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ज़रूरतमंद बच्चों का मॉल है रांची का ‘महाबाज़ार,’ यहाँ बच्चे खरीदते हैं अपनी मनपसंद चीजें!

इस संगठन की शुरुआत साल 2014 में दसवीं कक्षा के 4 छात्रों ने की थी और आज लगभग 70 युवा इस संगठन से जुड़े हुए हैं!

झारखंड में रांची के रहने वाले 23 वर्षीय रजत विमल दसवीं कक्षा में थे, जब उन्होंने ‘फॉलेन लीव्स‘ नामक एक स्वयंसेवी संगठन की शुरुआत की। रजत और उनके दोस्त, आयुष बुधिया, सौरव चौधरी, विवेक अग्रवाल और ऋषभ ऋतुराज से शुरू हुई उनकी इस पहल में आज लगभग 70 युवा शामिल हो चुके हैं।

फ़िलहाल, MBA कर रहे रजत बताते हैं, “हमें स्कूल में ‘गिविंग इट बैक टू सोसाइटी’ यानी कि समाज को कुछ वापस देने के कॉन्सेप्ट के बारे में पढ़ाया गया था। हम सभी दोस्त उस समय 15- 16 की उम्र के थे और हमारे मन में इस कॉन्सेप्ट पर काम करने की इच्छा हो गई। बस फिर कहते हैं ना, ‘जहाँ चाह, वहां राह’ और हमें अपनी राहें मिल गईं।”

साल 2014 में शुरू हुए इस संगठन का उद्देश्य गरीब तबके के और अनाथ आश्रमों में पलने-बढ़ने वाले बच्चों को एक बेहतर ज़िंदगी की तरफ ले जाना है। रजत के मुताबिक, वह और उनके साथी मिलकर इन बच्चों को शिक्षा और करियर से जोड़ रहे हैं और उन्हें लाइफ स्किल्स सिखा रहे हैं।

Team of Fallen Leaves

यह संगठन साल भर में बहुत से इवेंट्स करता है, जिनके ज़रिए ज़रूरतमंद बच्चों की मदद की जाती है। युवाओं की यह टोली इन बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के साधन, करियर काउंसलिंग, कपड़े-जूते आदि के साथ-साथ आज के डिजिटल जमाने के साथ चलना भी सिखा रही है।

रजत बताते हैं, “हम बहुत सारे फन लर्निंग एक्टिविटी करते हैं। फन लर्निंग इसलिए क्योंकि हम बच्चों को अनोखे ढंग से पढ़ाते हैं। हमारा कोई भी प्रोग्राम हो उसमें बच्चों के सीखने के लिए बहुत कुछ होता है। डिजिटल क्लासरूम, पर्सनल काउंसलिंग सेशन से लेकर मॉक मॉल एक्सपीरियंस- महाबाज़ार जैसी गतिविधियां हम करते हैं।”

संगठन के एक प्रोग्राम, ‘शाम की पाठशाला’ के तहत उन्होंने बच्चों के लिए ‘डिजिटल क्लासरूम’ की पहल की है। इन क्लासरूम में उन्हें सिर्फ पढ़ाया ही नहीं जाता है बल्कि उनके मनोरंजन के लिए ज्ञानवर्धक फ़िल्में और कार्टून भी दिखाए जाते हैं। इसके अलावा, उनकी कोशिश यह है कि वे बच्चों की दिलचस्पी को समझकर उन्हें उसी क्षेत्र में आगे बढ़ाएं।

पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे क्या अन्य स्किल सीख सकते हैं, इस पर उनका खास ध्यान रहता है। रजत कहते हैं कि उनके यहाँ से कई बच्चों को फुटबॉल जैसे खेलों की ट्रेनिंग, तो बहुतों को पेंटिंग वर्कशॉप के लिए भेजा जाता है।

रजत और उनकी टीम अपनी पॉकेट मनी और कुछ अन्य समर्थकों की मदद से अपने प्रोग्राम्स के लिए फंडिंग जुटाती है। इस फंडिंग की मदद से वे इन बच्चों के लिए कॉपी, किताब, बैग और स्टेशनरी का अन्य सामान भी लेकर आते हैं।

