Search Icon
Nav Arrow

कैंटीन से लेकर चप्पल और मसाला फैक्ट्री तक संभाल रही हैं इन गांवों की महिलाएं!

कोरोना लॉकडाउन में प्रशासन ने गरीब परिवारों को जो राशन किट वितरित किया, उन्हें इन महिलाओं के गृह उद्योग द्वारा ही तैयार किया गया था!

Advertisement

राजस्थान के चुरू जिला की ग्रामीण महिलाएं राजस्थान आजीविका मिशन के तहत आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं। चुरू कलेक्ट्रेट की कैंटीन को संभालने के साथ-साथ महिलाएं चप्पल बनाने की फैक्ट्री, ढ़ाबा और मसाला प्लांट भी अच्छे से संभाल रही हैं।

कलेक्ट्रेट परिसर में इन महिलाओं ने जैविक सब्ज़ियां उगाना भी शुरू किया है। राजीविका डिस्ट्रिक्ट प्रोजेक्ट मेनेजर बजरंग लाल सैनी के मुताबिक, यह सब जिलाधिकारी संदेश नायक की पहल से संभव हो पाया है।

आईएएस नायक ने ही महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को गृह उद्योगों से जोड़ने की शुरूआत की ताकि महिलाओं को रोज़गार के अच्छे अवसर प्राप्त हों। जिला के हर गाँव में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह पहले से ही बने हुए थे, जिनसे जुड़ी हुई महिलाएं कुछ बचत करती थी। लेकिन जिलाधिकारी ने फैसला किया कि महिलाओं को आत्म-निर्भर बनाकर उनमें उद्यमशीलता का गुण विकसित किया जाए। ग्रामीण महिलाओं में हुनर की कोई कमी नहीं होती है अगर ज़रूरत है तो सिर्फ सही मौकों और मंच की।

उनके इस अभियान की शुरूआत हुई कलेक्ट्रेट की कस्तूरबा कैंटीन को फिर से खोलने से। बजरंग सैनी कहते हैं कि कलेक्ट्रेट ऑफिस की कैंटीन पिछले कई सालों से बंद पड़ी थी। आईएएस नायक ने इस कैंटीन को फिर से चालू करने की ज़िम्मेदारी महिलाओं को सौंपी। करीब छह महीने पहले भैरूसर गाँव के जय श्रीराम स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने इस कैंटीन को चलाने की चुनौती स्वीकार की।

IAS Sandesh Nayak along with women

ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर, शिवानी भटनागर ने बताया, “फ़िलहाल, इस कैंटीन में 25 महिलाएं कार्यरत हैं। चाय-कॉफ़ी से लेकर ब्रेकफास्ट-लंच आदि बनाने का काम महिलाएं करतीं हैं और अलग-अलग विभागों में अफसरों और अन्य कर्मचारियों को महिलाएं ही सर्व करके आती हैं।”

कस्तूरबा कैंटीन के अलावा और भी बहुत-सी पहल प्रशासन ने की हैं। इनमें हैंडीक्राफ्ट शॉप, चप्पल बनाने की फैक्ट्री, ढाबा, मसाला प्लांट, और जैविक नर्सरी शामिल हैं। राजीविका गृह उद्योग से 800 से भी ज्यादा महिला समूह जुड़े हुए हैं। लगभग 10 हज़ार ग्रामीण महिलाएं इन समूहों का हिस्सा हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से इन सभी महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरी है।

कस्तूरबा प्रोडक्ट कॉर्नर संभालने वाली वाली अंजू बताती हैं, “हम अलग-अलग गाँव के महिला समूहों से उनके बनाए हुए हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स जैसे सजावट के सामान, सिलाई-कढ़ाई किए हुए कपड़े खरीदते हैं और फिर उचित दर पर इन सभी प्रोडक्ट्स को बाज़ारों तक पहुंचाया जाता है। इस हैंडीक्राफ्ट दुकान को शुरू करने के पीछे का उद्देश्य हमारी महिलाओं के हुनर को सही पहचान और सही बाज़ार दिलाना है। पहले महिलाओं को अपने उत्पाद ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए बहुत परेशानियां उठानी पड़ती थीं, खुद दुकानदारों से मोल-भाव करो और फिर उतना दाम भी नहीं मिलता था। लेकिन अब प्रशासन की मदद से यह बहुत ही आसान हो गया है।”

Rajivika Gruh Udyog

उन्होंने आगे बताया कि राज्य में होने वाले आयोजनों और प्रदर्शनियों में भी इस समूह के प्रोड्क्ट्स को शामिल किया जाता है। साथ ही, कलेक्ट्रेट में काम करे वाले बहुत से कर्मचारी भी महिलाओं द्वारा चलाई जा रही इस हैंडीक्राफ्ट शॉप से चीजें खरीदते हैं। इसके अलावा, महिलाओं का मसाला प्लांट भी काफी मशहूर है।

