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जल-संरक्षण के अनोखे तरीके से हर साल 6 करोड़ लीटर बारिश का पानी बचा रहा है यह किसान!

जब थरकन ने अपनी 12 साल की रबर की खेती को कटवा दिया तो लोगों ने उन्हें पागल कहा। पर आज वही लोग उनके तरीके अपने फार्म में इस्तेमाल कर रहे हैं!

केरल में त्रिशुर जिले की वेलुर पंचायत में रहने वाले वर्गीज़ थरकन ने अपने ‘अयुरजैक फार्म’ में से रबर के पेड़ों को कटवा दिया। उन्होंने जब पेड़ों को कटवाना शुरू किया तो गाँव के कुछ लोग वहां पहुंचे। गाँववालों ने इस तरह से पेड़ों के काटे जाने का विरोध किया।

“पागल हो गए हो क्या?,” “तुम्हे पता भी है, क्या कर रहे हो?,” इस तरह के बहुत से सवाल लोग उनसे करने लगे। लेकिन थरकन ने उनकी कोई बात नहीं सुनी। बहुत से लोगों को लगा कि थारकन किसी आर्थिक तंगी में ऐसा कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने उनकी मदद करने के लिए भी कहा।

पर थरकन की वजह कुछ और थी और जब उन्होंने यह वजह बताई तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। उन्होंने सबको अपने अनोखे जल संरक्षण के तरीके के बारे में बताया, जिससे कि उनके इलाके में बाढ़ और पानी की कमी को हल किया जा सकता है। पर सबने उनको पागल ही समझा।

लेकिन आठ साल बाद, जो लोग कभी उन्हें ताने दे रहे थे, अब उनके फार्म में आकर उनके मॉडल को समझते हैं और अपने यहाँ कटहल उगाने के लिए अप्लाई कर रहे हैं। कुछ एक्सपर्ट और रिसर्चर भी उनके फार्म को देखने-समझने के लिए आते हैं।

Varghese Tharakan

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने इस बारे में बताया, “मुझे सही नहीं लगा कि मेरा 5 एकड़ का फार्म सारा भूजल सोख ले और बारिश का पानी भी क्योंकि रबर के पेड़ों को बहुत पानी की ज़रूरत होती है। यहाँ की ज़मीन बहुत उपजाऊ है, इसलिए मैंने बहुत तरीके से इसे इस्तेमाल करने की सोची। हमारे इलाके में कटहल, पारम्परिक फल है तो मैंने वही लगाया।”

इस इलाके में मौसम बहुत अस्थिर रहता है और इस वजह से भी उन्होंने जल संरक्षण की दिशा में काम करने का फैसला किया।

इस मॉडल से न सिर्फ उनके फार्म के लिए, बल्कि अन्य पड़ोसी फार्म्स के लिए भी पानी की समस्या को हल किया है। लगभग 35 कुएं, जो एक बार सूखे पड़े थे, आज पानी से भरे हुए हैं। हर साल वे 6 करोड़ लीटर बारिश का पानी बचाते हैं और यह पूरे साल उनके हज़ार कटहल के पेड़ों को पानी देने के लिए काफी होता है।

साल 2018 में केरल में आई भयंकर बाढ़ से भी यह गाँव बच गया था क्योंकि थारकन की ही तरह गाँव के सभी किसानों ने अपने खेतों में छोटे-छोटे गड्ढे बनाये थे। इन गड्ढों में बारिश का पानी जमा हो गया।

थरकन अपने फार्म में कटहल की 32 वैरायटी उगाते हैं और उनकी इन वैरायटी को वाटर, एयर एंड फ़ूड अवार्ड्स की लिस्ट में शामिल किया गया है। उनके मॉडल को मिटटी और जल संरक्षण के लिए राज्य सरकार ने उन्हें शोनी मित्र अवॉर्ड से सम्मानित किया है और इसे लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स में भी प्रेजेंट किया गया।

रबर की 12 साल की खेती को यूँ ही जाने देना आसान नहीं था और वह भी तब जब उससे उन्हें काफी मुनाफा ही रहा था। लेकिन उन्होंने यह कठिन निर्णय लिया और फिर एक बार स्क्रैच से कटहल की खेती के साथ शुरू किया।

