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जज्बे को सलाम: उम्र महज 15 साल, लेकिन गुल्लक में पैसे जमा कर बना डाले 10 शौचालय

जज्बे को सलाम: उम्र महज 15 साल, लेकिन गुल्लक में पैसे जमा कर बना डाले 10 शौचालय

जिस उम्र में बच्चों का ध्यान केवल और केवल खेलकूद और मनोरंजन में रहता है, ऐसी उम्र में झारखंड की इस बच्ची ने गुल्लक में पैसे इकट्ठा कर 10 शौचालय का निर्माण करा चुकीं हैं।

झारखंड के जमशेदपुर में रहने वाली मोन्द्रिता चटर्जी की उम्र महज 15 साल है, लेकिन उन्होंने इतनी छोटी उम्र में कुछ ऐसी पहल की है, जिससे समाज में स्वच्छता संबंधी चिन्ताओं को दूर करने के लिए उम्मीद की एक नई किरण दिखाई देती है।

Jharkhand School Girl
मोन्द्रिता चटर्जी

फिलहाल, जमशेदपुर के हिलटॉप स्कूल में 10वीं में पढ़ने वाली मोन्द्रिता, अपने गुल्लक में पैसे जमा कर यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में 10 शौचालय बनवा चुकी है और उनका लक्ष्य है कि समाज के हर तबके में शौचालय के व्यवहार को बढ़ावा मिले।

कैसे हुई शुरुआत

दरअसल, बात 2014 की है। मोन्द्रिता उस वक्त चौथी कक्षा में पढ़ती थीं। इसी दौरान, खबरों के जरिए उन्हें पता चला कि स्कूल में शौचालय नहीं होने की वजह से लड़कियाँ स्कूल छोड़ रही हैं। 

मोन्द्रिता ने द बेटर इंडिया को बताया, “मेरे पापा को खबरों में काफी दिलचस्पी रहती है, उन्हीं के जरिए मुझे पता चला कि ग्रामीण क्षेत्रों में, स्कूलों में शौचालय नहीं होने के कारण लड़कियाँ पढ़ने नहीं आती हैं। इसका मेरे ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा, क्योंकि शौचालय हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बिना शौचालय के अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। इसके बाद मैंने ठान लिया कि मुझे इस दिशा में कुछ पहल करना है।

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मोन्द्रिता ने जमशेदपुर के केन्द्राडीह में बनाया पहला शौचालय

वह आगे बताती हैं, “हमारे घर में पूजा करने के स्थान पर गुल्लक रखा होता है, जिसमें माँ-दादी पैसे जमा करती हैं। इसलिए मेरी भी शुरू से ही गुल्लक रखने की आदत रही। मैं इन पैसे को पर्व-त्योहार में खर्च करती थी, लेकिन मैं 2014 से गुल्लक में माँ-पापा और सगे-संबंधियों से अधिक पैसे माँग जमा करने लगी। इस तरह, 2 वर्षों में 24 हजार रुपए जमा हो गए।

इसके बाद मोन्द्रिता ने अपने माता से कहा कि उनके पास 24 हजार रुपए जमा हो गए हैं और इससे वह कुछ करना चाहती हैं। इसके बाद उन्हें जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति (JNSC) के जरिए केन्द्रहीह गाँव के बारे में पता चला। इस गाँव की आबादी 350 से अधिक थी, लेकिन यहाँ एक भी शौचालय नहीं था, फिर उन्होंने यहाँ शौचालय बनाने का फैसला किया।

इसके बारे में वह कहती हैं, “हमने यहाँ लगभग 25 हजार रुपए से दिसंबर 2016 में दो शौचालय बनाए। शौचालय बनाने के बाद, हम अपने माँ-पापा के साथ हर वीकेंड यहाँ आते थे, ताकि पता चले कि लोग इसे इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं। हम लड़कियों को शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित भी करते थे।

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मोन्द्रिता ने झारखंड के पोटका में बनाया अपना 10वाँ शौचालय

बता दें कि गत वर्ष 150वीं गाँधी जयंती के मौके पर, मोन्द्रिता ने झारखंड क पोटका में अपने 10वें शौचालय का निर्माण किया। इससे पहले वह हलुदवानी और गरुड़वासा में भी शौचालय बनवा चुकी हैं। लेकिन, इसमें सबसे खास है गरुड़वासा के मानविकास स्कूल में बना शौचालय।

क्या खास है इस शौचालय में

मानविकास स्कूल में इस शौचालय को 2018 में बनाया गया था। इसमें तीन रूम हैं, लेकिन इस शौचालय को परंपरागत तकनीक के बजाय 7000 बेकार प्लास्टिक के बोतलों से बनाया गया है। इन बोतलों में मिट्टी भरे गए हैं, ताकि इसपर भीषण गर्मी का भी कोई असर न हो। इस शौचालय को बनाने में 1.8 लाख रुपए खर्च हुए और जब शौचालय बनकर तैयार हुआ, तो झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास भी इसे देखने आए। भविष्य में मोन्द्रिता का इरादा पर्यावरण हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे और शौचालयों को बनाने का है।