“हमारा एक खास प्रोग्राम है ‘महाबाज़ार’- यह एक मॉक मॉल एक्सपीरियंस है बच्चों के लिए। हमारे और आपके लिए मॉल से शॉपिंग करना बहुत आम बात है, लेकिन इन बच्चों के लिए यह बहुत अलग अनुभव है। हम लोग हर साल यह महाबाज़ार लगाते हैं ताकि इन बच्चों को मॉल में शॉपिंग करने का अनुभव मिले। इसमें हम एक जगह पर कपड़ों, खिलौनों और जूतों आदि की बहुत सी स्टॉल लगाते हैं, जहां से बच्चे अपनी मन-पसंद चीजों की खरीददारी कर सकते हैं,” उन्होंने आगे कहा।

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They collect stuff from people for the Mahabazaar

सभी बच्चों को एक नकली डेबिट कार्ड दिया जाता है, जिसकी लिमिट 1000 रुपये रखी जाती है। बच्चों से कहा जाता है कि उन्हें जो भी खरीदना है वह इन हज़ार रुपयों में ही खरीदना है। रजत आगे बताते हैं कि यह मॉल का अनुभव तो है ही, इसके साथ वे इन बच्चों को पैसे का सही मैनेजमेंट सिखाते हैं।

बच्चों का बजट फिक्स रहता है इसलिए वे अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से चीजें खरीदते हैं। इससे वह फिजूल खर्ची से बचते हैं और उन हज़ार रुपयों को बहुत सोच समझकर खर्च करते हैं।

रजत और उनकी टीम, मनी मैनेजमेंट के जो सबक इन बच्चों को सिखा रही है, उसे सीखने की ज़रूरत शायद हम सबको है। क्योंकि अक्सर हम बिना अपनी ज़रूरत की चीजें भी शौक-शौक में खरीद लाते हैं। इससे पैसे की बर्बादी तो होती ही है, साथ ही, हम अपने घर को भी व्यर्थ की चीजों से भर लेते हैं।

महाबाज़ार का बच्चों को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। बच्चों के लिए यहाँ पर बहुत से ऑफर भी रहते हैं और वे सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि अपने माता-पिता के लिए भी शॉपिंग कर सकते हैं।

Kids buying things at Mahabazaar

महाबाज़ार में लगने वाले सभी स्टॉल्स और सामान का प्रबंध रजत और उनकी टीम करती है। इस बारे में रजत बताते हैं कि दो महीने पहले से ही उनकी तैयारी शुरू हो जाती है। शहरभर में वे नए-पुराने कपड़े, जूते-चप्पल, स्टेशनरी आदि इकट्ठा करने के लिए ड्राइव्स करते हैं। बहुत से नेक दिल लोग उनकी मदद के लिए आगे आते हैं।

अपनी इस ड्राइव में उन्हें पुराने सामान के साथ-साथ काफी-कुछ नया सामान भी मिलता है। पुराने कपड़ों को अच्छे से धोकर और इस्तरी करके फिर ही बाज़ार में रखा जाता है। बच्चों के पास बहुत से विकल्प होते हैं खरीदने के और यह एक दिन, उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं होता।

रजत दसवीं कक्षा में थे, तब से इस संगठन को चला रहे हैं। वह कहते हैं कि शुरू में, सबको लगता था कि यह कुछ वक़्त का शौक है और फिर हम यह सब छोड़ देंगे, लेकिन जितना हम अपने काम में आगे बढ़े, अलग-अलग बच्चों से मिले। इस संगठन को चलाए रखने की लालसा बढ़ती ही गई।

अंत में वह सिर्फ यही सन्देश देते हैं कि अगर कुछ करने निकलें तो पूरा आसमान पड़ा है लेकिन आप जहाँ कर सकते हैं वहां कुछ करें!

अगर आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है और आप रजत और उनकी टीम को कोई भी मदद करना चाहते हैं तो 8797315825 पर कॉल कर सकते हैं या फेसबुक पर जुड़ सकते हैं!

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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