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अनोखे अंदाज में खेती कर परंपरागत खेती के मुकाबले 4 गुना अधिक कमाता है यूपी का यह किसान

अनोखे अंदाज में खेती कर परंपरागत खेती के मुकाबले 4 गुना अधिक कमाता है यूपी का यह किसान

यह बात 1991 की है। मेरे पिता जी और चाची जी, दोनों की मौत कैंसर से हो गई थी। उस वक्त मुझे विचार आया कि आधुनिक कृषि तकनीकों की वजह से कई जहरीले रसायन हमारे खान-पान के जरिए शरीर को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसी जद्दोजहद में मैंने शिक्षक की नौकरी को छोड़ प्राकृतिक खेती शुरू कर दी।” – श्याम सिंह

यह कहानी उत्तर प्रदेश के शामली जिला के नग्गल गाँव में रहने वाले श्याम सिंह की है, जिन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़कर खेती को रोजगार का जरिया बनाया है। उन्होंने अपने 9 एकड़ की जमीन को फूड फॉरेस्ट में बदल दिया है और वहाँ अब प्राकृतिक तरीके से खेती कर रहे हैं। 

Natural Farming
श्याम सिंह

श्याम इन दिनों लीची, आम, अनार, नींबू, केला, पपीता, नाशपाती जैसे 45 फलदार पेड़ों के साथ पारंपरिक फसलों की खेती भी कर रहे हैं। इनके खेत में आपको धान-गेहूँ, दाल के अलावा हल्दी, अदरक की खेती भी देखने को मिलेगी। 

शिक्षक की नौकरी छोड़ शुरू की प्राकृतिक खेती

श्याम ने द बेटर इंडिया को बताया, “यह बात 1991 की है। मेरे पिता जी और चाची जी, दोनों की मौत कैंसर से हो गई थी। उस वक्त मुझे विचार आया कि आधुनिक कृषि तकनीकों की वजह से कई जहरीले रसायन हमारे खान-पान के जरिए शरीर को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसी जद्दोजहद में मैंने शिक्षक की नौकरी को छोड़ प्राकृतिक खेती शुरू कर दी।”

वह आगे बताते हैं, “मैं लगभग 25 वर्षों से गन्ना, धान, गेहूँ जैसे फसलों की ही खेती कर रहा था। लेकिन मैं 2017 में, पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किसान सुभाष पालेकर जी से मिला और लखनऊ में उनके एक हफ्ते के प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया। यहाँ मैंने खेती के फाइव लेयर मॉडल के बारे में जानकारी हासिल की।”

क्या है खेती का यह मॉडल

श्याम बताते हैं, “यह खेती का एक ऐसा मॉडल है, जिसके तहत एक ही खेत में सघन विधि से कई फसलों की खेती की जाती है। इसमें पेड़-पौधों को वनों की तरह विकसित किया जाता है, जिससे इन्हें प्राकृतिक रूप से बढ़ने में मदद मिलती है। इसे फूड फॉरेस्ट भी कहा जाता है।”

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श्याम सिंह का बगीचा

आज जब सरकार किसानों की आय को दोगुनी करने के लिए संघर्षरत नजर आ रही है, श्याम खेती के इन तरीकों को अपना कुछ ही वर्षों में अपनी आय को चार गुनी बढ़ा चुके हैं।

काले धान-गेहूँ से लेकर देशी किस्म के पपीतों की उन्नत खेती

श्याम बताते हैं, “मैं लगभग 4 एकड़ जमीन पर, 4 किस्म के बासमती धान की खेती करता हूँ – देशी, देहरादूनी, टीबीडब्ल्यू 11/21 और ब्लैक राइस। मैंने ब्लैक राइस को मणिपुर से मंगाया है, इसकी खासियत यह है कि इसे मधुमेह रोगी भी खा सकते हैं।”

वह बताते हैं, “मैं दो किस्म के गेहूँ की खेती करता हूँ, बंसी और काला गेहूँ। बंसी गेहूँ की खासियत यह है कि इसमें प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाई जाती है और इसमें ग्लूटोन काफी कम होता है। इसकी रोटियाँ काफी स्वादिष्ट होती है। यह 4 से 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल की दर पर आसानी से बिक जाता है। इसके अलावा, मैं काले गेहूँ की भी खेती करता हूँ, इसकी बीजों को मैंने हरियाणा के पंचकुला के एक कृषि विश्वविद्यालय से मंगाया है। इस गेहूँ से बने आंटे का इस्तेमाल कैंसर और पाचन संबंधी बीमारियों के लिए किया जाता है।”

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श्याम सिंह के खेत में उगा काला धान

देशी किस्म के बीजों को प्राकृतिक तरीके से उगा कर बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए श्याम अपने खेतों में कई प्रयोग भी कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, श्याम के पास पपीते के लगभग 3000 पौधे हैं, इन पौधों को उन्होंने ग्राफ्टिंग तकनीक के जरिए तैयार किया है।

इसके बारे में वह कहते हैं, “मैंने इन पौधों को देशी किस्म के बीजों से तैयार किया है। बाजार में आम तौर पर, पपीते के ताइवान रेड लेडी और ताइवान 786 किस्म के बीज मिलते हैं। लेकिन, इसकी कीमत 3 लाख से 4 लाख रुपए प्रति किलो होती है। साथ ही, इसमें बीमारियों के लगने की भी काफी संभावना रहती है। जबकि, देशी किस्म के बीजों के साथ ऐसा नहीं है।”

