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छत्तीसगढ़: कुम्हार ने बनाया 24 घंटे तक लगातार जलने वाला दिया, पूरे देश से आयी मांग

छत्तीसगढ़: कुम्हार ने बनाया 24 घंटे तक लगातार जलने वाला दिया, पूरे देश से आयी मांग

छत्तीसगढ़ के अशोक चक्रधारी के बनाये इस जादुई दिये में तेल सूखने के बाद अपने आप तेल भर जाता है और वह दिया निरंतर जलता रहता है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग विभिन्न विधाओं में पारंगत हुनरमंदों का क्षेत्र है। संभाग के कोंडागांव ज़िले के मसौरा ग्राम पंचायत के कुम्हार पारा में रहने वाले अशोक चक्रधारी ने एक जादुई दिया बनाया है जिसकी बाज़ार में निरंतर मांग बनी हुई है। इस विशेष दिये को खरीदने के लिए दिल्ली, मुंबई, भोपाल आदि से फ़ोन आने लगे हैं।

अशोक कच्ची मिट्टी को आकार देकर बोलती तस्वीर व जीवंत मूर्तियां तैयार करते हैं। बस्तर के पारंपरिक शिल्प झिटकू-मिटकी के नाम से अशोक ने कला केंद्र स्थापित किया है। पिछले वर्ष इनकी मिट्टी की कलाकारी से प्रभावित होकर केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय ने इन्हें मेरिट प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया था, वहीं इस वर्ष अशोक द्वारा निर्मित जादुई दिया पूरे देश में बिक रहा है। इस जादुई दिये में तेल सूखने के बाद अपने आप तेल भर जाता है और वह दिया निरंतर जलता रहता है।

क्यों कहा जा रहा है इसे जादुई दिया?

magical lamp
अशोक का बनाया हुआ जादुई दिया

मिट्टी का बना यह दिया दो भाग में बनाया गया है। इसमें नीचे के हिस्से को एक गोलाकार आधार दिया गया है, जिसमें बत्ती लगायी जाती है। दूसरा भाग चाय की केतली की तरह एक गोलाकार छोटी सी मटकी का पात्र है, जिसमें तेल भरा जाता है। इस में से तेल निकलने के लिये मिट्टी की नलकी बनाई गई है। इस गोलाकार पात्र में तेल भरकर दिये वाले आधार के ऊपर उल्टा कर सांचे मे फिट कर दिया जाता है। इस दिये को इस तरह से बनाया गया है कि तेल कम होने पर अपने आप तेल की धार शुरू हो जाती है।

जादुई दिया बना आय का साधन

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अशोक चक्रधारी

यह जादुई दिया अशोक के लिए वरदान साबित हो रही है. दुनिया भर से इसके आर्डर मिलने लगे हैं। वह पहले प्रतिदिन 30 दियों का निर्माण करते थे लेकिन अब बढ़ती मांग को देखते हुए 100 दिये बना रहे हैं। अधिक दिये बनाने के लिए 10 अन्य साथी काम कर रहे हैं तथा दिवाली तक मांग पूरी हो जाये इसके लिए पैकेजिंग एवं ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था की भी तयारी कर ली गई है।

संघर्ष में बीता बचपन।


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अशोक का बचपन बेहद संघर्ष में बीता। चौथी कक्षा तक पढ़ाई की और इसके बाद पिता के साथ मिट्टी के काम में जुट गए। शुरुआती समय में पढ़ाई के बाद समय निकालकर काम करते थे लेकिन धीरे-धीरे पूरी तरह काम में व्यस्त हो गए।
अशोक गाँव-गाँव जाकर लोगों के घर में मिट्टी के कवेलू बनाते और लगाते थे। तभी से अशोक ने मिट्टी को अपना सब कुछ मान लिया था। एक दशक पहले उनके माता -पिता का देहांत हो गया और परिवार की ज़िम्मेदारी अशोक के कंधों पर आ गई।

अशोक कहते हैं, “आज मिट्टी ही ज़िन्दगी है और यही मेरी आजीविका है।”