शिवानी ने बताया का पिछले साल राजीविका गृह उद्योग के नाम से एक फैक्ट्री शुरू की गयी। इस फैक्ट्री में हवाई चप्पलें, मसाले और दालें बन रही हैं। यह सभी काम महिलाएं ही संभाल रही हैं। इस गृह उद्योग से जुड़ीं किरण बताती हैं कि इस फैक्ट्री को शुरू करने के लिए 120 महिलाओं ने मिलकर 5-5 हज़ार रुपये का निवेश किया था। आज इसी फैक्ट्री से लगभग 5000 महिलाएं नियमित आजीविका कमा रही हैं। महिलाएं दो हज़ार से लेकर 8 हज़ार रुपये तक की कमाई कर रही हैं।

किरण ने बताया, “हमारे महिला समूह तो काफी दिन से थे लेकिन यह फैक्ट्री शुरू होने के बाद बहुत बदलाव आया है। अब हमें जब महीने के इकट्ठे 5-6 हज़ार रुपये मिलते हैं तो घर के काफी खर्च साधना आसान हो गया है। बच्चों की पढ़ाई में मदद हो रही है और थोड़ी-बहुत बचत भी हो जाती है। पहले तो स्थिति बहुत ही खराब थी। गाँव की बहुत सी महिलाएं तो बाहर शहर में मजदूरी करने जाती थीं। पर कलेक्टर सर ने यह गृह उद्योग लगवाकर हमें घर के घर में काम दे दिया।”

किरण बताती हैं कि हवाई चप्पल बनाने का काम 15 महिलाएं संभाल रही हैं। वहीं मसाले और दालों के लिए अलग-अलग महिलाओं को नियुक्त किया गया है। फ़िलहाल, सभी सूखे मसाले बाहर से मंगवाए जाते हैं और उन्हें यह महिलाएं तैयार करके बाज़ारों के लिए भेजती हैं। लेकिन कुछ समय पहले प्रशासन ने जैविक खेती भी शुरू करवाई है। खेती की इस परियोजना के तहत महिलाओं को जैविक खेती की ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि महिलाएं खुद मिर्च-हल्दी जैसी फसलों की खेती करें। फिर इन्हीं किसान महिलाओं से मसाला उद्योग के लिए फसल ली जाएगी।

Advertisement

“हमारे इलाके में मुंग और मोठ दालें ज्यादा होती हैं। जो भी ग्रामीण परिवार इन दालों की खेती करते हैं, उनसे प्रशासन द्वारा दालें खरीदी जाती हैं। फिर गृह उद्योग की महिलाओं को यही दालें 5 रुपये प्रति किलो दर पर प्रोसेसिंग के लिए दी जाती हैं। महिलाएं इन्हें प्रोसेस करके ग्राम संगठनों तक पहुंचाती हैं,” उन्होंने आगे कहा।

रतनगढ़ ब्लॉक में 76 ग्राम संगठन हैं और हर एक संगठन में राजीविका दूकान खुलवाई गई है। इस दुकान को चलाने के लिए महिलाओं को ही प्रेरित किया गया। चप्पलें, दालें और मसाले फैक्ट्री से ग्राम संगठन पहुंचाए जाते हैं। वहां से ग्राम संगठन अपना मार्जिन रखकर सही दर पर स्कूलों को मिड-डे मील के लिए दाल और मसाले उपलब्ध करा रहा है।

शिवानी बताती हैं लॉकडाउन के दौरान भी प्रशासन ने गरीब मजदूर परिवारों को जो राशन किट बांटी, वह इसी गृह उद्योग की महिलाओं ने तैयार की थीं। साथ ही, जैविक खेती पर उन्होंने जो मुहिम शुरू की थी, उसका भी काफी सकारात्मक प्रभाव दिखा है इस लॉकडाउन में। महिला स्वयं सहायता समूह की सुमन बताती हैं कि उन्होंने अपने घर में जैविक सब्ज़ियां बोई थीं और अब उन्हें सब्जियों के लिए कोई परेशानी नहीं हो रही है।

यह चुरू प्रशासन के प्रयासों का ही कमाल है कि पिछले एक साल में इस इलाके में महिलाओं की स्थिति काफी सुधरी है। रोज़गार के साथ-साथ अब उन्हें पहचान और सम्मान भी मिल रहा है। किरण और उनके जैसी हज़ारों महिलाओं के घर की आर्थिक तंगी खत्म हुई है। आपातकालीन स्थिति में, महिलाओं को किसी परेशानी का सामना न करना पड़े इसके लिए ‘आपदा नियत्रंण फंड’ भी शुरू किया गया है। हर एक महिला से सालभर के 10 रुपये इस फंड के लिए लिए जाते हैं। यदि किसी भी महिला को किसी ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा की ज़रूरत है तो उसके लिए पैसे इस फंड से दिए जाते हैं।

बेशक, चुरू जिले में महिला सशक्तिकरण का यह बेहतरीन उदहारण है। यदि प्रशासन पहले से ही उपलब्ध साधनों में रोज़गार उत्पन्न करे तो कोई भी ग्रामीण महिला खाली हाथ नहीं बैठेगी। हम उम्मीद करते हैं कि ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे!

यह भी पढ़ें: जानिए कैसे घर में ही लगा सकते हैं अपना चटनी गार्डन!

यदि आप इस विषय में और अधिक जानकारी चाहते हैं तो आप राजीविका की ब्लॉक परियोजना प्रबंधक, शिवानी भटनागर से bpmratangarh@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं!


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

Advertisement
close-icon
_tbi-social-media__share-icon