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लॉकडाउन में बुक-स्टोर हुआ बंद, तो घर पर ही मोती उगाकर कमाए लाखों

लॉकडाउन में बुक-स्टोर हुआ बंद, तो घर पर ही मोती उगाकर कमाए लाखों

राजस्थान के नरेन्द्र इन दिनों पर्ल फार्मिंग की क्लासेज भी ले रहे हैं, जिससे उनकी अतिरिक्त आय भी हो जाती है।

“मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…मेरे देश की धरती”

ये एक बेहद लोकप्रिय फिल्मी गाने के बोल हैं। राजस्थान के किशनगढ़ में एक बुक स्टोर चलाने वाले, नरेंद्र ने कभी सपने में भी सोचा था कि फिल्मी गाने के ये बोल उनके लिए हकीकत बन जाएँगे और वह घर में मोती की खेती करेंगे।

नरेंद्र के परिवार में या उनके दोस्तों में से कोई भी दूर-दूर तक खेती से नहीं जुड़ा है। खेती के नाम पर उन्होंने अपने घर के बागीचे में केवल टमाटर और बैंगन ही उगाए थे। 45 वर्षीय नरेंद्र, बीए की पढ़ाई करने के बाद, पिछले दस वर्षों से अपने पिता के साथ बुक स्टोर चला रहे हैं।

नरेंद्र ने द बेटर इंडिया को बताया कि बचपन से ही उनका रुझान खेती की ओर था और वह जानना चाहते थे कि आखिर  फसलें उगाई कैसे जातीं हैं। वह इससे संबंधित कई कार्यक्रम देखा करते थे। किताब की दुकान पर भी काम करने के दौरान वह यूट्यूब पर खेती से जुड़े वीडियो देखा करते थे। उनके पास ज़मीन नहीं थी इसलिए उन्होंने अपनी इस रूचि को कभी आजमाने के बारे में नहीं सोचा। लेकिन फिर, एक दिन उन्होंने एक वीडियो देखा और उनका नज़रिया बदल गया। वीडियो में बताया गया था कि यह ज़रूरी नहीं कि खेती करने के लिए ज़मीन की ज़रूरत हो। नरेंद्र बताते हैं कि उस वीडियो से वह काफी प्रेरित हुए और उन्होंने सब्जियाँ उगानी शुरू कर दीं।

घर पर वह कुछ फसल उगा कर काफी संतुष्ट थे। फिर उन्होंने मोती की खेती से संबंधित एक वीडियो देखा।

नरेंद्र यह जान कर काफी चकित हुए कि मोतियों को आर्टिफिशिअल तरीके से भी उगाया जा सकता है। उन्होंने मोती की खेती के बारे में जानने के लिए अधिक समय देना शुरू कर दिया। इसमें हाथ न आज़माने का अब उनके पास कोई बहाना नहीं था। उनके पास इच्छाशक्ति थी, जुनून था और अब घर में जगह भी थी। उनके पास जिस चीज़ की कमी थी, वह था मार्गदर्शन।

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नरेन्द्र

सही मार्गदर्शन के लिए, उन्होंने 2017 में भुवनेश्वर के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेशवाटर एक्वाकल्चर (CIFA) से ‘फ्रेश वॉटर पर्ल फार्मिंग फॉर एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट’ पर 5 दिन का कोर्स किया। मोती की खेती में दिलचस्पी रखने वालों को पूरी तकनीकि प्रक्रिया को समझने के लिए नरेंद्र अन्य लोगों को भी इस कोर्स को करने की सलाह देते हैं।

