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IAS अफसर ने 21 महीनों में 137 जलाशयों को दिया नया जीवन, लखीमपुर को मिला ISO सर्टिफिकेशन

अपने सब डिविशन के लिए 2 प्रमाणपत्र हासिल करने वाले अरुण कुमार लखीमपुर को मॉडल तहसील के रूप में विकसित करने के लिए प्रयासरत हैं।

त्तरप्रदेश के लखीमपुर तहसील के विकिपीडिया पेज पर आज भी एक ऐसे सूखे झील की तस्वीर है, जिसका आधे से ज़्यादा हिस्सा रेग और काई से भरा हुआ है। वैसे, आज से दो साल पहले अगर लखीमपुर का परिचय मृत झीलों, तालाबों व जलाशयों के घर के रूप में दिया जाता तो वो गलत नहीं होता।

लेकिन आज यह स्थिति बिलकुल बदल चुकी है। आज यह तहसील 137 पुनर्जीवित जलाशयों व लहलहाते पेड़-पौधों का घर बन चुका है। और यह मुमकिन कर दिखाया है यहाँ के मौजूदा एसडीएम आईएएस अफसर अरुण कुमार सिंह ने!

पर्यावरण के लिए की गयी इनकी पहल के कारण आज लखीमपुर ऐसा पहला तहसील बन पाया जिसे प्रतिष्ठित ISO:14001 सर्टिफिकेशन प्राप्त हुआ है। (ISO: 14001 एक अंतराष्ट्रीय मानक है जो एक प्रभावी पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली के लिए आवश्यकताओं को निर्दिष्ट करता है)

Receiving the ISO 14001 certificate

द बेटर इंडिया के साथ बात करते हुए अरुण कुमार सिंह ने जलाशयों को पुनर्जीवित करने, ऊर्जा संरक्षण करने, बारिश के पानी को संचित करने और वृक्षारोपण से जुड़े हुए अपने प्रयासों के बारे में बात की।

तालाब खोजो, तालाब बचाओ

अरुण बताते हैं, “एक समय था जब लखीमपुर तहसील में 9 हज़ार से अधिक तालाब व झील दो प्रमुख नदियों- घाघरा व शारदा से जुड़ते थे। करीब 21 महीने पहले जब मैं यहाँ आया, तब यह आँकड़ा काफी हद तक घट चुका था, इतना कि गर्मी के दिनों में पानी की कमी होना एक आम बात बन चुकी थी। विभाग में हमने 1951 तक के रिकॉर्ड की जांच की ताकि अतिक्रमित सूखे हुए जलाशयों की पहचान की जा सके और तभी 9 हज़ार का आंकड़ा सामने आया।”

सारे जलाशयों को जीवित करना असंभव था, पर सिंह ने एक बड़ी योजना बनाई और उसे पूरा कर दिखाने की ठानी  – तालाब खोजो, तालाब बचाओ।

अरुण सिंह के आने से पहले यहाँ के तहसील ऑफिस में बंदरों का वास था। ऐसे हालातों में इतना बड़ा मिशन पूरा करना आसान काम तो नहीं था।

पिछले दो दशको में अधिकतर अतिक्रमण का कारण था – शहर की ओर बढ़ता रुझान। यहाँ के झील, जो कभी हर साल सर्दियों में प्रवासी पक्षियों का स्वागत किया करती थी, अब बंजर धरती की तरह पड़ी थी। यहाँ के जलाशय और आसपास के इलाकों का पूरा इको-सिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

अरुण कुमार सिंह के काम के आगे ऐसी कई चुनौतियाँ थी।

सिंह ने सबसे पहले उन फाइलों की बारीकी से छानबीन की, जिनमें ज़मीन के निजी पट्टों के रिकॉर्ड थे। इनमें से कई ज़मीनें ऐसी थी, जो पहले नदी, तालाब या झीलें हुआ करती थी। एक बार जब इन ज़मीनों का पता चल गया, तो सिंह ने इन्हें दुबारा इनका मूल-रूप देने के लिए एक विस्तृत प्लान बनाया।

हर स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की गयी

A lake after revival
A lake after revival

अरुण का पहला कदम था कृषि व जल विभाग के काम को सुव्यवस्थित करना। उन्होंने ‘तालाब खोजो, तालाब बचाओ’ (TKTB ) टीम बनाई की,  जिसमें उच्च पदाधिकारी, स्थानीय परिषद के सदस्य, पंचायत नेता और नागरिक प्रतिनिधि भी शामिल थे। हर शुक्रवार यह टीम काम कि गति, भविष्य की योजनाओं पर मंथन और जलाशयों को फिर से जीवित करने  पर चर्चा करने के लिए मिलती थी।

सिंह बताते हैं, “जगह की पहचान करने के बाद हम मानक मापदंडो के अनुसार अतिक्रमण की मात्रा मापते हैं और फिर आवास या अन्य कारणों से किए गए अतिक्रमण को रोकने के लिए कानूनी नियमों का पालन करते हैं। इसके बाद, गांववालों को खुदाई करने, मिट्टी हटाने और तालाबों की खोयी रौनक वापस लाने में लगा देते हैं। इस तरह हमने 64 एकड़ क्षेत्र के 137 जलाशयों को दुबारा जीवन दिया है।”

इस मिशन पर खेरी के चीफ़ डेव्लपमेंट ऑफिसर अवतार सिंह बताते हैं, “लखीमपुर तहसील के जलाशयों को समुदाय की भागीदारी के साथ पुनर्जीवित किया गया। गांववालों ने खुद ही मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) योजना के तहत मजदूरों की कमी को पूरा कर दिया। सैंकड़ों लोगों ने पैसे तो कमाए ही, साथ ही, अपनी जन्मभूमि के प्राकृतिक संसाधनो का संवारा भी।”