मोन्द्रिता ने गरुड़वासा में प्लास्टिक की बोतलों में मिट्टी भर बनाया शौचालय

अभिभावकों को नहीं था कुछ पता

मोन्द्रिता के पिता डॉ. अमिताभ चटर्जी बताते हैं, “हमें 2016 में जब पता चला कि हमारी बेटी कुछ ऐसे कार्यों के लिए पैसे जमा कर रही है, तो हम अचंभित थे। मोन्द्रिता के इरादा जमा पैसों को स्वच्छता अभियान के लिए डोनेट करने का था, लेकिन हमने शौचालय बनाने का सुझाव दिया। इसमें जिला प्रशासन की पूरी मदद मिली।

वह बताते हैं, “हम ऐसे जगहों पर ही शौचालय बनाते हैं, जहाँ इसकी सख्त जरूरत है। साथ ही, हम यहाँ पानी की उपलब्धता भी सुनिश्चित करते हैं, क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि पानी के अभाव में शौचालय व्यवहार में नहीं आता है। इस तरह एक शौचालय बनाने में लगभग एक लाख रुपए खर्च होते हैं। इस रकम को पूरा करने के लिए अब, मैं और मेरी शिक्षक पत्नी अपनी सैलरी का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी के लिए जमा करते हैं, ताकि हम मोन्द्रिता के सपने को पूरा कर सकें।

अपने माता-पिता के साथ मोन्द्रिता

इसके अलावा, मोन्द्रिता अपने माता-पिता के साथ गाँवों का नियमित दौरा भी करती हैं, और ग्रामीणों द्वारा शौचालय के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए उनका काउंसिलिंग भी करती हैं, जैसे – शौचालय का इस्तेमाल क्यों जरूरी है, इसकी साफ-सफाई कैसे करें, आदि।

अमिताभ के अनुसार, मोन्द्रिता के इस पहल से कम से कम 900 लड़कियों समेत दो हजार लोगों को फायदा हुआ है। कुछ तो ऐसे उदाहरण भी देखने को मिले हैं कि बच्चे अपने घरों में शौचालय को बनाने के लिए अपने माता-पिता से दवाब बना रहे हैं।

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बच्चों के साथ मोन्द्रिता

इस विषय में केन्द्रहीह की रहने वाली 26 वर्षीय दुर्गा बताती हैं, “पहले यहाँ कोई शौचालय नहीं था। इस वजह से हमें शौचालय के लिए शाम का इंतजार करना पड़ता था। लेकिन, गाँव में मोन्द्रिता द्वारा शौचालय बनाने के बाद यहाँ इसके इस्तेमाल को बढ़ावा मिला। साथ ही, शौचालय के पास ही एक मंदिर है, जिससे यहाँ पूजा करने के लिए आने के बाद भी कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन पहले कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

शौचालय चटर्जी कहते थे लोग

अमिताभ बताते हैं कि मोन्द्रिता के शौचालय बनाने की मुहिम को लेकर लोग उन्हेंशौचालय चटर्जीकहते थे, लेकिन मोन्द्रिता ने हार नहीं मानी और वह दिनोंदिन निखरती गईं।

मुख्यमंत्री से लेकर उपराष्ट्रपति तक से मिल चुकी है सराहना

मोन्द्रिता ने शौचालय के जरिए स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए जो मुहिम छेड़ी है, उसे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास और राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू से लेकर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के द्वारा भी सराहा जा चुका है।

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उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी सराह चुके हैं मोन्द्रिता के कार्यों को

इसके अलावा, मोन्द्रिता को 2018 में एसोचैम लीडरशिप अवॉर्ड मिलने के साथ ही, उन्हें पूर्वी सिंहभूम जिला में स्वच्छता अभियान के लिए ब्रांड एम्बेसडर भी चुना गया है।

क्या है भविष्य की योजना

मोन्द्रिता कहती है, “आज लड़कियों के लिए शौचालय जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है माहवारी के दौरान स्वच्छता का ध्यान रखना। मैं भविष्य में इसी दिशा में कोई ठोस शुरू करना चाहती हूँ। साथ ही, मेरी ग्रामीण क्षेत्रों में, खेती कार्यों में जैविक उर्वरकों को भी बढ़ावा देने की योजना है।


इस छोटी सी उम्र में स्वच्छता को लेकर काम करने वाली मोन्द्रिता चटर्जी के जज्बे को द बेटर इंडिया सलाम करता है।

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संपादन – जी.एन झा 

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कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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