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अमेरिका छोड़ गाँव में बसा दंपति, 2 एकड़ ज़मीन पर उगा रहे हैं लगभग 20 तरह की फसलें!

“हमारे ये सब करने से ग्लोबल वार्मिंग भले ही न रुके, लेकिन हमारे आस-पास जो बच्चे हैं, उनकी ज़िंदगी में बदलाव ज़रूर आएगा।”

“जब नोटबंदी हुई तब सभी लोग बैंकों के बाहर कतारों में लगे थे लेकिन हमें किसी बात की कोई चिंता नहीं थी। 15 दिन तक हमें कोई बैंक जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मात्र 200 रुपये में हमारा गुज़ारा आसानी से हो गया क्योंकि हम किसी भी मूलभूत ज़रूरत के लिए किसी और पर निर्भर नहीं थे,” यह कहना है पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में रहने वाली अपराजिता सेनगुप्ता का।

अपराजिता और उनके पति देबल मजुमदार पिछले 10 सालों से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। अपने दो एकड़ के खेत में वे अपनी ज़रूरत की सभी चीजें, दाल, चावल, सब्ज़ियाँ, फल, मसाले आदि उगा लेते हैं। उनके जीवन का उद्देश्य है- स्वस्थ, सेहतमंद और सस्टेनेबल ज़िंदगी।

गाँव में रहना, खेती करना, और खुद पर निर्भर होना हमारे देश में बहुत ही साधारण बात है क्योंकि आज भी बहुत-सी जनसंख्या इसी तरह ज़िंदगी जी रही है। ऐसे में, अपराजिता और देबल की कहानी को असाधारण बनाने वाली बात यह है कि ये दोनों पति-पत्नी अमेरिका में अपनी एक अच्छी-खासी आरामदायक ज़िंदगी को छोड़कर भारत लौटे हैं।

Debal Mazumder and Aparajita Sengupta along with their daughter

अंग्रेजी साहित्य और सिनेमा में पीएचडी करने वाली अपराजिता बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर काम कर रही थीं और उनके पति देबल, एक अच्छी-खासी कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर थे। अपराजिता बताती हैं कि वहां रहते हुए उनकी ज़िंदगी बहुत ही भाग-दौड़ वाली थी और फिर दोनों देशों की संस्कृति अलग होने से खाना-पीना भी बिल्कुल अलग था।

“वहां हम अक्सर हाइपर मार्ट्स या फिर मॉल से ही घरेलू और ग्रॉसरी का सामान खरीदते थे। अमेरिका में फल-सब्ज़ियाँ भी भारत से बहुत अलग हैं। भारत में मैंने प्याज ज्यादा से ज्यादा इतना बड़ा देखा था कि मेरी हथेली में आ जाए लेकिन वहां इससे भी बड़े साइज़ के प्याज मिल जाएंगे,” उन्होंने बताया।

धीरे-धीरे उन्हें समझ में आने लगा कि वहां पर जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों से खेती होती है। इतना ही नहीं, वहां फलों और सब्ज़ियों को केमिकल आदि का इस्तेमाल करके पकाया जाता है। अपराजिता कहती हैं कि उन्हें लगने लगा था कि उनके हर एक निवाले में केमिकल है। उन्होंने महसूस किया कि खाना, हमारे जीवन के हर एक पहलू से जुड़ा हुआ है चाहे वह हमारी संस्कृति हो या फिर रहन-सहन का स्तर, पर आज यही खाना शुद्ध नहीं है। हैरानी की बात ये है कि बहुत ही कम लोग हैं जिन्हें इस बात से फर्क पड़ता है।

देबल और अपराजिता ने जितना इस विषय को पढ़ा और इस पर चर्चा की, उतनी ही उनकी अपनी लाइफस्टाइल के बारे में समझ बढ़ी। उन्हें समझ में आया कि कैसे आज पूरी दुनिया सिर्फ पूंजीवाद के सिद्धांत पर चल रही है। बेहतर टेक्नोलॉजी, ऑटोमेटिक ज़िंदगी के चक्कर में हमने पर्यावरण, पानी और हवा को जहरीला कर दिया है। इस ज़िंदगी से बाहर निकल समाज और पर्यावरण के लिए कुछ करने की चाह अपराजिता और देबल को अपने वतन वापस ले आई।

