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पोलियो को मात दे 10वीं पास माँ ने शुरू किया अपना व्यवसाय, ताकि बन सकें बेटियों की प्रेरणा!

“मैंने दसवीं ही पास की थी और 16 की उम्र में मेरी शादी हो गयी!”

मिलनाडु के डिंडीगुल जिले में चिनालापत्ती में रहने वाली 42 वर्षीय गुनावती चंद्रशेखरन को डेढ़ साल की उम्र में पोलियो हुआ था। उसके बाद वे चंद कदम भी बिना सहारे के नहीं चल पाती थीं।

“मेरी फैमिली में सभी डॉक्टर हैं और मेरे पापा खुद बच्चों को पोलियो की ड्रॉप्स देते थे और किस्मत देखिये उनकी अपनी बेटी को पोलियो हुआ,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए गुनावती ने बताया।

वैसे तो उनका परिवार अच्छा पढ़ा-लिखा और संपन्न था, लेकिन अपनी बेटी के लिए एक अच्छा जीवनसाथी तलाशना उनकी प्राथमिकता थी। गुनावती कहती हैं कि शायद उस वक़्त उनके पिता के लिए यही ज़रूरी था उनकी बेटी ऐसे शख्स के साथ ज़िन्दगी गुजारे जो कि उसे समझे और ताउम्र उसका साथ दे। इसलिए जैसे ही चंद्रशेखरन का रिश्ता आया तो उन्होंने तुरंत हां कर दी।

“मैंने तब दसवीं ही पास की थी और 16 की उम्र में मेरी शादी हो गयी और फिर हमारी दो बेटियाँ हुई। मेरे पति ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। धीरे-धीरे जब मेरी बेटियां बड़ी होने लगी तो मुझसे अहसास हुआ कि वे परिवार की दूसरी महिलाएं जैसे कि मेरी भाभी वगैरा, जो कि वर्किंग हैं, उनसे काफी इंस्पायर्ड हैं। इसमें कोई बुराई नहीं थी पर मुझे यह बुरा लगा कि मैं अपनी बेटियों की प्रेरणा नहीं बन पाई,” उन्होंने आगे कहा।

गुनावती के परिवार उन्हें छोड़कर ज़्यादातर सभी महिलाएं वर्किंग हैं। पहले तो सबकुछ ठीक था लेकिन फिर जब उन्हें लगने लगा कि उनकी बेटियों को आगे बढने के लिए उनकी बजाय किसी और से प्रेरणा लेनी पड़ रही है तो इस बात ने उन्हें काफी परेशान कर दिया। तब उन्हें लगने लगा कि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कुछ नहीं किया है।

Quilling artist Gunavathy Chandrasekaran

वे मानसिक तौर पर काफी तनाव में रहने लगी और इससे उनके स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ने लगा। ऐसे में फिर एक बार उनके पति उनकी ताकत बने। उन्होंने गुनावती को अपने प्रिंटिंग और बाइंडिंग के बिज़नेस में मदद करने के लिए कहा। इसके अलावा उनका ग्राफिक मशीन के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का काम भी था, जिसे गुनावती ने संभाल लिया।

“उस वक़्त मुझे किसी के सहारे की ज़रूरत थी पर आज के जमाने में किसी के पास इतना समय नहीं। इसलिए मैंने अपने पति की मदद से खुद को नकारात्मकता से बाहर निकाला। मैं खुद अपनी मोटिवेशन बनी और उनके काम में उनकी मदद करनी शुरू की। बाहर लोगों से बात करने से बहुत-सी चीजें मैंने सीखीं, मेरी इंग्लिश इम्प्रूव हुई और सबसे ज्यादा मेरा आत्म-विश्वास बढ़ा,” उन्होंने बताया।

पर फिर बाज़ार की मंदी की वजह से उनका यह बिज़नेस बंद हो गया और एक बार फिर गुनावती घर पर बैठ गयीं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करें? क्योंकि वे घर पर ही बैठे रहना नहीं चाहती थीं। और किस्मत से एक दिन वे अपनी बेटी के साथ एक फैमिली फ्रेंड के घर गयीं। वहां पर उन्होंने उनकी बेटी की बनायीं पेपर ज्वेलरी देखी।

बचपन से ही आर्ट्स एंड क्राफ्ट में दिलचस्पी रखने वाली गुनावती ने उससे वहीं पर बैठकर पेपर आर्ट के बारे में पूछना शुरू कर दिया। मात्र आधे घंटे में उन्होंने सभी जानकारी उससे ले ली और फिर घर आकर उन्हें तरीका मिल गया कि वे कैसे अपना टाइम अच्छी जगह लगा सकती हैं।

उनका सबसे पहला पेपर आर्ट एक ‘बटरफ्लाई आर्टवर्क’ था, जिसे उनके पति ने फ्रेम कराया और फिर फोटो लेकर फैमिली ग्रुप्स में साझा किया। सभी ने उनके काम की तारीफ़ की। “मेरे भाई को अपने कुछ सहकर्मियों को तोहफे देने थे और उन्होंने कहा कि अगर मैं उनके लिए इस तरह के कुछ आर्टवर्क बनाकर दूँ तो काफी अच्छा रहेगा। इस तरह से मुझे पहला 40 पेपर आर्ट वर्क बनाने का काम मिला। पर चुनौती यह थी कि मुझे सिर्फ 20 दिनों में यह करना था,” उन्होंने कहा।

