पद्म श्री से सम्मानित इस किसान ने 80 हज़ार से ज़्यादा किसानों को सिखाया है ‘प्रोडक्शन मैनेजमेंट’!

ज हर व्यक्ति चाहता है कि वह ऑर्गेनिक अनाज खाए और रासायनिक पद्धति से उगाया गया अनाज उन्हें न मिले। बढ़ती तकलीफों और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की वजह से आज सभी ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में हमारे देश के एक ऐसे किसान हैं, जो न सिर्फ ऑर्गेनिक खेती करने में किसानों की मदद कर रहे हैं, बल्कि आम लोगों का जीवन संवारने में भी प्रयासरत हैं।

सरकार की ओर से पद्म श्री जैसे महान सम्मान से सम्मानित किए गए और ‘धरतीपुत्र’ की उपाधि से नवाज़े गए भारत भूषण त्यागी एक ऐसे किसान हैं, जो लोगों के सामने अपनी अलग पहचान रखते हैं। देश में 100 में से 90 किसान खेती में घाटा उठाते हैं, जिन्हें खेती में ज्यादा लागत लगा कर मुनाफा कम मिलता है और जो मंडियों में व्याप्त बाज़ारवाद का शिकार होते हैं, उस दौर में भारत भूषण त्यागी किसानों को सबल बनाने के लिए प्रयत्न में जुटे हुए हैं। जैविक खेती के ज़रिये भारत भूषण त्यागी मिश्रित खेती से 1 साल में कम से कम 10 से 12 फसलें तैयार कर लेते हैं, जो एक आम किसान के मुकाबले चार गुना कमाई का ज़रिया बनती है। आइये जानते हैं पद्म श्री भारत भूषण त्यागी से जुड़ी कुछ ख़ास बातें।

ऐसे हुई जैविक खेती की शुरुआत

पद्म श्री भारत भूषण त्यागी

साल 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार से धरतीपुत्र सम्मान प्राप्त करनेवाले भारत भूषण एक आम किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता गाँव के एक छोटे से किसान थे। उनके माता-पिता हमेशा से ही सात्विक जीवन जीने में यकीन करते थे।

द बेटर इंडिया से एक विशेष बातचीत में उन्होंने बताया,”बचपन सेही हमारे मन में देश और समाज की भलाई के विषय में कुछ करने की कामना रही। अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीएससी की पढ़ाई पूरी की और गाँव में ही ज़िन्दगी व्यतीत करने की ठानी। लेकिन हमेशा से हमारे मन में ये भाव रहा कि हम कैसे लोगों का भला कर सकते हैं। हम गरीबी देखते थे और लोगों को खेती में नुक्सान उठाते हुए देखते थे, जिससे हम दुखी हो जाते थे।”

अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना करते हुए भारत भूषण खेती से जुड़ी किताबें या कहें प्रकृति पर आधारित दर्शनों का पठन करने लगें। इस दौरान उन्हें प्रकृति पर परमाणुओं के विकास से जुड़ी कई जानकारियां प्राप्त हुई, लेकिन उन्हें सबसे बड़ी मदद मिली ‘मध्यस्थ दर्शन सह अस्तित्ववाद’ नामक दर्शन से, जिसे अमरकंटक में रहनेवाले स्वर्गीय अग्रहार नागराज ने लिखा था।

“इस दर्शन में हमें परमाणु के विकास क्रम से लेकर सम्पूर्ण प्रकृति की व्यवस्था का ज्ञान हुआ। इस दर्शन में हमें पता चला कि कैसे प्रकृति नियम, नियंत्रण और संतुलन के साथ काम करती है। प्रकृति की इस व्यवस्था को समझकर हमें खेती करनी थी, लेकिन हमने कृषि अनुसंधान के नाम पर दूसरों की देखादेखी की और हमारे देश की प्राकृतिक व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया। जिसकी वजह से हम अधिक उपज के लिए रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल करने लगे और इससे मिट्टी की उर्वरता कम होती चली गई। धीरे-धीरे हमें बीमारियों ने आ घेरा और हमारा स्वास्थ्य खराब होने लगा,” उन्होंने आगे बताया।

इस बात को समझकर उन्होंने जैविक खेती के सिद्धांतों को खेती में लागू किया और धीरे-धीरे इसका फायदा दिखाई देने लगा।

प्राकृतिक सिद्धांतों को खेतों से जोड़ा

प्राकृतिक दर्शन से प्राप्त हुए सूत्रों को भारत भूषण ने खेती पर लागू किया, जिसमें उन्होंने कई नियम लागू किये। उन्होंने प्रोडक्शन मैनेजमेंट बनाया, जिसमें उन्होंने बताया कि कितनी दूरी पर, कितनी जगह पर, किस फसल के साथ, किस फसल को बोना सही होगा। कैसे एक ही खेत से 10-12 अलग-अलग तरह की फसलों का उत्पादन किया जा सकता है? कम पानी, कम जुताई में और बाज़ार की कोई भी लागत खेती में लगाए बगैर कैसे अनाज उगाया जाए, इसका पूरा प्लान तैयार किया।