श्याम आगे बताते हैं, “मैं देशी किस्म के 3-4 पपीते के पौधों को एक साथ लगा देता हूँ। कुछ दिनों के बाद, इसमें फूल आने लगते हैं, तो हमें पता चल जाता है कि कौन सा पौधा नर है और कौन मादा। इसके बाद, हम नर वाले पौधे पर मादा पौधे की ग्राफ्टिंग कर देते हैं। इससे पौधों की उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है। जबकि, दूसरी तकनीक के जरिए एक नर और एक मादा पौधे की जड़ों को ग्राफ्टिंग करके एक पौधा बनाया जाता है, इससे पौधों को जमीन से अत्यधिक पोषक तत्व मिलता है, जिससे पौधों पर काफी फल आते हैं। आज मेरे एक-एक पौधे पर 50 किलों से अधिक पपीते लगे हुए हैं। एक और खास बात यह है कि इससे जो बीज निकलेगा, वह हाइब्रिड बीजों को टक्कर दे सकता है।”

बेटे ने भी शुरू की खेती

श्याम बताते हैं कि आज हालात ऐसे हैं कि कोई भी अपने बच्चे को किसान नहीं बनाना चाहता है। लेकिन, वह अपने बेटे को किसान बनाना चाहते हैं। पिछले एक साल से उनका बेटा भी खेती में सहयोग कर रहा है।

अपने पिता के साथ अभय

इसके बारे में श्याम के बेटे अभय कहते हैं, “मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से कॉमर्स में ग्रेजुएट हूँ। साथ ही, ताइक्वांडो खिलाड़ी भी हूँ। लेकिन, पिछले साल मैं सेमी पैरालाइजल्ड हो गया। एम्स में इलाज भी हुआ लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था। इसके बाद, थक-हार कर घर आ गया। यहाँ एक महीने रहने के बाद, मैं ठीक होने लगा। यह शायद गाँव की आवोहवा का असर था। इसके बाद, मैंने तय कर लिया कि मैं भी खेती ही करूंगा।”

खेती को नया आयाम देने के लिए शुरू की पहल

अभय ने अपने पिता की कोशिशों को नया आयाम देने के लिए हाल ही में अपने कृषि आधारित उद्यम ‘भूमि नैचुरल फार्मिंग’ की शुरूआत की। 

अभय बताते हैं, “इसके तहत मैं अमरूद, लीची, पपीता जैसे उत्पादों को प्रोसेस करके बेचने की योजना बना रहा हूँ। हम कुछ उत्पादों की प्रोसेसिंग कर भी रहे हैं। जैसे नींबू और कच्चे आम को सीधे बेचने के बजाय इसका अचार बनाकर बेच रहा हूँ।”

प्रोसेसिंग के बारे में श्याम कहते हैं, “भूमि नैचुरल फार्मिंग के तहत हम एक फ्रेंचाइजी के तौर पर काम करते हुए दूसरे किसानों की जमीन पर भी इस तरीके से बागवानी शुरू कर रहे हैं। इस तरीके से हमें अभी तक तीन किसानों से 10 एकड़ जमीन मिली है। हम जल्द ही इस पर काम शुरू करेंगे।”

कैसे करते हैं खेती 

श्याम बताते हैं, “मैं खेती के लिए अपनी मिट्टी तैयार करने के लिए सबसे पहले जमीन पर पेड़-पौधे की पत्तियों को भरता हूँ। इससे मिट्टी में केंचुआ और कई सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं।”

खेती करते श्याम सिंह

वह आगे बताते हैं, “इससे दूसरा फायदा यह है कि यह जल संरक्षण को बढ़ावा देता है, क्योंकि मिट्टी खाने वाले केंचुए जमीन के 14-15 फीट तक अंदर जाते हैं और अपने परिवार को बढ़ाते हैं। इससे जमीन में असंख्य छिद्र बनते हैं और बारिश या खेत में अधिक पानी होने से स्थिति में जमीन इसे आसानी से अवशोषित कर लेती है।”

श्याम अपने पौधों की सिंचाई के लिए फ्लडिंग के बजाय नली बनाते हैं। इससे पानी के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा, वह खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए गुड़, बेशन, गोबर, गोमूत्र और मिट्टी से बने जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं। जबकि, कीटनाशकों के लिए नीम और हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है।

श्याम के खेती कार्यों से प्रभावित होकर कई किसान और जिला प्रशासन के अधिकारी उनसे मिलने आते हैं और उनसे खेती के गुर सीखते हैं। इस कड़ी में मेरठ के रहने वाले अशोक तनेजा कहते हैं, “मैं उनके फार्म को पिछले साल देखने के लिए गया था। इससे मुझे भी इसी तरीके से खेती करने की प्रेरणा मिली और कुछ महीने पहले मैंने अपने 3 एकड़ जमीन पर श्याम जी के मार्गदर्शन में फाइव लेयर विधि से खेती शुरू कर दी। उम्मीद है कि इसके काफी बेहतर नतीजे आएंगे।”

कई राज्यों से आते हैं ग्राहक

श्याम अपने उत्पादों को स्थानीय मंडी में बेचने के साथ-साथ ग्राहकों को सीधे तौर पर भी बेचते हैं। बाजार में प्राकृतिक रूप से उगाए गए उत्पादों की कमी की वजह से आज उनके पास दिल्ली, देहरादून, चंडीगढ़ जैसे कई शहरों से भी ग्राहक आते हैं।

आप श्याम सिंह से 9012300500 पर संपर्क कर सकते हैं।

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कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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