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सिविल इंजीनियर का अनोखा इनोवेशन, बिना मिट्टी एक बार में उग सकता है 30 किलो तक हरा चारा

देश में हरे चारे की कमी को पूरा करने के लिए सिविल इंजीनियर ने हाइड्रोपोनिक्स तकनीक का इस्तेमाल कर बनाई अनोखी मशीन!

हमारे यहाँ पशुधन को किसानों का सच्चा साथी माना जाता है। खासतौर पर दूध देने वाले पशु, क्योंकि इनसे ग्रामीण इलाकों में किसान डेयरी आदि लगाकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पशुओं के लिए आहार की भी कमी है। उन्हें सही मात्रा में आहार नहीं मिल पाता है और इस वजह से दुग्ध उत्पादन में भी कमी आती है।

बेंगलुरू के एक सिविल इंजीनियर वसंत ने चारा संबंधी समस्या के समाधान के लिए हाइड्रोपोनिक सिस्टम का सहारा लिया है।

सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले वसंत, एक बड़ी रिटेल कंपनी के साथ बतौर डायरेक्टर ऑफ़ इनोवेशन्स काम कर रहे थे। वहाँ काम के दौरान एक बार उनकी मुलाक़ात एक ग्रामीण महिला से हुई। “उसने मुझे अपने फार्म में कम चारे के उत्पादन की शिकायत की। लेकिन फिर कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि उसने यूट्यूब से सीखकर कोई नया तरीका अपनाया है और अब उसके पशुओं के लिए चारे की कमी नहीं है,” उन्होंने बताया।

उस महिला की समस्या दूर हो गई थी लेकिन इस बात ने वसंत को काफी परेशान कर दिया। फिर जब उन्होंने इस बारे में और थोड़ा जाना-समझा तो पता चला कि यह सभी किसानों की परेशानी है। देशभर में सैकड़ों किसान चारे की कमी की समस्या को दूर करना चाहते हैं लेकिन कम से कम लागत पर।

हमेशा से ही कृषि क्षेत्र में रूचि रखने वाले वसंत ने तय किया कि वह इस समस्या का कोई समाधान ज़रूर ढूढ़ेंगे। उन्होंने इस क्षेत्र में कम करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और अलग-अलग ग्रामीण इलाकों में जाकर किसानों से मिलना शुरू किया। दो साल तक उन्होंने ज़मीनी स्तर पर छोटे-बड़े किसानों से बात की और उनकी समस्याओं को समझा। उन्होंने गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, ओडिशा, केरल जैसे राज्यों की यात्राएं कीं। उन्होंने देखा कि बदलते मौसम, बार-बार पड़ने वाले सूखे और आर्थिक तंगी के चलते किसान ज्यादा कुछ नहीं कर पाते हैं।

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वह आगे कहते हैं, “सरकार ने कई सूखे पड़ने के बाद, पिछले कुछ वर्षों में चारा बैंकों जैसी परियोजनाओं के लिए निर्देश जारी किए हैं। हालाँकि, भारत भर में इन कार्यक्रमों के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में अभी भी काफी समय लगेगा। इस सबके बीच, किसान अपनी गायों और भैंसों के लिए चारा पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”

चारा उगाने के लिए हाइड्रोपोनिक सिस्टम:

किसानों की इस परेशानी को खत्म करने के लिए उन्होंने बहुत विचार-विमर्श किया और उनके दिमाग में हाइड्रोपोनिक्स का ख्याल आया। उन्हें लगा कि हाइड्रोपोनिक्स के ज़रिए वह कम लागत में किसानों की परेशानी दूर कर पाएंगे। इसलिए उन्होंने एक खास तरह का हाइड्रोपोनिक सिस्टम बनाया, जिसे उन्होंने नाम दिया- ‘कंबाला’। उन्होंने ऐसे सिस्टम पर काम किया जिसे साधारण और छोटे किसान भी इस्तेमाल कर पाएं और उन्हें ज्यादा खर्च न करना पड़े।

इसका डिज़ाइन फ्रिज की तरह है और ज़मीन पर 3×4 फीट जगह घेरता है और लम्बाई में यह 7 फीट है। इसमें चारा उगाने के लिए 7 रैक लगाई गई हैं 7 दिनों के हिसाब से। हर एक रैक में 4 ट्रे हैं जिनमें हर दिन लगभग 700 ग्राम मक्के के बीज उगाने के लिए डाले जाते हैं। मक्के के अलावा जौ, गेहूँ आदि भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अगले कुछ दिनों में रैक्स में ताज़ा और पोषण से भरपूर हरा चारा तैयार हो जाता है। जिसे पशुओं को खिलाया जा सकता है।

