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सुचेता कृपलानी : भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री; संभाली थी सबसे बड़े राज्य की बागडोर!

1966 में इंदिरा गाँधी के रूप में एक महिला प्रधानमंत्री को चुनने वाला भारत पहला कार्यात्मक लोकतंत्र था। हालांकि, बहुत कम लोग ही इस तथ्य से अवगत हैं कि इसके तीन साल पहले उत्तर प्रदेश ने सुचेता कृपलानी को भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में चुना था।

क स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय संविधान निर्माताओं में से एक, भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री और हर क्षेत्र में महिलाओं की पथ प्रदर्शक!

उन्होंने कई युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। वह स्वतंत्रता संग्राम के लिए जेल भी गयीं। यही वह महिला थीं, जिन्होंने 14 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक भाषण से पहले राष्ट्र-गान गाया था!

उन्होंने और उनके पति ने एक छत के नीचे रहते हुए अलग-अलग राजनीतिक दलों का समर्थन किया और उनकी ओर से चुनाव भी लड़े।

इतनी उपलब्धियां संयोग तो नहीं हो सकती और इसलिए इनका बार-बार ज़िक्र करना ज़रूरी हो जाता है। आइये उस महिला के जीवन पर प्रकाश डालते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में समाज के ऐसे कई पूर्वाग्रहों को तोड़ा। आईये जानते हैं सुचेता कृपलानी के बारे में!

सुचेता कृपलानी

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भारतीय राजव्यवस्था में महिलाओं की अधिक भागीदारी नहीं रही है। 2017 की इस रिपोर्ट के अनुसार, लोक सभा की 542 सीटों में केवल 11.8 %(64) सीटों तक व राज्य सभा के 245 सीटों में से 11% (27) सीटों तक ही महिलाएं पहुँच पायीं हैं।

यह भी सत्य है कि 1966 में इंदिरा गाँधी के रूप में एक महिला प्रधानमंत्री को चुनने वाला भारत पहला कार्यात्मक लोकतंत्र था। हालांकि, बहुत कम लोग ही इस तथ्य से अवगत हैं कि इसके तीन साल पहले उत्तर प्रदेश ने सुचेता कृपलानी को भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में चुना था।

मुख्यमंत्री बनने से पहले सुचेता कृपलानी स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गाँधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली थीं। वह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की समर्थक थीं। वह उन 15 भारतीय महिलाओं में से एक भी थीं जिन्हें संविधान सभा के लिए चुन गया था और जिन्हें मिलकर भारत के संविधान की रचना करनी थी – वही संविधान जिसकी नींव पर आज हमारा गणतंत्र राज्य खड़ा है!

Sucheta Kriplani (Source: Facebook/India History)

Sucheta Kriplani (Source: Facebook/India History)

सुचेता का जन्म 25 जून 1908 में हरियाणा के अंबाला में हुआ। स्वतंत्रता संग्राम से वह उस समय जुड़ी जब यह संग्राम अपने चरम पर था। यहीं से उनके जीवन में भारतीय राजनीति की नींव पड़ी, जो आगे चल कर मजबूत होती गयी। इनकी आत्मकथा “ एन अनफ़िनिश्ड बायोग्राफ़ि” (An Unfinished Biography) में हमें उनके जीवन के आरंभिक दिनों की झलक मिलती है जब छोटी सी उम्र में भी यह खुद को आस-पास हो रही राजनीति से दूर नहीं रख पाती थीं।

“मेरी समझ इतनी हो गयी थी कि मैं अंग्रेजों के प्रति गुस्से को (जालियावाला बाग हत्याकांड के बाद) महसूस कर सकती थी। हमने ( सुचेता व उनकी बहन सुलेखा) ने अपना गुस्सा कुछ एंग्लो इंडियन बच्चों के ऊपर निकाला जिनके साथ हम खेलते थे।”

सुचेता व सुलेखा,दोनों ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ने को आतुर थीं। अपनी किताब में वह एक घटना का वर्णन भी करतीं हैं। जालियावाला बाग हत्याकांड के बाद प्रिंस ऑफ वेल्स दिल्ली आए थे। उनके विद्यालय से लड़कियों को प्रिंस के सम्मान में खड़े होने के लिए कुदसिया बाग के बाहर ले जाया गया था। चाह कर भी ये बहने इसका विरोध नहीं कर पायीं और इस घटना के बाद खुद की कायरता पर उन्हें बहुत गुस्सा आया।

