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800+ गरीब और ज़रूरतमंद महिलाओं को सिक्योरिटी गार्ड बनने की ट्रेनिंग दे रही है यह उद्यमी!

पहले ग्रामीण महिलाओं के सवाल होते थे, ‘कोई और काम नहीं है क्या? यह तो मर्दों का काम है? पैंट-शर्ट कैसे पहनेंगे, आप साड़ी दे दो?’ लेकिन आज यही महिलाएं अपनी यूनिफॉर्म पहनने में गर्व महसूस करतीं हैं!

Entrepreneur training women

“एक स्त्री अगर कुछ करने की ठान ले तो उसे कोई सीमा नहीं रोक सकती। क्योंकि, हम औरतें खुद अपनी सीमा होते हैं,” यह कहना है हुबली स्थित सेफ हैंड्स 24×7 की फाउंडर श्रावणी पवार का।

अपने इस स्टार्टअप के ज़रिए श्रावणी समाज के गरीब और दबे हुए तबके से आने वाली महिलाओं को प्रोफेशनल सिक्योरिटी गार्ड बनने की ट्रेनिंग दे रहीं हैं। ट्रेनिंग के बाद इन महिलाओं को अलग-अलग जगह पर जॉब भी दिलाई जाती है।

एक औरत का सिक्योरिटी गार्ड होना बहुत से लोगों को शायद अटपटा लगे। क्योंकि हमारे समाज ने पहले से ही निर्धारित कर रखा है कि कुछ काम सिर्फ मर्दों के लिए हैं और बात सुरक्षा की हो तो एक महिला कैसे करेगी? महिलाओं को तो खुद सुरक्षा की ज़रूरत होती है। लेकिन श्रावणी का मानना है कि अगर एक महिला को सही मार्गदर्शन और ट्रेनिंग मिले तो वह किसी की भी सुरक्षा कर सकती है।

कर्नाटक के हुबली में पली-बढ़ी 33 वर्षीय श्रावणी पवार को बचपन से ही समाज के लिए कुछ करना था। उन्होंने सोशल वर्क में अपनी पढ़ाई की और फिर कुछ महीनों के लिए एक एनजीओ के साथ काम किया। यह एनजीओ किसान परिवारों के लिए काम करता था और यहाँ पर श्रावणी का काम ग्रामीण महिलाओं को जोड़ एक सेल्फ-हेल्प ग्रुप बनाने का था।

इस काम के दौरान उन्होंने ग्रामीण और दबे हुए तबकों से आने वाली महिलाओं की ज़िंदगी को करीब से जाना और समझा। ये महिलाएं घर हो या खेत, हर जगह मेहनत करने में पुरुषों से ज्यादा भूमिका निभातीं हैं। लेकिन जब बात किसी अहम फैसले की हो तो उन्हीं महिलाओं की भूमिका एकदम ना के बराबर हो जाती है।

इसका सबसे बड़ा कारण है उनका दूसरों पर निर्भर होना। श्रावणी इन महिलाओं को आत्म-निर्भर बनाना चाहतीं थीं ताकि उन्हें उनकी मेहनत का सही मोल और सम्मान मिले।

Woman Entrepreneur
Shravani Pawar

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया, “मैंने कुछ महीने एनजीओ के साथ काम किया और फिर देशपांडे फाउंडेशन की ‘सोशल इंटरप्रेन्योरशिप’ पर एक फ़ेलोशिप जॉइन की। इस फ़ेलोशिप के अंत में मुझे अपने स्टार्टअप के लिए एक आइडिया देना था और बहुत सोच-विचारने के बाद मैंने सिक्योरिटी के क्षेत्र में कुछ करने की सोची।”

श्रावणी ने सबकी सोच से परे जाकर ऐसा कुछ करने का सोचा, जो शायद पहले कभी भी किसी ने नहीं किया था। उन्होंने तय किया कि वे महिलाओं की इस पुरुष-प्रधान प्रोफेशन में एक जगह और पहचान बनाएंगी। हालांकि, उनकी यह राह बिल्कुल भी आसान नहीं थी।

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वह बताती हैं कि जब उन्होंने यह आइडिया दिया तो उनकी और दो साथी थीं। जिनमें से एक ने स्टार्टअप के रजिस्ट्रेशन से पहले ही अपने कदम वापस ले लिए और दूसरी ने, एक साल बाद संगठन छोड़ दिया। लेकिन श्रावणी ने हार नहीं मानी। अपने सपने को सच करने के लिए उन्होंने अपने परिवार और समाज, दोनों से जंग लड़ी और आज वह पूरे भारत की महिलाओं के लिए मिसाल हैं।

साल 2009 में उन्होंने अपने संगठन की नींव रखी और तब उनके साथ मुश्किल से 6 लड़कियां थीं। लेकिन आज यह संगठन 800 से ज्यादा महिलाओं को सिक्योरिटी गार्ड की ट्रेनिंग दे चुका है। उनके यहाँ महिलाएं कंपनियों, सोसाइटी, कॉलेज, यूनिवर्सिटी आदि के लिए दिन में सिक्योरिटी गार्ड का काम करतीं हैं। रात में सिक्योरिटी सर्विस के लिए उन्होंने कुछ लड़कों को ट्रेन किया है। इसके अलावा, वे हाउसकीपिंग सर्विस भी देते हैं।

Women Security Guard

अपने सफ़र के बारे में बताते हुए, वह कहती हैं कि शुरुआत में बहुत परेशानियाँ हुईं। महिलाओं को और उनके परिवारों के साथ-साथ क्लाइंट्स को समझाना भी बहुत मुश्किल था। महिलाओं के सवाल होते थे, ‘कोई और नौकरी नहीं है क्या? हम लड़कियाँ कैसे यह काम कर पाएंगी? हम पैंट-शर्ट नहीं पहन सकते, आप साड़ी दे दो?’ वहीं दूसरी ओर, कंपनियां सवाल करतीं थीं कि औरतों के भरोसे कैसे छोड़ सकते हैं? आदमियों के जितना अच्छा कर पाएंगी क्या?