Hydroponics System
Hydroponics Kambala Machine

रैक के अंदर की तरफ 14 माइक्रो-स्प्रिंकलर हैं, जो सिस्टम के बिजली से कनेक्ट होने के बाद जरूरत के मुताबिक पानी का छिड़काव करते हैं। एक दिन में, एक मशीन में 25-30 किलोग्राम चारा उत्पन्न होता है, जो एक सप्ताह में कम से कम 4-5 गायों के लिए पर्याप्त चारा है।

इस मशीन में पानी की बहुत कम ज़रूरत होती है, 3 दिनों के लिए लगभग 50 लीटर, जबकि पारंपरिक तरीकों से चारे की खेती में सिर्फ 1 किलो चारा उगाने के लिए लगभग 70-100 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसमें बचे पानी को ड्रिप सिंचाई या किसी अन्य तरीके से खेती के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। दूसरी अच्छी बात है कि इसे इस्तेमाल करने का बिजली बिल साल भर में मुश्किल से 70 रुपये आता है।

मशीन के चारों और काले रंग का नेट लगा हुआ है जो चारे को अत्यधिक गर्मी से बचाता है और वेंटिलेशन भी बनाए रखता है। राजस्थान जैसे गर्म इलाकों में भी यह काफी फायदेमंद है।

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Hydroponics System
Vasant and Jeewan

एक बेसिक कंबाला मशीन की कीमत 30 हज़ार रुपये है तो वहीं सोलर से चलने वाले मशीन की कीमत 45 हज़ार रुपये रखी गई है। इस मशीन को किसानों तक पहुंचाने के लिए वसंत ने जनवरी 2019 में अपना स्टार्टअप, हाइड्रोग्रीन शुरू किया है। इसमें उनके साथी जीवन एम. भी शामिल हैं। जीवन को एक दोस्त से वसंत के इनोवेशन के बारे में पता चला और उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर उनके स्टार्टअप में भागीदारी ले ली।

यह स्टार्टअप अब तक 41 सोलर कंबाला मशीन आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में लगा चुका है। बाकी राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक में भी उनकी मशीन लगीं हैं। अब तक उन्होंने 130 से ज्यादा मशीन पूरे देशभर में लगाई हैं जो सैकड़ों किसान परिवारों के लिए फायदेमंद साबित हो रही हैं।

हाइड्रोग्रीन ने पिछले साल अपनी मशीन के डिज़ाइन को पेटेंट भी कराया है। इसके साथ-साथ वसंत और जीवन ने स्टार्टअप शुरू करने से पहले, पशुओं और चारे के विकास पर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एनिमल न्यूट्रीशन एंड फिजियोलॉजी से कोर्स भी किया था।

किसानों की मदद:

राजस्थान के एक किसान और उरमूल संगठन के कार्यकर्ता, पुखराज जयपाल बताते हैं कि वसंत और जीवन ने उनके घर पर एक मशीन लगाई थी। इस मशीन से अब एक पूरे समुदाय को चारा उगाने में फायदा हो रहा है। मशीन इस्तेमाल करने में बहुत ही आसान है और पारंपरिक खेत से कहीं ज्यादा मात्रा में चारा मिल रहा है। चारे की गुणवत्ता भी अच्छी है और इससे पशुओं के दूध में बढ़ोतरी हुई है।

Hydroponics System
Training Farmers

पुखराज की प्रेरणा से इलाके में और भी किसानों ने यह मशीन अपने यहाँ लगवाई है। इसी तरह कर्नाटक के एक स्थानीय किसान विश्वा को भी इस मशीन से बहुत फायदा मिला है। पहले जहाँ उन्हें मुश्किल से एक बाल्टी दूध अपने पशु से मिलता था वहीं अब उन्हें कई लीटर दूध ज्यादा मिलने लगा है। वह कहते हैं कि यह कंबाला मशीन में उगने वाले पौष्टिक चारे का कमाल है।

जीवन के मुताबिक, “कंबाला मशीन का उद्देश्य डेयरी किसानों की आय के उस 15-20% हिस्से को बचाना है जो पारम्परिक तरीके से चारा उगाने पर खर्च होता है। इस मशीन में उगने वाले चारे को खाने से पशुओं के दूध में 2 लीटर की वृद्धि भी हो रही है।”

अब यह स्टार्टअप कम्युनिटी मशीन के सेटअप पर काम कर रहा है। वसंत और जीवन यह काम सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर कर रहे हैं ताकि कई छोटे किसान मिलकर एक मशीन से फायदा उठा सकें। उन्होंने कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में 25 कम्युनिटी मशीन सेटअप की हैं। इस सेटअप को स्थानीय कृषि संगठन मैनेज कर रहे हैं। किसान हर सुबह अपनी ज़रूरत के हिसाब से यहाँ से कम से कम दाम में पशुओं के लिए चारा खरीद सकते हैं।

वसंत और जीवन का फोकस अब इस सिस्टम में रागी, ज्वार जैसे फसल उगाने पर है ताकि किसानों के लिए और भी रास्ते निकाले जा सकें। यदि आप इस बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करें!

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स्त्रोत


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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