उन्होंने लिखा है,”इससे हमारा खुद पर शर्मिंदा होना बंद नहीं हुआ। हम दोनों अपनी कायरता के कारण खुद की नज़रों में छोटे हो गए थे।”

कॉलेज से निकलने के बाद, 21 वर्ष की उम्र में ही ये स्वतंत्रता संग्राम में कूदना चाहती थीं। पर दुर्भाग्यवश वह ऐसा कर नहीं पायीं क्यूंकि 1929 में उनके पिता और बहन की मृत्यु हो गयी और परिवार को संभालने की जिम्मदारी सुचेता के कंधो पर आ गयी।
तब उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में नौकरी करना शुरू किया।

हालांकि, इस पर भी वह खुद को स्वतंत्रता संग्राम से अलग नहीं रख पाईं। ऐतिहासिक स्त्रोतों से पता चलता है कि सुचेता पढ़ाने के समय अपने विद्यार्थियों को स्वतंत्रता संग्राम का महत्व समझाया करती थीं। इस विश्वविद्यालय में उनकी मुलाक़ात अपने भावी जीवनसाथी से हुई। जीवतरम भगवानदास (आचार्य) कृपलानी स्वतंत्रता आंदोलन के जाने-माने नेता थे।

Acharya Kriplani and Sucheta Kriplani (Source: Facebook/India History)

Acharya Kriplani and Sucheta Kriplani (Source: Facebook/India History)

पढ़ाने के अलावा वह विश्वविद्यालय स्वतंत्रता आंदोलन के सैनिकों का गढ़ भी था। आचार्य कृपलानी अक्सर ऐसे स्वयंसेवकों को ढूँढने बीएचयू आया करते थे।

1934 में बिहार में आए भूकम्प के राहत शिविरों में भाग लेते वक़्त आचार्य कृपलानी व सुचेता की नज़दीकियाँ बढ़ीं। इसी समय जमनालाल बजाज ने सुचेता को वर्धा आश्रम में शामिल होने का आमंत्रण भी दिया। यह आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करता था।

वह लिखती हैं, “मुझे लगता है विनोबा भावे, जो बोर्ड के अध्यक्ष थे, मुझे स्वीकृति देने वाले थे। जब मैं उनसे मिलने गयी, तब आश्रम में दो युवाओं के प्रेम प्रसंग के उजागर होने के कारण वे उस पाप को धोने के लिए उपवास पर थे। वह युगल आश्रम में मुंह छुपाए घूम रहा था। यह सब मुझे ठीक नहीं लगा। विनोबा का कठोर रवैया और अति आत्म-मुक्ति के भाव ने मुझे इस आश्रम से जुडने से रोक लिया।”

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1938 में जब उन्होंने आचार्य कृपलानी से शादी करने की ठानी तब परिवार व महात्मा गाँधी , दोनों ओर से उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। गाँधीजी के लिए सम्मान होने के बावजूद भी सुचेता अपने से 20 वर्ष बड़े आचार्य से शादी करने के फैसले पर अडिग रही।

गाँधीजी को डर था कि इस शादी के कारण आचार्य जो उनके “दाहिने हाथ” थे, को स्वतंत्रता संग्राम से पीछे न हटना पड़ जाये।

जब गाँधीजी ने सुचेता को किसी और से शादी करने कि सलाह दी तो सुचेता ने जवाब में कहा कि अगर वह ऐसा करती हैं, तो “अनैतिक और बाईमानी” होगी। और इस शादी से गाँधीजी को स्वतंत्रता संग्राम के लिए दो कार्यकर्ता मिल जाएँगे। आखिरकार दोनों शादी के बंधन में बंध गए।

आचार्य कृपलानी का साथ पा कर सुचेता पूरी तरह से राजनीति में कूद पड़ी। 1940 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की महिला शाखा – ‘अखिल भारतीय महिला काँग्रेस’ की स्थापना की। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय होने के कारण उन्हें एक साल के लिए जेल जाना पड़ा। सत्याग्रह आंदोलन के दौरान वह गाँधीजी की करीबी सहयोगी थीं।

(Source: Twitter)

(Source: Twitter)

वह लिखती हैं, “मैं राजनीतिक कार्य शुरू करने को आतुर थी। मैं जेल जाने वालों के आगे खुद को छोटा महसूस करती थी क्यूंकी मैंने जेल का जीवन नहीं देखा था। कृपलानी चाहते थे कि मैं अपनी पसंद का कोई भी काम करूँ,ज़रूरी नहीं कि वह राजनीति ही हो। शुरुआती दिनो में वह मुझे समझाया भी करते थे कि ‘अपना दामन साफ रखना’।”

