर के इंफाल की रहने वाली 67 वर्षीया, जीना खुमूजन साल 2004 से बिज़नेस के क्षेत्र में हैं। वह अपनी कंपनी मा-नगल (Ma-Ngal)  के तहत हस्तनिर्मित औषधीय साबुन का कारोबार करतीं हैं, जिसे उन्होंने महज़ 100 रुपए से शुरू किया था।
जीना

आज इन्हें इस बिज़नेस से हर महीने न सिर्फ 30-40 हज़ार रूपये की कमाई होती है, बल्कि 7 से अधिक बेसहारा और पीड़ित लड़कियों को जीने का ज़रिया भी मिलता है। 

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जीना खुमूजन

जीना बतातीं हैं, “मेरी उम्र 67 साल हो गई। मुझे चलने फिरने में दिक्कत होती है, लेकिन मैं नई चीजों को सीखने के लिए हमेशा तैयार रहती हूँ। इसलिए मैं जनवरी 2020 में Her&Now प्रोग्राम से जुड़ी, ताकि मैं अपने बिज़नेस को और आगे ले जा सकूं।”

जीना बतातीं हैं, “कोरोना महामारी के कारण मेरा कारोबार रुक गया था और लड़कियों को काम पर रखना मुश्किल हो गया था। लेकिन, इस कार्यक्रम और इसके लोकल पार्टनर Dhriiti की मदद से मैंने वित्तीय संसाधनों का सही इस्तेमाल किया। यही कारण है कि मुश्किल हालातों में भी मैंने 3 ज़रूरतमंद लड़कियों को नौकरी पर रखा है, जिसकी मुझे बेहद ख़ुशी है।”

4. शाश्वती तालुकदार, संस्थापक – सोशल एंटरप्राइज मोउशाक, गुवाहाटी, (असम)

असम के गुवाहाटी में रहने वाली शाश्वती तालुकदार पिछले 35 वर्षों से रीटेल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में कई कारोबार कर चुकीं हैं। लेकिन, 61 वर्ष की उम्र में पूरे जोश के साथ उन्होंने कुछ नया करने की ठानी।  असम में मधुमक्खी पालन की असीम संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने अपनी सोशल एंटरप्राइज मोउशाक (Moushak) की स्थापना की।

इसके बारे में वह बतातीं हैं, “कुछ साल पहले न्यूज़ीलैंड और यूरोप के कई देशों की यात्रा के दौरान, मैंने वहाँ मधुमक्खी पालन में हो रहे नए-नए प्रयोगों को नज़दीक से देखा। इससे मुझे विचार आया कि असम में भी पेड़-पौधों की कोई कमी नहीं है, तो क्यों न मधुमक्खी-पालन का बिज़नेस शुरू किया जाए।“

शाश्वती तालुकदार

वह आगे बताती हैं, “इसी विचार के साथ, मैंने अपनी साथी गौतमी अग्रवाल के साथ, साल 2019 में महज़ 30 हज़ार की लागत से मोउशाक की शुरुआत की, जिसके तहत मैं कच्चा और प्राकृतिक रूप से निर्मित शहद बनाकर बेचती हूँ। मेरा उद्देश्य किसानों को यह यकीन दिलाना है कि मधुमक्खी-पालन भी आजीविका का साधन हो सकता है।“

इस उम्र में नए बिज़नेस को शुरू करने के जोखिम को लेकर शाश्वती कहतीं हैं, “उम्र मेरे लिए कोई चुनौती नहीं है, क्योंकि मेरे साथ 35 वर्षों का एक लंबा अनुभव है। मैं नए लोगों से कुछ सीखने को लेकर हमेशा उत्साहित रहती हूँ। मेरा विश्वास है कि आज के युवा जोश और पुराने अनुभव के साथ हम एक बेहतर कल की शुरुआत कर सकते हैं।”

एक और ख़ास बात यह है कि उनके साथ फिलहाल 40-50 मधुमक्खी-पालक जुड़े हुए हैं और ये सभी महिलाएँ हैं। शाश्वती, जल्द ही मधुमक्खी-पालन के ज़रिए वैक्स, पोलन आदि जैसे उत्पादों को बनाने की भी योजना बना रहीं हैं। 

शाश्वती चाहतीं हैं कि उनका उत्पाद देश के हर हिस्से में पहुँचे और इसके लिए ऑनलाइन मार्केटिंग तकनीकों को सीखना ज़रूरी है।