सीआईएफए, एक्वाकल्चर और फिश इम्यूनोलॉजी के सीनियर साइंटिस्ट, डॉ. शैलेश सौरभ भी नरेंद्र की इस बात से सहमत हैं। उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया, “मोती की खेती कुशल तकनीक है, इसलिए सही ज्ञान नहीं होने से भारी नुकसान हो सकता है। यह कोर्स रखरखाव, मोतियों की मसल्स के लिए सही पोषण, शरीर रचना और नूक्लीअस बीड्स पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करता है। साथ ही मेंटल कैविटी, मेंटल टिश्यू जैसे विभिन्न प्लांटेशन विधियों पर ट्रेनिंग भी दी जाती है।”

हर साल सीआईएफए उन छात्रों को सम्मानित करता है जो इस पूरी प्रक्रिया को ज़मीनी स्टार पर पूर्ण करने में सफल होते हैं। डॉ शैलेश ने बताया कि अगले साल मिलने वाले इस सम्मान के लिए नरेंद्र का नाम चुना गया है।  उन्होंने 10 × 10 फीट क्षेत्र में अपना खेत स्थापित करने के लिए 40,000 रुपये का निवेश किया था और हर साल वह 4 लाख रुपये की कमाई करते हैं जबकि रखरखाव पर कोई खास खर्च नहीं करना पड़ता है।

 क्या होती है प्रक्रिया

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मोती की खेती के लिए ज़रूरी प्रक्रिया पूरे करते नरेन्द्र

नरेंद्र दो प्रकार के मोती उगाते हैं, डिज़ाइनर (विभिन्न आकृतियों और डिज़ाइनों पर ढाला हुआ) और गोल, जिन्हें क्रमशः विकसित होने में एक वर्ष और 1.5 वर्ष लगते हैं।

उन्होंने अपने घर में एक आर्टिफिशिअल कंक्रीट तालाब (5-फीट गहरा) बनाया और ज़रूरी सामान, दवाएं, अमोनिया मीटर, पीएच मीटर, थर्मामीटर, दवाएँ, एंटीबायोटिक्स, माउथ ओपनर, पर्ल न्यूक्लियस जैसे उपकरण खरीदे। इसके बाद, उन्होंने मसल्स के लिए भोजन ( गोबर, यूरिया और सुपरफॉस्फेट से शैवाल ) तैयार किया।

शुरुआत में, उन्होंने मुंबई से 1,000 मसल्स का ऑर्डर दिया था। प्रत्येक मसल्स की कीमत 10 रुपये थी।

तालाब में डालने से पहले मसल्स को ताजे पानी में 24 घंटे तक रखा जाता है। तालाब में डालने के बाद, मृत्यु दर कम करने के लिए उन्हें 15 दिनों के लिए भोजन दिया जाता है। एक बार जब उनकी ज़रूरतें स्पष्ट हो जाती हैं, तो नूक्लीअस को सम्मिलित करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

नरेंद्र बताते हैं, “पर्ल न्यूक्लियस को प्रत्येक मसल्स के अंदर सावधानी से डाला जाता है और पानी (15-30 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर) में डुबोया जाता है। मसल्स के भोजन के लिए शैवाल डाला जाता है। एक साल बाद, मसल्स शेल से कैल्शियम कार्बोनेट इकट्ठा कर न्यूक्लियस मोती देती है। न्यूक्लियस इसे कोटिंग की सैकड़ों परतों के साथ कवर करता है जो अंत में उत्तम मोती बनता है।”

जबकि तालाब के रखरखाव में कोई खर्च नहीं आता है लेकिन जल स्तर, मसल्स का स्वास्थ्य, शैवाल की उपस्थिति आदि सुनिश्चित करना पड़ता है और सतर्क रहना पड़ता है।

मृत्यु दर से बचने के लिए नरेंद्र पीएच स्तर 7-8 के बीच रखने की सलाह देते  हैं। वह कहते हैं, “यदि अमोनिया शून्य नहीं है, तो 50 प्रतिशत पानी बदलें या स्तरों को बढ़ाने के लिए चूना जोड़ें। सबसे महत्वपूर्ण बात, आपको एक साल के लिए धैर्य रखना होगा।”

