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एक दर्जन से ज़्यादा कर्मचारी, लाखों का टर्नओवर – कहानी राजनांदगांव के टीकम पोहा वाले की!

प सभी ने कुछ दिनों पहले पुणे के येवले टी हाउस के बारे में पढ़ा होगा, सुना होगा कि एक चाय वाला महीने के 12 लाख रुपये कमाता है और बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार भी प्रदान कर रहा है, कुछ ऐसी ही कहानी है छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के टीकम साहू की! वो कहते है न हुनर और मेहनत शहर और गांव की मोहताज नहीं होती I टीकम पोहे वाला, जिसे गठुला पोहे, राजनांदगांव के नाम से भी जाना जाता है, इसी कहावत को साकार करते हैं।

संघर्ष में बिता टीकम साहू का बचपन

टीकम साहू का बचपना बेहद ग़रीबी में बीता, अपने पिता के साथ बचपन में खेती-किसानी करते और साथ में स्कूल की पढ़ाई भी करते। आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के कारण बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। घर ख़र्च और अपने भाइयों की स्कूल की फ़ीस के लिए टीकम ने महज़ ₹200 प्रति माह में एक मेडिकल शॉप में नौकरी कर ली! ये दिन तो किसी तरह बीत गए पर टीकम अब कुछ अपना काम करना चाहते थे।

राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ से 5 किलोमीटर की दुरी पर एक छोटा सा गांव है – गठुला, 15 साल पहले टीकम ने वहां एक छोटे से पान ठेले की शुरुआत की, उन दिनों पान ठेले से ज़्यादा आमदनी तो नहीं होती थी लेकिन घर खर्चे का बंदोबस्त हो जाता था I जब भी कोई राहगीर, मजदूर या फिर कोई धन्ना सेठ पान ठेले में रुकता तो जरूर पूछता था कि भाई साहब आस – पास अच्छा गरम नाश्ता कहा मिलेगा लेकिन अच्छी नाश्ते की दुकान न होने के कारण टीकम कुछ नहीं कहताI

इस बात को अवसर मानकर टीकम ने गरम पोहा बनाना शुरू किया और लोगों को गर्म पोहे का स्वाद पसंद आने लगा I पोहे की बिक्री से आमदनी तो बढ़ी और टीकम को संतुष्टि भी मिलने लगी I

कई बार तो विशेष रूप से शहर से लोग चलकर आते गठुला का पोहा खाने लेकिन सन 2000 में उभरते हुए इस व्यवसाय को एक बड़ा धक्का लगा, निगम के अतिक्रमण के तहत उस छोटे से टपरी को क़ानूनी तरीके से तोड़ दिया गयाI

दुकान का टूटना टीकम के लिए बहुत बड़ी क्षति थी लेकिन फिर भी टीकम ने चुनौतियों के आगे घुटने नहीं टेके, अपनी थोड़ी सी जमा -पूंजी से टीकम ने पास ही में एक दुकान खरीदी और फिर से पोहे का व्यवसाय शुरू किया।

धीरे – धीरे इस छोटे से गांव का पोहा आस पास के इलाको में प्रसिद्ध हो गया और लोग रायपुर, दुर्ग, खैरागढ़, कवर्धा से आने लगे। इसके बाद टीकम ने कभी पलट कर नहीं देखा ! वर्तमान में टीकम अपने भतीजे हेमलाल के साथ इस होटल का संचालन करते है एवं 15 से ज़्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करते है I समय की मांग के अनुसार अब टीकम पोहे के साथ साथ समोसा, आलू भजिया, मुंग बड़ा आदि नाश्ता भी बनाते है I पोहे सेंटर का बखूबी संचालन कर टीकम ने पैसा और इज़्ज़त के साथ-साथ लोगों का प्यार भी कमाया I

एक-एक करके टीकम साहू ने 15 साल के भीतर में टीकम मेडिकल, टीकम स्वीट्स, टीकम ट्रेवल्स एवं टीकम रेस्टोरेंट की शुरुआत की और व्यापार जगत में निरंतर प्रगति करते चले गए I

टीकम साहू अपनी दूकान पर !

अपने संघर्ष के बारे में बात करते हुए टीकम, ‘द बेटर इंडिया’ को बताते  है, “इन 17 सालों के संघर्ष यात्रा में मैंने बहुत उतार- चढ़ाव देखे है लेकिन अपना मनोबल कभी कमजोर नहीं होने दिया I सुबह 5 बजे दुकान खोलना तथा रात 11 बजे बंद करना, प्रतिदिन 18 घंटे की इस मेहनत ने मेरे सपनो को पूरा किया हैI”

हाई टेक है टीकम पोहा

टेक्नोलॉजी के इस युग में टीकम ने कदम ताल करते हुए अपने होटल में ग्राहकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 9 सीसीटीवी कैमरा लगवाया है तथा पेमेंट हेतु पेटीएम , भीम एवं अन्य डिजिटल ट्रांज़ाक्षण की सुविधा भी उपलब्ध है I

राजनांदगांव के सांसद अभिषेक सिंह ने 8 फरवरी को लोकसभा में केंद्र सरकार के बजट पर बोलते हुए राजनांदगांव के ग्राम गठुला में स्थित टीकम होटल का उल्लेख भी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गठुला के टीकम साहू ने कम राशि में पान ठेला और होटल का व्यवसाय शुरू किया था और आज एक दर्जन से ज़्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया है।

टीकम कहते है,” यह सफलता मेरे अकेले की नहीं है, इस चुनौती भरी यात्रा में मेरे भतीजे हेमलाल ने हर वक़्त साथ दिया, मेरा परिवार जिसने बुरे समय में भी संयम रखा और मुझ पर विश्वास जताया।”

 टीकम साहू के अनुभव

1. अपने ऊपर विश्वास रखिए और निरंतर आगे बढ़ते रहिए ।

2. मन में यह विश्वास ज़रूर होना चाहिए कि मैंने जो सपना देखा है उसे मैं पूरा कर सकता हूँ ।

3. काम यदि आपकी रूचि के अनुसार होता है तो आप उसमें अपना 100 प्रतिशत देते हैं। इस दुनिया में कोई काम छोटा नहीं होता, छोटी होती है तो इंसान की मानसिकता । मैंने पोहा बेचकर एक सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश की है।

यह टीकम साहू एवं उनके भतीजे हेमलाल साहू की मेहनत का ही अंजाम है कि आज सफलतापूर्वक वे अपने व्यवसाय का संचालन कर रहे है। टीकम साहू का जीवन उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो किसी काम को छोटा कहकर छोड़ देते है, काम कोई छोटा नहीं होता बस सोच बड़ी होनी चाहिए। लाखों का टर्नओवर, एक दर्जन से ज़्यादा कर्मचारी और निरंतर सफलता इस बात का उदहारण है कि सारा खेल सोच और जूनून का है।

संपादन – मानबी कटोच

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Written by जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर के छात्र हैं. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना , इतिहास पढ़ना एवं समझना.

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