“मैंने हर एक क्लाइंट से यही कहा कि आप सिर्फ एक महीने के लिए सर्विस लें और अगर आपको सही न लगे तो हम आपके यहाँ किसी आदमी सिक्योरिटी गार्ड को भेज देंगे। दूसरी तरफ, महिलाओं को और उनके परिवारों को मनाना बहुत ही मुश्किल काम रहा। जब हमारे यहाँ से कुछ महिलाओं ने ट्रेनिंग लेकर अच्छी जगह नौकरी करना शुरू किया, तब जाकर कहीं और महिलाएं हमसे जुड़ीं,” उन्होंने कहा।

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उनके यहाँ महिलाओं को रजिस्टर मेन्टेन करने से लेकर आत्म-सुरक्षा के गुर भी सिखाए जाते हैं। साथ ही, उनकी रेग्युलर काउंसलिंग होती है ताकि उन पर कोई मानसिक दबाव न हो। इन सभी महिलाओं को यह ट्रेनिंग मुफ्त में दी जाती है।

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प्रोफेशनल क्षेत्र में तो श्रावणी हर दिन नई समस्या से लड़ ही रही थीं। निजी जीवन भी उनके लिए संघर्ष से कम नहीं था। वह कहतीं हैं कि उन्होंने अपने घर में पहले एक साल तक किसी को नहीं बताया कि उनका ऐसा कोई स्टार्टअप है। एक साल बाद, जब उनकी पार्टनर ने संगठन छोड़ा, तब उन्होंने अपने माता-पिता को बताया।

“बहुत नाराज़ हुए थे वो लोग और मुझे कहा कि यह सब करने की क्या ज़रूरत है? 9 से 5 की नौकरी करो और आराम से रहो। लेकिन मेरा पैशन था कि मैंने कभी भी इस काम को छोड़ने का नहीं सोचा बल्कि मुझे जिद थी कि और महिलाएं हमसे जुड़ें। लेकिन मेरे माता-पिता ने बिल्कुल मना कर दिया था तो मैंने अपना सामान उठाया और हुबली आ गई,” उन्होंने कहा।

लगभग 6-7 महीने बाद, उनके भाई उनसे मिलने आए और कहा कि उन्हें उनके काम से कोई समस्या नहीं हैं। बस वह घर आ जाएं। उन्हें अपने काम का पैशन इतना था कि उन्होंने शादी न करने का मन बना लिया था। लेकिन फिर उन्हें अपनी ही तरह की सोच रखने वाला इंसान मिला और आज उनका एक हंसता-खेलता परिवार है।

श्रावणी की पहल से आज इन सभी महिलाओं के घरों की स्थिति भी सुधर रही है। वह बताती हैं कि उनके साथ जुड़ी हुई हर एक महिला को हेल्थ इंश्योरेंस और पीएफ जैसे सभी फायदे मिलते हैं। अब कोई भी आपातकालीन स्थिति हो उन्हें इधर-उधर भागने की ज़रूरत नहीं पड़ती। उन्हें खुद एक सिक्योरिटी मिल रही है।

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सिक्योरिटी गार्ड के बाद उन्होंने हाउसकीपिंग की सर्विस भी शुरू की। अपने यहाँ महिलाओं को प्रोफेशनल ट्रेनिंग देकर वे उन्हें कमर्शियल क्षेत्रों में जॉब दिलाती हैं। जो महिलाएं शुरू में यूनिफार्म पहनने में झिझकती थीं, आज उन्हें खुद पर गर्व होता है।

श्रावणी कहती हैं कि उन्होंने इतने सालों में सिर्फ लड़ना सीखा है और अगर आप लड़ने की ठान लेते हैं तो कोई परिस्थिति आपको नहीं हरा सकती। उन्हें पुणे एक टेड टॉक के लिए बुलाया गया लेकिन तब वह प्रेग्नेंट थीं। डॉक्टर ने जो तारीख दी थी उनकी डिलीवरी की, उससे दो दिन पहले टेड टॉक था।

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इवेंट का आयोजन करने वालों को जब पता चला तो उन्होंने कहा कि आप फिर अगले साल आ जाइएगा। लेकिन श्रावणी ने उसी साल जाने का फैसला किया। उनके पति ने उनसे पूछा कि वह इस हालत में भी क्यों जाना चाहती हैं? तो उन्होंने कहा, “क्योंकि ज़रूरी नहीं कि मैं अगले साल जा ही पाऊँगी। अगर आज मेरे पास मौका है तो मैं आज ही क्यों न यह काम करूँ। हमें रोकने की हज़ार वजह हो सकती हैं लेकिन आगे बढ़ने की सिर्फ एक वजह चाहिए और वह है कि मुझे हर एक महिला को प्रेरित करना है और उन्हें इस बात का यकीन दिलाना है कि कोई सीमा उन्हें रोक नहीं सकती।”

श्रावणी ने अपनी टेड टॉक पूरी की और जिस तारीख को तय था उसी दिन उनके बेटे का जन्म हुआ। आज वह दो बच्चों की माँ हैं और देश के लिए एक प्रेरणा। द बेटर इंडिया, श्रावणी के हौसले और जज़्बे को सलाम करता है!

अगर आप उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो 9591985611 पर कॉल और support@safehands24x7.com पर ईमेल कर सकते हैं, साथ ही आप उनके वेबसाइट पर जाकर जानकारी ले सकते हैं।

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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