आखिरकार जब अगस्त 1947 में स्वतंत्रता मिली, तब गाँधीजी ने सुचेता व कृपलानी दोनों को बँटवारे के बाद राहत प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने के लिए चुना। वह नौखाली के कैंप में राहत सामाग्री बांटने गयीं जहां बँटवारे के दौरान दंगों में सबसे अधिक खून बहा था। इसी जगह सुचेता को गाँधीजी से एक महत्वपूर्ण सीख मिली।

गाँधीजी ने उन्हें कहा था,“ उनका (शरणार्थियों का) आत्मसमान नहीं छीनना, उनको भिखारी नहीं बनाना है”। दूसरे शब्दों में शरणार्थियों को काम के बदले मदद देना था।

Understanding Gandhi :Gandhians in conversation with Fred J Blum किताब में उन्होंने कहा था, “अलग क्षेत्रों में काम करते हुए मैंने गाँधीजी से सीखा था कि लोगों को ऊपर से मदद करना ही काफी नहीं है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम लोगों को खुद की मदद करने की ताकत दे पाएँ।”

ऐसा माना जा सकता है कि उनके जीवन का गौरवपूर्ण क्षण तब होगा जब उन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध “Tryst with Destiny” भाषण के बिलकुल पहले वंदे मातरम, सारे जहां से अच्छा व जन गण मन गाने के लिए आमंत्रित किया गया था।

आज़ादी के बाद, वह भारतीय राजनीति में सक्रिय हो गयीं। जब उनके पति व्यक्तिगत व राजनीतिक मतभेदों के कारण जवाहरलाल नेहरू से अलग हो गए और अपनी खुद की पार्टी किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई तब सुचेता भी इनके साथ हो ली।

1952 में सुचेता किसान मजदूर पार्टी की ओर से न्यू दिल्ली से चुनाव लड़ी और जीती भी। पर जल्द ही राजनैतिक मतभेदों के कारण वह काँग्रेस में लौट आयीं। 1957 में काँग्रेस के टिकिट पर इसी सीट से वह दुबारा चुनाव जीती।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, “दोनों पति-पत्नी अलग-अलग राजनैतिक विचारों के प्रति निष्ठावान थे, पर इन दोनों ने कभी एक दूसरे पर सवाल नहीं किए, जो एक अलग तरह का लोकतंत्र दर्शाता है।”

1963 से1967 तक सुचेता कृपलानी भारत के सबसे बड़े राज्य, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। इस काल में उन्होंने इस राज्य के घटते आर्थिक आंकड़ो पर लगाम लगाई और साथ ही सुनिश्चित किया कि प्रशासनिक कार्यों मे पारदर्शिता बनी रहे।

(Left to Right) Ulla Lindstrom, member fo the First chamber of Parliament, Sweden; Sucheta Kripalani, Member of the Constituent Assembly, India; Barbara Castle, Member of Parliament; Cairine Wilson, Senator, Canada and Franklin D. Roosevelt, United States of America. These women were attending the United Nations General Assembly session in 1949. (Source: Wikimedia Commons)

(Left to Right) Ulla Lindstrom, member fo the First chamber of Parliament, Sweden; Sucheta Kripalani, Member of the Constituent Assembly, India; Barbara Castle, Member of Parliament; Cairine Wilson, Senator, Canada and Franklin D. Roosevelt, United States of America. These women were attending the United Nations General Assembly session in 1949. (Source: Wikimedia Commons)

इसके बाद वह उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले की लोकसभा सदस्य रहीं। 1971 में उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया। इसके तीन साल बाद, 1 दिसंबर 1974 को उनका निधन हो गया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वह भले ही आचार्य कृपलानी व महात्मा गाँधी की सहयोगी बन कर रहीं पर वास्तविकता में वह स्वयं में एक स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली महिला थीं जो अपने निर्णय खुद लेने में विश्वास रखती थीं।

सामान्यतः स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति भीड़ से अलग हो जाते हैं। सुचेता कृपलानी ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्र व्यक्तिव हो कर भी एक सामूहिक आंदोलन का हिस्सा बना जा सकता है। भारत की आधुनिक राजनीति के इतिहास में सुचेता एक प्रभावी राजनेता के रूप में हमेशा याद की जाएंगी।

मूल लेख – रिंचेन नोरबू वांगचुक 

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहिणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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