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कभी शराबी रह चुके अज्जप्पा शिवलिंगप्पा आज अपने गाँव को बना रहे है नशामुक्त

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अजप्पा, एक ५४ वर्षीय वृद्ध, जिसने न सिर्फ स्वयं को शराब की लत से छुटकारा दिलवाया, बल्कि अपने पुरे गाँव को एक शराब- मुक्त क्षेत्र बनाने में सफल हुआ। जानें एक प्रेरणादायक कहानी।

घोड़ागेरी निवासी, अजप्पा शिवालिंगाप्पा प्याती, कुछ वर्ष पूर्व तक, कभी किसी सड़क के किनारे, तो कभी किसी गटर में पाया जाने वाला नशेडी था। एक संपन्न परिवार का सदस्य हो कर भी अपने शराब की ज़रुरतो को पूरा करने के लिए लोगो से कई बार भीख मांगनी पड़ जाती थी। धीरे धीरे न सिर्फ उसके अपने बल्कि गाँव के साथी भी उस से दूर होते चले गए।

यह साधारणतः हर उस व्यक्ति की कहानी है जिन्हें अपनी किसी बुरी लत के कारण,पैसे एवं इज्ज़त, दोनों ही गंवानी पड़ी हो। किन्तु ५४ वर्षीय अज्जप्पा निश्चित ही उन लोगों से अलग था।

उसने न सिर्फ स्वयं को इस लत से निजात दिलवाया बल्कि अपने पुरे गाँव को एक शराब मुक्त क्षेत्र बनाया।

alcohol

सात वर्ष पूर्व, उसके जीवन ने एक नया मोड़ तब लिया जब उसने एक जागरूकता कार्यक्रम में भाग लिया, जिसमे शराब तथा उससे होने वाली बीमारियों एवं उसके परिणामो से अवगत कराया जा रहा था। इस दौरान उसे यह एहसास हुआ कि शराब की लत ने उसे सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कितना नुक्सान पहुँचाया है। इसी समय उसने यह प्रण लिया कि वह न सिर्फ स्वयं को, बल्कि पुरे गाँव को इस से मुक्त करेगा।

 

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अज्जप्पा ने 60 स्वयंसेवकों का एक दल गठित किया और शराब के ठेके बंद करवाने के प्रण से इस उद्देशय की शुरूवात की। काफी कठिनायों एवं जद्दोजहद के बाद आख़िरकार घोड़ागेरी शराब ठेकों से मुक्त हो पाया।

उसका अगला कदम शराबियो को शराब के नुकसान से अवगत करवा कर इस नशे से निजात दिलवाना था, जिसमे वह काफी हद तक सफल भी हो गया। करीब ९० प्रतिशत व्यक्तियों को इस लत से पूर्णतः छुटकारा मिल गया है, बाकी के १० प्रतिशत भी गाँव में शराब न मिलने के कारण लाभान्वित हुए और पूरी तरह इस लत को छोड़ने में मदद भी मिल रही है।

अजप्पा को यह पूर्ण विश्वास है कि गाँव को १०० प्रतिशत शराब मुक्त क्षेत्र बनाने का सपना अब दूर नहीं है।

 

अजप्पा एक मिसाल है उन लोगों के लिए जो अपनी बुरी लतों को अपनी मजबूरी मान कर उनसे समझौता कर लेते है। अज्जप्पा ने सिद्ध किया है कि यदि हम समाज में कुछ बदलाव लाना चाहते है तो वह तभी प्रभावशाली होगी अगर शुरूवात स्वयं से हो।

मूल लेख – श्रेया परीक

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