चुनौतियों के सामने घुटने नहीं टेके।

पिछले 40 वर्षो से कुम्हार का काम कर रहे अशोक कहते हैं,”अब हमारे काम में बहुत सी चुनौतियाँ आ गई हैं। स्टील, प्लास्टिक एवं प्लास्टर ऑफ़ पेरिस के सामान बाज़ार में उपलब्ध हो जाने से अब लोग मिट्टी के सामान नहीं खरीदते और जो खरीदते हैं वे पूरे दाम देने के लिए तैयार नहीं होते। पानी की कमी, बदलते मौसम, टूट-फूट से होने वाले घाटे सामान्य हैं, लेकिन इसके बाद भी मैं निराश नहीं होता। कई साथी कुम्हार इस काम को छोड़कर दूसरा काम करने लगे हैं और मुझसे भी कहते हैं कि मैं कुछ और कर लूँ, लेकिन मैं मिट्टी के काम में निरंतर सम्भावना ढूंढ़ता हूँ। हर बार सफलता नहीं मिलती लेकिन सीखने को जरूर मिलता है।”

प्रयोग और नवाचार से मिली सफलता।

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यह जादुई दिया विगत एक वर्ष की अनवरत मेहनत का परिणाम है। अशोक ने द बेटर इंडिया को बताया, “35 वर्ष पहले भोपाल में प्रदर्शनी लगी थी। उस प्रदर्शनी में सरगुजा के एक अनुभवी कलाकर ने मिट्टी के नए-नए प्रयोग किये थे। वह सब देखकर मुझे लगा कि मिट्टी से कितना कुछ बनाया जा सकता है और इसकी उपयोगिता असीमित है। बस, यही बात दिमाग में थी और मैंने पिछले वर्ष यह जादुई दिया बनाना शुरू किया। पहले 3 बार मैं असफल रहा लेकिन चौथी बार यह दिया काम करने लगा। फिर इसके बारे में मैंने अपने दोस्तों को बताया। सब ने इसका उपयोग करके देखा और इसकी उपयोगिता समझी और धीरे-धीरे यह प्रदेश और देश में लोगों के बीच पहुंच गया।”

कुम्हार साथियों को सिखाना चाहता हूँ।

अशोक का मक़सद मिट्टी का काम कर सिर्फ पैसे कमाना नहीं है, बल्कि इस परंपरा को जीवित रखना है। अपने काम के बाद वे नवांकुर कुम्हारों को मिट्टी का काम सिखाते हैं। इस काम में अकूट संभावनाएं हैं, तथा नई पीढ़ी अपनी मेहनत से इस काम को नया आयाम दे सकती है। अशोक कहते हैं कि अपने काम के बाद वह नियमति रूप से इन युवा कलाकारों के साथ बैठते हैं वे सब और बेहतर काम करने का प्रयास करते हैं। अशोक मिट्टी की मूर्तियां, दैनिक उपयोग की वस्तुएं, सजावटी सामान का निर्माण कर ज़्यादा से ज़्यादा रोजगार के अवसर पैदा करना चाहते हैं ताकि कोई भी इस पारम्परिक काम को न छोड़े।

कोंडागांव में, इस जादुई दिये की कीमत 200 रुपये है।  बाहर के लोगों के लिए पैकेजिंग एवं ट्रांसपोर्ट का शुल्क अलग से जोड़ा जायेगा तथा उनके पते पर भेज दिया जाएगा। अगर आप भी यह जादुई दिया खरदीना चाहते हैं तो 9165185483 पर संपर्क कर सकते हैं।

अशोक चक्रधारी का कार्य निश्चित ही सराहनीय है। एक कलाकार अपनी लगातार मेहनत और कल्पनाशक्ति से रोजमर्रा के काम के लिए नए-नए अविष्कार कर समाधान कर रहा है।
विपरीत परिस्थति में भी उन्होंने मिट्टी के काम को छोड़ा नहीं तथा लगन के साथ काम करते जा रहे हैं। हुनर को अगर वैज्ञानिक सूझ-बूझ से जोड़ा जाए तो निश्चित ही अभुतपूर्व परिणाम आ सकते हैं। अशोक का जादुई दिया, इसका सीधा उदारहण है। वहीं मिट्टी से निर्मित सामान पर्यावरण के लिए हानिकारिक भी नहीं होते और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अगर इसमें रुचि दिखाते हैं तो निश्चित ही कृषि से इतर रोज़गार के नए रास्ते भी अवश्य खुलेंगे।

हुनरमंद एवं मेहनतकश कलाकर अशोक को द बेटर इंडिया परिवार का सलाम।

लेखक – जिनेन्द्र पारख एवं हर्ष दुबे

संपादन – मानबी कटोच

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जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख ने हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर से वकालत की पढ़ाई की है। जिनेन्द्र, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से आते है। इनकी रुचियों में शुमार हैं- समकालीन विषयों को पढ़ना, विश्लेषण लिखना, इतिहास पढ़ना और जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना।
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