वह कहते हैं, “इन नियमों के लागू होते ही और कुछ समय की मेहनत के बाद ही फसल की पैदावार अच्छी होने लगी, ज़मीन की उर्वरता बढ़ने लगी, कीड़े-खरपतवार कम होने लगे और खेती से इनकम बढ़ने लगी। तब मैंने जाना कि खेती में कोएक्सिस्टेंस यानी कि सहअस्तित्व कैसे काम करता है। मैंने अपने खेत को दो भागों में बांट दिया, जिसमें पेरेनियल ज़ोन और सीज़नल ज़ोन दो भाग हो गए। एक ही खत में हमने अनाज, मसाले और सब्ज़ियां उगाने की शुरुआत की। इस तरह खेत के बंटे हुए भाग एक-दूसरे के पूरक बन गए।”

इसके अलावा इन खाद्य पदार्थों को वे प्रोसेसिंग और सर्टिफिकेशन के ज़रिये बाज़ार में भेजने लगे। जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी होने लगी।

 

खेती घाटे का सौदा कैसे हुई?

भारत भूषण त्यागी की माने तो हमारे देश में खेती को मात्र इनपुट के तरीकों से जोड़ा जाता रहा है, कोई इसे नक्षत्रों से जोड़ता है, कोई गाय से, तो कोई किसी और तरीके से। लेकिन खेती के लिए किसानों को ज़रुरत थी प्रोडक्शन मैनेजमेंट की और अनाज की मार्केटिंग की, जिससे बाज़ार में होनेवाले शोषण से उन्हें बचाया जा सके।

वह कहते हैं, “हमारे देश में खेती कैसे घाटे का सौदा हो गई? जब हमने ये सोचा, तो पाया कि खेती और किसान पूरी तरह से बाज़ार पर निर्भर थे। खेती की सारी लागत बाज़ार से आती थी, बाज़ार ही इस सामान को खरीदता था, बाज़ार ही इसकी कीमत तय करता था। किसान की हालत का अंदाजा लगाइये, वो खेती करने से पहले भी बाज़ार में है, खेती के बाद भी बाज़ार में है और परिवार चलाने के लिए भी वो बाज़ार में है। ऐसे में बाज़ार खेती पर हावी हो गया। बाज़ारवाद का नियम ही है कम देकर ज़्यादा पाने की प्रवृत्ति, जिसकी वजह से हमारे किसान की ये दुर्दशा हुई, उनका शोषण हुआ। ऐसे में ज़रुरत थी एक पूरे समाधान की। जिसके लिए हमने जी तोड़ कोशिश की।”

 

किसानों को अब खुद सिखाते हैं प्रोडक्ट मैनेजमेंट 

भारत भूषण किसानों की बेहतरी के लिए प्रोडक्ट मैनेजमेंट से जुड़े फ्री वर्कशॉप लेते हैं, जिसमें वे किसानों को खेती से जुड़ी बातें निःशुल्क सिखाते हैं। इससे किसान बगैर रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किये कम लागत में दुगुनी आय पा लेता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती है और वे गरीबी से उबर पाते हैं। इस पहल में लोग और बाकी किसान उनकी पूरी सहायता करते हैं। इन वर्कशॉप्स के ज़रिये वह अब तक 80 हज़ार से भी ज़्यादा किसानों को प्रशिक्षित कर चुके हैं।

भारत भूषण कहते हैं, “भारत का किसान बेहद ईमानदार है, लेकिन उसका शोषण किया गया है। इस शोषण की वजह से हमारी जीवनशैली और खान-पान का स्तर दिन पर दिन गिरता गया। हमारे देश में खेती में डायवर्सिटी देखी जाती है, इसलिए यदि हम किसानों का साथ दें, तो हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहद नाम कमा सकता है।”

भारत भूषण त्यागी को पिछले वर्ष ही पद्म श्री के सम्मान से नवाज़ा गया, जिसके बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, “सरकार की ओर से मिले सम्मान की अपनी गरिमा है। लेकिन मेरे अनुसार इस सम्मान का अर्थ है कि मेरी ज़िम्मेदारी समाज को लेकर और भी बढ़ गई है। देश के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी को अब नाम मिल गया है, इसलिए मैं दुगुनी मेहनत कर इस सम्मान की गरिमा बनाने का प्रयत्न करता हूँ।”

इस उम्मीद के साथ कि हमारा भविष्य रसायनमुक्त हो और हम एक स्वस्थ्य जीवन जियें, हमें देश के किसान की मदद करनी चाहिए। यदि आप भारत भूषण त्यागी की इस पहल को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें 8755449866 पर कॉल करके उनकी इस मुहीम का हिस्सा बन सकते हैं। हो सकता है हम कल एक बेहतर भविष्य में कदम रख पाएं!

संपादन – मानबी कटोच 


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लेखन से गहरा जुड़ाव रखने वाली तोषिनी राठौड़ लंबे समय से मीडिया में कार्यरत है। संगीत से लगाव और अपने प्राणी-प्रेम के लिए लोगों के बीच पहचान रखती तोषिनी एक गायिका तो हैं ही , इसके साथ ही वह कई एनीमल एनजीओ के साथ काम भी करती हैं। बचपन से किताबी कीड़ा रह चुकी तोषिनी के लिए उनका लेखन एक मेडिटेशन की तरह काम करता है।
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