In the Smell of the Earth Farm

साल 2011 में अपराजिता और देबल अमेरिका में अपनी नौकरी आदि सब छोड़कर अपनी जड़ों की तरफ लौट आए। यहाँ आकर उन्होंने सबसे पहले कोलकाता के पास ठाकुरपुर में खेती शुरू की। साल 2014 में उन्होंने शांतिनिकेतन के पास एक गाँव में ज़मीन खरीदी और यहाँ पर उन्होंने ‘स्मेल ऑफ़ द अर्थ’ नाम से अपने खेत की नींव रखी। यहीं पर उन्होंने अपने रहने के लिए घर बनवाया।

“हमने खुद खेती शुरू करने से पहले अलग-अलग खेती करने के तरीके सीखे। हमने परमाकल्चर की तकनीकें सीखीं, प्राकृतिक खेती की खुद ट्रेनिंग की और यहाँ खेती करना शुरू किया। हमारा एक ही उद्देश्य है कि हम अपनी सभी जरूरतें पूरी करते हुए अपने पर्यावरण के प्रति भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाएं। अपनी बेटी को महंगे से महंगे खिलौने या फिर गैजेट्स दिलाने का कोई फायदा नहीं अगर हम उसे शुद्ध खाना-पीना और वातावरण ही नहीं दे सकते,” उन्होंने कहा।

देबल और अपराजिता अपने खेत में 4 किस्म के चावल उगाते हैं। इसके अलावा वे मसूर, तुअर, मूंग, चना, सभी तरह की सब्ज़ियाँ जैसे आलू, बैंगन, प्याज, लहसुन, हल्दी के साथ-साथ केला और अमरुद जैसे फल भी उगाते हैं। खेती के लिए उनके तीन उसूल हैं-

1. किसी भी तरह के केमिकल या फिर पेस्टीसाइड के बिना खेती करना
2. इंटरक्रॉपिंग तरीकों से फसले उगाना
3. अपना सभी फ़ूड वेस्ट कम्पोस्ट करना

उनका कहना है, “लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि वे सबकुछ अपनी ज़रूरत से ज्यादा चाहते हैं। उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि वे कितना ज्यादा कचरे का उत्पादन कर रहे हैं, जो पर्यावरण और पृथ्वी के लिए हानिकारक है। जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि पर्यावरण का संरक्षण और स्वच्छता सिर्फ सरकार की नहीं बल्कि हम नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है, उस दिन बहुत सी समस्याओं का हल खुद-ब- खुद हो जाएगा।”

लगभग 10 सालों से एक गाँव में रह रहे अपराजिता और देबल को कभी भी अमेरिका की ज़िंदगी की कमी नहीं खली। इस बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि बहुत-सी चुनौतियाँ थीं और शायद आज भी हैं लेकिन कभी भी हमें वापस जाने का ख्याल नहीं आया। उनके मुताबिक यहाँ रोज़मर्रा में जो परेशानियाँ उन्होंने झेलीं, वह उस केमिकल से भरी ज़िंदगी के सामने बहुत छोटी हैं।

“अक्सर लोगों को लगता है कि गाँव में रह रहे हैं तो बहुत समझौते किए होंगे। सुविधाएं नहीं होंगी और मुश्किल भरी ज़िंदगी होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है क्योंकि यह हमारे ऊपर है कि हम अपनी ज़िंदगी को कैसे देखते हैं? हमारा घर भले ही बहुत बड़ा नहीं लेकिन हर ज़रूरत की चीज़ यहाँ मौजूद है।”

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अपराजिता और देबल ने अपनी ज़िंदगी तो बदली ही, साथ ही, वे इस गाँव के लोगों की ज़िंदगी में भी बदलाव ला रहे हैं। उन्होंने यहाँ के किसानों को केमिकल खेती के प्रति जागरूक बनाया है और वे प्राकृतिक खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करते हैं। आज उनके प्रयासों के कारण ही इस गाँव में देसी बीजों से खेती हो रही है और घरों में किचन गार्डन का कॉन्सेप्ट भी बढ़ा है।