इसी विषय में वह बतातीं हैं, “मुझे भारतीय उद्यमिता संस्थान में एक दोस्त के ज़रिए GIZ के Her&Now प्रोग्राम के बारे में पता चला। मैं यहाँ 3 महीने से ट्रेनिंग ले रही हूँ। यहाँ मुझे अपने उत्पादों की ऑनलाइन मार्केटिंग कैसे करनी चाहिए, इसके बारे में गहराई से जानकारी मिल रही है। अब हमें उम्मीद है कि हमें जल्द ही हर महीने 1000-1200 ऑर्डर मिलेंगे।“

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5. जयाअम्मा, संस्थापक – आरोग्य दायिनी, मेहबूबनगर (तेलंगाना)

तेलंगाना के मेहबूबनगर की रहने वाली 60 वर्षीया जयाअम्मा, अपनी कंपनी “आरोग्य दायिनी” के तहत सरसों, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली तथा नारियल जैसे उत्पादों से हर महीने हजारों लीटर कोल्ड प्रेस्ड ऑयल बनाकर न सिर्फ लाखों की कमाई कर रहीं हैं, बल्कि इससे 15 लोगों को रोज़गार भी दिला रहीं हैं।

जयाअम्मा बताती हैं, “मेरे शरीर में गाँठें बन गयी थीं, डॉक्टर के पास जाने के बाद पता चला कि यह कैंसर का लक्षण है। मैंने इसका ऑपरेशन कराया, जिसके बाद, हमारे इलाके में मैसूर के जाने-माने डॉक्टर, कादर वल्ली का सेशन हुआ। जब मैं उनसे मिली, तो उन्होंने मुझसे कहा कि खाने-पीने में छोटे-छोटे बदलावों के ज़रिए कई बीमारियों को रोका जा सकता है। मुझे खाने में शुद्ध तेल का इस्तेमाल करना चाहिए।”

जयाअम्मा

इसके 3 महीने बाद, जयाअम्मा ने अपनी उम्र और स्वास्थ्य की चिन्ता न करते हुए, अपने घर पर ही कोल्ड प्रेस्ड ऑयल बनाने की ठानी। इसके बाद, उन्होंने करीब 2 लाख रुपए की लागत से अपनी कंपनी “आरोग्य दायिनी” की नींव रखी। 

इसके तहत उनका उद्देश्य अपने ग्राहकों को प्राकृतिक तरीके से बना तेल उपलब्ध कराना है। शुरुआती दिनों में, जयाअम्मा का उत्पाद केवल आस-पास के एक-दो गाँवों में बिकता था, लेकिन आज उनके पास कर्नाटक, गुजरात, पंजाब जैसे कई राज्यों से ऑर्डर आते हैं।

इसके बारे में वह कहती हैं, “शुरुआती दिनों में मेरे पास तेल बनाने के लिए केवल एक इकाई थी, लेकिन स्वयं सहायता समूह के ज़रिए जर्मन सोसायटी फॉर इंटरनेशनल कॉरपोरेशन (GIZ) के Her&Now प्रोग्राम के बारे में पता चला। इस प्रोग्राम के लोकल पार्टनर WE Hub की मदद से मुझे यह पता चला कि मुझे अपने कारोबार को कैसे आगे बढ़ाना चाहिए, पैकेजिंग और ब्रांडिंग कैसे करनी चाहिए, आदि। इसी का नतीजा है कि आज मेरे पास तेल बनाने के लिए 4 मशीनें हैं। इनसे एक दिन में 100 लीटर से अधिक तेल का उत्पादन होता है।”

एक और ख़ास बात यह है कि महज सातवीं पास जयाअम्मा तेल बनाने के दौरान साफ़-सफ़ाई का पूरा ध्यान रखती हैं और वह तेल बनाने के बाद बचे उत्पादों का इस्तेमाल पशु-आहार बनाने के रूप में करती हैं। इस तरह, जयाअम्मा के पास ज़ीरो प्लास्टिक के इस्तेमाल के साथ-साथ ज़ीरो वेस्ट भी होता है।

उम्मीद है कि इन महिला उद्यमियों ने जिस आत्मविश्वास के साथ अपने कदम बढ़ाए हैं, इससे देश की हर तबके और हर उम्र की महिलाओं को उद्योग-धंधे के क्षेत्र में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की प्रेरणा मिलेगी। 

संपर्क करें:
Her&Now सपोर्ट प्रोग्राम के पहले बैच के 141 उद्यमियों के इम्पैक्ट के बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें: https://bit.ly/3jMtjmA

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कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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