“सभी कुएं सूख जाने की वजह से, बारिश कम होती तो किसानों के पास पानी ही नहीं होता और अगर ज्यादा होती तो पूरा फार्म बर्बाद हो जाता। हमें ज्यादा बारिश का फायदा लेने के लिए एक स्ट्रेटेजी पर काम करना था,” 45 वर्षीय थरकन ने बताया।

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Tharakan’s farm in Kerala

एक साधारण से जल-संरक्षण के तरीके से सुलझीं पर्यावरण की समस्याएं 

वर्षा जल संचयन के कई ट्रायल करके और बड़े-बुजुर्गों से मशवरा करके, थरकन ने आख़िरकार, साल 2013 में यह तरीका अपनाया, जिसे ‘अंडरग्राउंड वाटर बैलेंसिंग सिस्टम’ कहते हैं।

थरकन कहते हैं कि यह तरीका कोई रॉकेट साइंस नहीं है। उन्होंने अपने खेत में छोटे-छोटे गड्ढे बनाये ताकि बारिश का पानी इनमें जाए और भूजल स्तर बढे। उन्होंने अपने फार्म को ऊँची-नीची परतों में बांटा ताकि बारिश का पानी सभी जगह अच्छे से जाये।

गड्ढे बनाने से फार्म स्लोपी नहीं रहता और इससे बारिश का पानी बाहर बहने की बजाय, ज़मीन के अंदर जाता है। इससे मिटटी का कटाव भी रुकता है। इस तरीके का परिणाम आप 2- 3 मानसून के मौसम जाने के बाद बढ़े हुए भूजल स्तर और पानी से भरे कुओं में देख सकते हैं।

थरकन ने अपनी खेती में भी बदलाव किये। आज वे जैविक किसान हैं। “अगर मैं कटहल उगाने में केमिकल का इस्तेमाल करूँगा, तो पर्यावरण के लिए की जा रहीं मेरी सारी कोशिश बेकार हैं,” उन्होंने आगे कहा।

उन्होंने अपने खेत में कुछ गड्ढे बनाकर, उनको गोबर, नीम और कॉकोपीट से भर दिया ताकि खाद बना सकें। “हर एक पेड़ के लिए मैं लगभग 3-4 किलो सूखा खाद इस्तेमाल करता हूँ। इससे खेत में पोषक तत्व रहते हैं।”

जैविक खेती के चलते उनकी उपज और गुणवत्ता में बढ़ोतरी हुई है।

हर साल उन्हें अपने पेड़ों से अच्छी-खासी फसल मिलती है। एक पेड़ से उन्हें 100 किलो कटहल मिलते हैं। तो हर साल, वे लगभग एक लाख कटहल बेचते हैं।

दूसरों को जैविक खेती में मदद करने के लिए, थरकन लगभग 8 वैरायटी के कटहल सैप्लिंग किसानों को बेचते हैं। इस वक़्त भी आपको उनके फार्म पर लगभग 1000 सप्लिंग मिल जायेंगे। वे बताते हैं कि वे यह सैप्लिंग न तो ऑनलाइन भेजते हैं और न ही किसी बाज़ार में, बल्कि जो भी उनके फार्म का दौरा करके उनसे खरीदता है, सिर्फ उसे देते हैं।

उनकी वैरायटी के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि उनके पेड़ों की ऊंचाई 7-8 फीट होती है जबकि सामान्य कटहल का पेड़ 70 से 80 फीट के आसपास होता है। इस कम ऊंचाई की वजह से उनके पेड़ कहीं भी, छोटी-से छोटी ज़मीन पर और घरों में भी लगाये जा सकते हैं।

वे अब अपने पर्यावरण के अनुकूल मॉडल के बारे में जागरूकता फैलाने और जल संकट को हल करने के लिए राज्य सरकार के कृषि और शिक्षा विभाग के साथ जुड़ने की योजना बना रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके किसानी के तरीके बच्चों की किताबों में भी पढ़ाये जाएँ।

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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