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Some Paper Art Work by Gunavathy

पेपर आर्ट में काफी मेहनत और वक़्त लगता है। लेकिन गुणावती ने ठान लिया था कि वे पीछे नहीं हटेंगी। उन्होंने अपने पति की फर्म में काम करने वाले एक-दो लोगों को अपने इस काम से जोड़ा। पहले उन्होंने उन्हें पेपर आर्ट करना सिखाया और फिर उन्हें काम दिया।

“जब मैं इन आर्टवर्क्स को फाइनल पैकेजिंग कर रही थी तो मेरे पति ने इन सभी पर छोटे-छोटे स्टीकर चिपका दिए। उन्होंने खुद उन स्टीकर को तैयार किया, जिस पर लिखा था- ‘गुणाज़ क्विलिंग/Guna’s Quilling’ और साथ में मेरा नंबर और ईमेल आईडी लिख दिया। बाद में, मुझे बहुत से लोगों ने मेसेज करके मेरे काम की तारीफ की। इससे मुझे बहुत हौसला मिला,” गुनावती ने कहा।

इसके बाद, साल 2014 में उन्हें मदुरई के एक जूट मेला में जाने को मिला और वहां वे पेपर ज्वेलरी पहनकर गयी थीं। सभी ने उनकी ज्वेलरी की तारीफ की और वहीं पर एक कारीगर ने उन्हें सलाह दी कि वे हैंडलूम और हेंडीक्राफ्ट विभाग में अप्लाई करके अर्टीसन कार्ड बनवा लें। इससे उन्हें किसी भी सरकारी आयोजन में भाग लेने का मौका मिलेगा।

She also gives training to school and college students

गुनावती को अर्टीसन कार्ड मिलने के दो महीने में ही कोयम्बटूर में अपनी स्टॉल लगाने का मौक़ा मिला और इसके बाद उन्होंने आज तक कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा है। आज उनके साथ 8 कारीगर काम कर रहे हैं और वे अपने प्रोडक्ट्स सिर्फ सरकारी स्टॉल के ज़रिये ही बेचती हैं।

वे वाल आर्ट, ग्रीटिंग कार्ड, वेडिंग कार्ड, मिनिएचर आर्ट, ज्वेलरी, नेमप्लेट, कंपनी लोगो, कंपनी कार्ड्स, स्पेशल फोटो फ्रेम्स आदि बनाती हैं। उनके मुताबिक वे साल में लगभग 8 सरकारी आयोजनों में भाग लेती हैं। हर एक आयोजन में वे 50 से 80 हज़ार रुपये कमा लेती हैं। इसके अलावा, कभी-कभी वे प्राइवेट ऑर्डर्स पर कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट्स भी बनाती हैं।

Some of her work

आज वे क्विलिंग गिल्ड, यूके की सदस्य भी हैं और उन्होंने ब्रिटिश काउंसिल में अपने इस बिज़नेस आईडिया पर लेक्चर भी दिया है। इसके अलावा उन्हें कई जगह मोटिवेशनल स्पीच देने का मौका भी मिला है। साथ ही, वे स्कूल और कॉलेज में वर्कशॉप भी कंडक्ट करती हैं।

साल 2016 में उन्हें जिला स्तर पर सम्मान मिला था और फिर 2019 में उन्हें राज्य-स्तरीय सम्मान से नवाज़ा गया। आज गुनावती न सिर्फ अपनी बेटियों के लिए बल्कि देश की हर उस महिला के लिए प्रेरणा हैं जो कि अपने जीवन में कुछ करना चाहती है।

Gunavathy got various awards for her work

अंत में वे सिर्फ यही कहती हैं, “इस बात से मतलब नहीं है कि आप कम कमाते हैं या फिर ज्यादा, लेकिन हर एक औरत की अपनी एक पहचान होनी चहिये। आपको कभी भी अपना आत्म-विश्वास नहीं खोना चाहिए। कोई भी दिव्यान्गता या फिर कमी आपको अपनी पहचान बनाने से नहीं रोक सकती। बाकी, मैं दुनिया के हर एक आदमी से यही कहूँगी कि एक पत्नी के लिए उसके पति का थोड़ा-सा साथ भी बहुत बड़ा हो जाता है। इसलिए अपने पार्टनर की ताकत बनें न कि कमजोरी।”

यदि आपको गुनावती की कहानी ने प्रभावित किया है और आप उनसे सम्पर्क करना चाहते हैं तो gunasquilling@gmail.com पर उन्हें मेल कर सकते हैं! उनके बनाये कुछ प्रोडक्ट्स देखने के लिए आप उनका फेसबुक पेज चेक कर सकते हैं!

Summary: Gunavathy Chandrasekaran, A resident of Dindigul, Tamil Nadu, 42-year-old, found her passion for quilling early in life and worked on it with enthusiasm. Having survived a polio attack when she was just one and half-years-old, Gunavathy was considered less capable and was married off at 16. Gunavathy taught herself how to make scraps of paper into beautiful pieces of art and slowly picked up the pace. Today, under the brand name Guna’s Quilling, the woman entrepreneur sells quilled artwork such as wall art, greeting cards, miniature figurines, jewelry, and much more.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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