अवतार सिंह बताते है, “लखीमपुर के अंदर के इलाकों में हमने पूरी तरह सूख चुके तालाबों को पुनर्जीवित कर दिया है। झीलों के आस-पास के उपनगरीय क्षेत्रों में हमने पैदल चलने के लिए पगडंडियां और पार्क बनाए हैं। जो नदियां, कभी खाई बन गयी थी, उन्हें हमने सिंचाई के लिए नाले में परिवर्तित कर दिया है।”

‘तालाब खोजो तालाब बचाओ’ मिशन में समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए अरुण अब लखीमपुर के जलाशयों के नामों के पीछे के इतिहास और लोक साहित्य को इकट्ठा करने में जुटे हैं। उनका मानना है, “अगर लोगों को इसके साहित्यिक पहलू से जोड़ा जाए, तो वे इस काम में ज़्यादा  जोश से सहयोग देंगे और इसे अगले स्तर पर ले जाएँगे।”

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ऑफिस में जल, ऊर्जा व कागज की बचत

ISO:14001 के मानचित्र पर आने का कारण केवल तालाब पुनर्जीवन ही नहीं था। सिंह ने कई ऊर्जा-बचत व जल-बचत नीतियों को अपने कार्यालय में अनिवार्य बनाया है।

“बहुत ज़्यादा बिजली की खपत करने वाले पुराने लाइट और पंखों के बदले हम एलईडी बल्ब, पंखे और दुसरे ऐसे बिजली के उपकरणों का प्रयोग करने लगे हैं जो ऊर्जा बचाते हैं। हमने कार्यालय के अंदर ऊर्जा बचाने का समर्थन किया ; जैसे दिन में सूर्य की रोशनी में काम करना या कार्यालय से निकलते समय पंखे बंद करना।”

लखीमपुर का तहसील कार्यालय अब पूरी तरह डिजिटल होने की कगार पर है, जिससे कागज़ का प्रयोग कम हो रहा है।  साथ ही, काम की गति और दक्षता भी बढ़ रही है।

पानी जमा करने के लिए रेन वॉटर हार्वेस्टिंग यूनिट (RWH) को ऑफिस के कैम्पस में लगाया गया है और इस इलाके के सारे घरों में इसे अपनाने का निर्देश दे दिया गया है।

सिंह बताते हैं, “जो गाँववाले पहले को घर में RWH लगाने के बारे में संशय में थे, वो अब यह देखकर प्रभावित हो गए हैं कि कैसे हमने पानी की बर्बादी पर रोक लगाई है और इस क्षेत्र के भूजल स्तर को बढ़ाया है। आज हर घर अपनी इच्छा से RWH यूनिट लगवा रहा है।”

तराई क्षेत्र में बसा लखीमपुर ग्रीन बेल्ट होने के कारण पर्यावरण को प्रदूषण से दूर रखने में सफल हो पाया है। अरुण कुमार सिंह अब हर बंजर ज़मीन पर वृक्षारोपण का आयोजन करने में लगे हैं, जिससे इस ग्रीन बेल्ट को और बढ़ाया जा सके।

एक साल पहले ISO:9001 सर्टिफिकेशन प्राप्त करना

पिछले साल प्रबंधन में गुणवत्ता व नागरिकों के मुद्दों के सफल निवारण के लिए लखीमपुर को ISO:9001 का सर्टिफिकेशन मिला। यह अरुण कुमार सिंह द्वारा सार्वजनिक कार्यालयों में किए गए बदलावों के कारण ही संभव हो पाया।

तहसील ऑफिस अंदरूनी इलाके में स्थित होने के कारण गाँववालो को ऑफिस खोजने में परेशानी हुआ करती थी। ऑफिस के अंदर भी काम के विभाजन और सही समय सीमा का अभाव था, जिससे परेशानी बढ़ जाती थी। ज़्यादातर लोग अपनी परेशानी बताने के लिए सही अधिकारी को खोज नहीं पाने के कारण निराश होकर वापस लौट जाते थे। कई अधिकारी भी अपने दायित्वों को पूरा नहीं करते थे, जिससे आम जनता के लिए स्थिति और खराब हो जाया करती थी।
अरुण कुमार सिंह की नियुक्ति के बाद, उन्होंने जनता के बैठने की व्यवस्था करवाई, जिससे उन्हें चिलचिलाती गर्मी या बारिश में लाइन में लगने की ज़रूरत न पड़े। इसके बाद उन्होंने हर एक विभाग के अधिकारियों के लिए अलग-अलग ड्रेस कोड रखा ताकि उन गाँववालों को उन्हें पहचानने में परेशानी न हो, जो पढ़-लिख नहीं सकते।

ऑफिस के डिजिटल होने के बाद काम भी तेज़ी से हो रहा है। पहले जिस फ़ाइल को तैयार करने में 15 दिन से एक महीना लग जाया करता था, आज उन्हें तुरंत तैयार कर दिया जाता है।

सिंह बताते हैं, “अब लोग तहसील कार्यालय की कार्य क्षमता की प्रशंसा ही करते हैं। इसी तरह हमने ISO:9001 सर्टिफिकेशन हासिल किया है।”

अपने सब डिविशन के लिए 2 प्रमाणपत्र हासिल करने वाले अरुण कुमार लखीमपुर को मॉडल तहसील के रूप में विकसित करने के लिए प्रयासरत हैं।

जनता की सेवा करते रहने को इच्छुक अरुण का कहना है, “प्रमाणपत्र हमारे दायित्वों को बढ़ाता है और हम उम्मीद करते हैं कि हम बेहतर काम करने के क्रम को जारी रखेंगे।”

मूल लेख – सायंतनी नाथ

संपादन – मानबी कटोच


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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहिणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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