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हमराही: बेटे की मृत्यु को बनाई प्रेरणा, दूसरों के बच्चों की जान बचाने का उठाया बीड़ा!

शीतल और विक्रांत का बेटा आर्य केवल 7 साल का था, जब उन्होंने उसे खो दिया।

साल 2010 में शीतल भाटकर और उनके पति विक्रांत विकास भाटकर अपने डेढ़ साल के बेटे, आर्या को डॉक्टर के पास लेकर गए क्योंकि वह ठीक से चल नहीं पाता था। डॉक्टर ने उन्हें बताया कि आर्या को स्टोरेज डिसऑर्डर है, लेकिन वह ये नहीं बता पाए कि उसे कौन-सा स्टोरेज डिसऑर्डर है।

स्टोरेज डिसऑर्डर, वांशिक बीमारी है जो कि शरीर की कोशिकाओं (Cells) में लिपिड्स और कार्बोहाइड्रेट्स को तोड़ने वाले कुछ एंजाइम्स की कमी के कारण होती है।

इस बीमारी के लक्षण बहुत अलग-अलग होते हैं और किसे, कौन-सा डिसऑर्डर है, उसी व्यक्ति पर निर्भर करता है। ठीक से विकास न होना, चलने-फिरने में परेशानी, मिर्गी, बहरापन या फिर दिखाई न देना आदि सब इसके लक्षण हैं। आर्या का इलाज काफी मुश्किल था क्योंकि डॉक्टरों को समझ में नहीं आ रहा था कि स्टोरेज डिसऑर्डर्स में से उसे कौन-सा डिसऑर्डर है।

उसकी बीमारी का सही पता लगाने के लिए बहुत से टेस्ट किए जाने थे लेकिन मुंबई में किसी भी लैब में इसके लिए ज़रूरी मशीनें उपलब्ध नहीं थीं।

शीतल बताती हैं, “हमने आर्या के ब्लड और स्किन सैंपल नीदरलैंड भेजे और वहां के टेस्ट से पता चला कि उसे NEIMAN PICK ‘C’ (NPC) बीमारी है।”

उन्हें पता चला कि पूरी दुनिया में इस बीमारी के सिर्फ 500 मामले ही सामने आए हैं। इसका मतलब एक करोड़ लोगों में यह बीमारी सिर्फ 1 को होती है। शीतल कहती हैं कि उनके दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी, ‘हम ही क्यों?’

हम में से कोई भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि उस समय उनके मन पर क्या बीत रही होगी। शीतल और उनके पति को उस समय मिनेसोटा के मेयो क्लिनिक में NPC पर स्पेशलाइजेशन कर रहे डॉ. मार्क पेटरसन के बारे में पता चला। वे उनसे फ़ोन और ईमेल के ज़रिए सम्पर्क में रहे।

“अगर हमारे जैसे समृद्ध लोगों को भी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त करने में इतनी परेशानी हो रही थी, तो लाखों गरीब लोग कैसे मैनेज करते होंगे, ऐसा सोचकर मैं परेशान हो गई।” उन्होंने आगे कहा।

Shital and her son Aarya

शीतल की इसी सोच ने- विदआर्या संगठन की नींव रखी। इस संगठन का उद्देश्य ऐसे लोगों की मदद करना है जो कि इस तरह की दुर्लभ और गंभीर बिमारियों से जूझ रहे हैं। संगठन के जरिए लोगों को बताया जाता हैं कि उन्हें क्या करना है। उन्होंने मुंबई के बहुत से डॉक्टरों को भी अपने साथ जोड़कर एक नेटवर्क बनाया है।

विदआर्या की स्थापना तब हुई जब आर्या के बहुत से मेडिकल टेस्ट हो रहे थे। अपने हर संभव प्रयास के बाद भी उन्होंने 2015 में आर्या के सातवें जन्मदिन से तीन महीने पहले उसे खो दिया।

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आर्या के बहुत से मेडिकल टेस्ट काफी महंगे थे और शीतल कभी भी अपने संघर्ष को नहीं भूल सकतीं। इसलिए उन्होंने ऐसे लोगों की मदद करने की ठानी जो अपने बच्चों के मेडिकल टेस्ट तक नहीं करवा सकते। उनका संगठन डोनेशन आदि की मदद से ज़रूरतमंद बच्चों के ज़रूरी टेस्ट करवाता है। अब यह भारत सरकार के साथ रजिस्टर एक ट्रस्ट भी है।

इस दंपति के लिए इलाज का खर्च भी बहुत बड़ी समस्या थी और इसलिए अब उनकी कोशिश है कि वे अन्य माता-पिता की मदद कर पाएं।

शीतल बताती हैं कि जब वह KEM अस्पताल के बच्चों वाले वार्ड में थीं, तब उन्होंने देखा कि कैसे बच्चों के माता-पिता और रिश्तेदार संघर्ष कर रहे हैं। बहुतों के पास अपने खुद के लिए खाना तक खरीदने के पैसे नहीं है, आप मरीज़ के लिए दवाइयां तो भूल ही जाइये।

विदआर्या हर दिन लगभग 50 जरूरतमंद लोगों को सब्सिडी पर खाना भी देता है। बहुत से अलग-अलग लोगों से मिलने वाली मदद से, अब वे हर दिन 100 फ़ूड पैकेट्स भी बांटते हैं।

शीतल को ल्यसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर सोसाइटी (LSDS) की सदस्य बनने के बाद इस बीमारी के बारे में काफी जानकारी हुई है। यह सोसाइटी राष्ट्रीय स्तर पर काम करती है और इस तरह की बिमारियों से जूझ रहे मरीज़ों को सरकार और अन्य संगठनों से जोड़ने में मदद करती है।

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शीतल का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि जैसे उन्होंने अपने बेटे को खो दिया, वैसे कोई और माँ अपने बच्चे को न खोए। इसके लिए वह दिन-रात प्रयास कर रही हैं ताकि सही समय पर लोगों को सही मदद मिल पाए!

संपादन-  अर्चना गुप्ता

मूल लेख: दीपिका भारद्वाज


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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