एक बार मोती तैयार हो जाने के बाद, नरेंद्र उन्हें प्रयोगशाला भेजते हैं। गुणवत्ता के आधार पर, एक मोती की कीमत 200 रुपये से लेकर 1,000 रुपये के बीच होती है।

समय के साथ, नरेंद्र ने मोतियों के उत्पादन में सुधार किया है और हर साल लगभग 3,000 मोती का उत्पादन करते हैं। मसल्स की मृत्यु दर भी 70 फीसदी से घटकर 30 फीसदी हुई है।

नरेन्द्र द्वारा उगाये गए मोती

ज्ञान का प्रसार

प्रशिक्षण के महत्व को महसूस करते हुए, नरेंद्र ने हाल ही में मोती की खेती पर कक्षाएँ लेना शुरू किया और करीब 100 लोगों के साथ जानकारी साझा की है जिसमें हर आयु के लोग शामिल हैं।

नरेंद्र बताते हैं कि जब उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू किया तब उनके परिवार ने यह कहते हुए मज़ाक उड़ाया कि घर में मोती उगाना असंभव है। किसी ने उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया। लेकिन वह नहीं चाहते कि दूसरों के साथ भी ऐसा ही हो। नरेंद्र कहते हैं, “मैं नहीं चाहता कि किसी को हतोत्साहित किया जाए। इसलिए मैंने 2 दिनों के वर्कशॉप का संचालन शुरू किया जिसमें सर्टिफिकेट भी दिए जाते हैं। और हाँ, यह मेरे लिए कमाई का एक अतिरिक्त स्रोत भी है।”

नटवर आचार्य, नरेंद्र के एक छात्र हैं। वर्कशॉप के बारे में बात करते हुए नटवर बताते हैं, “शामिल होने से पहले, मैंने सोचा था कि दो दिन पर्याप्त नहीं होंगे। लेकिन नरेंद्र ने हमारे लिए प्रक्रिया को सरल बनाया और धैर्यपूर्वक हमारे सभी प्रश्नों का उत्तर दिया। यह फायदेमंद था और मैं 700 मोती उगा चुका हूँ।”

नरेंद्र के लिए मोती की खेती से होने वाली सबसे अच्छी चीजों में से एक सुरक्षित आजीविका और निरंतर नकदी प्रवाह है।

लॉकडाउन में उनके बुकस्टोर पर आने वाले ग्राहकों की संख्या काफी कम हो गई है। चूँकि मोती की खेती घर पर की जाती है, इसलिए वह इस अवधि का पूरा लाभ उठा रहे हैं और इस रूचि पर अधिक समय दे रहे हैं।

अंत में नरेंद्र कहते हैं, “लॉकडाउन ने मुझे यह समझने का पर्याप्त समय दिया है कि इसे आगे कैसे बढ़ाया जाए और अधिक मोती कैसे विकसित किए जाएँ। मैं निश्चित रूप से अगले साल तक इसे दोगुना करने जा रहा हूँ। जिन लोगों की खेती में रुचि है, मैं उन्हें मोती की खेती करने की सलाह देता हूं, क्योंकि इसमें कम निवेश की आवश्यकता होती है और अधिक रिटर्न मिलता है।”

आप नरेंद्र से 9414519379 या 8112243305 पर संपर्क कर सकते हैं। आप उन्हें nkgarwa@gmail.com पर भी संदेश भेज सकते हैं।

मूल लेख- GOPI KARELIA

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पूजा दास

पूजा दास पिछले दस वर्षों से मीडिया से जुड़ी हैं। स्वास्थ्य और फैशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित तौर पर लिखती रही हैं। पूजा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है और नेकवर्क 18 के हिंदी चैनल, आईबीएन7, प्रज्ञा टीवी, इंडियास्पेंड.कॉम में सक्रिय योगदान दिया है। लेखन के अलावा पूजा की दिलचस्पी यात्रा करने और खाना बनाने में है।
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