वे गाँव के बच्चों को भी पढ़ाते हैं और साथ ही, ज़रूरी लाइफ स्किल्स भी सिखाते हैं। उनकी सोच है कि भावी पीढ़ी को बचपन से ही सस्टेनेबिलिटी का मतलब समझाया जाए और यह उनके जीवन का हिस्सा बने।

वह आगे बताती हैं, “जब हम यहाँ आये थे तब हमने बहुत से फलों के पेड़ लगाए थे, जिन पर अब फल आना शुरू हो गए हैं। हमारी उपज में से अपनी ज़रूरत के हिसाब से हम इस्तेमाल कर लेते हैं और थोड़ा-बहुत अपने जानने-पहचानने वालों के यहाँ भिजवाते हैं। इसके अलावा, मैंने घर पर ही फ़ूड प्रोसेसिंग करना शुरू किया। यह अभी बहुत छोटे स्तर पर है।”

अपराजिता घर पर ही जैम आदि बनाती हैं और इसे स्थानीय लोगों को ही बेचती हैं। अच्छी बात यह है कि उन्होंने गाँव की महिलाओं को इस तरह की स्किल्स से जोड़ना शुरू किया है। वह चाहती हैं कि गाँवों की महिलाएँ अपने हुनर का फायदा उठाएं और साथ ही, नयी चीज़ें भी सीखें।

यह दंपति प्राकृतिक फार्मिंग से जुड़ी अलग-अलग ट्रेनिंग भी देता है। साल में दो बार, मार्च और सितम्बर में उनकी ट्रेनिंग होती है। अब तक वे लोगों को प्राकृतिक फार्मिंग, परमाकल्चर आदि पर 8 कोर्स करवा चुके हैं। एक ट्रेनिंग का समय 7 से 10 दिन का होता है और एक बैच में 8 से 9 लोग उनके पास सीखने आते हैं।

उनके पास खेती की ट्रेनिंग के लिए आने वाले लोगों में किसानों से ज्यादा संख्या शहरों में रह रहे प्रोफेशनल लोगों की हैं। ये वो लोग हैं जो या तो अपने गाँव में जाकर अपने पूर्वजों की खेती करना चाहते हैं या फिर शहर में ही रहकर अपनी लाइफस्टाइल में सकारात्मक बदलाव चाहते हैं।

ट्रेनिंग के दौरान ये लोग अपराजिता और देबल के घर पर ही रहते हैं। खेत में काम करते हैं, गाँव की साधारण लेकिन सुकून भरी ज़िंदगी जीते हैं और समझते हैं कि कम में भी कैसे खुश और परिपूर्ण रहा जा सकता है। अपराजिता अंत में बस इतना कहती हैं,

“आप जो बेस्ट कर सकते हैं करें। हमारे यह सब करने से ग्लोबल वार्मिंग भले ही न रुके, लेकिन हमारे आस-पास जो बच्चे हैं, उनकी ज़िंदगी में बदलाव ज़रूर आएगा। बाकी जो लोग खेती करना चाहते हैं या फिर अपने घर में ही हेल्दी खाना उगाना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले खेती के बारे में सीखना और समझना चाहिए। कहीं पर भी थोड़े समय के लिए एक फार्मिंग ट्रेनिंग करनी चाहिए। इससे उन्हें काफी मदद मिलेगी।

देबल और अपराजिता, 29 फरवरी से 9 मार्च तक नैचुरल फार्मिंग की ट्रेनिंग दे रहे हैं। यदि कोई भी जैविक और प्राकृतिक खेती सीखना और करना चाहता है तो उनका ट्रेनिंग कोर्स जॉइन कर सकता है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ पर क्लिक करें

उनसे सम्पर्क करने के लिए आप उनके फेसबुक पेज- Smell of the Earth पर क्लिक करें!

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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